प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथा
बँटवारा
 
आज का दिन हर दिन जैसा नहीं था। पूरे घर में शोर मचा हुआ था, अंदर से चीज़ें बाहर लाई जा रही थीं और उनका आँगन में ढेर किया जा रहा था। आज दोनों भाईयों में बँटवारा होने वाला था। बच्चों का उत्साह देखते बनता था। जो होने जा रहा था, वो उनकी समझ से तो बाहर था लेकिन उनको चीज़ों का ढेर करने में बड़ा मज़ा आ रहा था। होड़ लगी हुई थी कि सबसे पहले कौन आँगन में पहुँचता है? देवरानी और जेठानी मन की ख़ुशी बाहर नहीं आने दे रही थीं। छोटी बहू सोचकर ख़ुश थी कि अब उसे जेठानी के और ताने नहीं सहने पड़ेंगे। अब वो अपने घर की मालकिन ख़ुद होगी, सारा पैसा उसके हाथ में दिया जायेगा और हर चीज़ का सही हिसाब रखा जाएगा। वो सोचकर ख़ुश थी कि अब उसके ओढ़ने-खाने के दिन आयेंगे। अब उसके दूध के भगोने के पास जेठानी नहीं बैठी होगी और वो ख़ुद उबले दूध से गाढ़ी मलाई उतार कर अपनी थाली में डालेगी।
 
दूसरी ओर जेठानी की भी कम योजनाएँ नहीं थीं। सिनेमा जाने की उसकी बरसों पुरानी इच्छा अब पूरी होगी। इस इच्छा के आड़े पहले उसके ख़ुद के माँ-बाप आये, शादी के बाद सास और उसके बाद बड़ी बहू की ज़िम्मेदारियाँ। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा, अब वह जो चाहेगी, करेगी। अब वह हर तीसरे महीने पीहर जायेगी और अपनी माँ को उसकी पसंदीदा गोटे वाली साड़ी लेकर देगी।
 
बँटवारे में किसी के हिस्से में कम या ज़्यादा न आये, इसका ध्यान रखने के लिए जीजाजी को बुलाया गया था। आँगन में जीजाजी दोनों हाथ बाँधकर खड़े थे और एक-एक चीज़ का बँटवारा इस तरह कर रहे थे, जैसे कि वह सोने की हो, आख़िर ज़िम्मेदार आदमी जो ठहरे। इस समय जीजाजी का महत्त्व मोहिनी से कम नहीं था कि वो जो भी दे, देवताओं और दानवों दोनों को स्वीकार है। लेकिन जीजाजी ने मोहिनी की तरह पक्षपात नहीं किया। अगर एक भी चीज़ किसी के हिस्से में ज़्यादा चली गयी तो उनकी इज़्ज़त में दाग़ लग जायेगा। आख़िर ईश्वर से भी ज़्यादा भरोसा है उन पर, दोनों भाईयों को। छोटे भाई के हिस्से में दूसरा मकान आया था, जो कस्बे के आख़िरी छोर पर था। ये मकान उन्होंने क़रीब दो साल पहले ख़रीदा था और तभी से छोटे भाई ने तय कर लिया था कि बँटवारा होने के बाद वह यहीं आकर रहेगा, क्योंकि यहाँ वैवाहिक जीवन का सुख संभव है, जिससे वह अब तक लगभग वंचित ही रहा था।
 
लगभग सभी चीज़ों का सफलतापूर्वक बँटवारा हो गया था। दोनों भाइयों ने दो-दो बार मुआयना करके सुनिश्चित किया कि सब चीज़े बँट गयी हैं और बराबर बँटी हैं। छोटे भाई ने अपना सामान एक गाड़ी में लाद लिया था और जाने को तैयार था, इतने में ही बाहर के नीची छत वाले पुराने कमरे का टूटा-सा दरवाज़ा खोलकर हाथ में पोटली लिए लाठी टेकती बूढी माँ बाहर आई और बोली- "बेटा, मेरा बँटवारा हो गया? मैं किसके हिस्से में हूँ?

- अक्षय मेहता
 
रचनाकार परिचय
अक्षय मेहता

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कथा-कुसुम (1)