प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

छन्द संसार
कुण्डलिया
 
 
गीता-सी वाणी करें, धारें उर क़ुरआन।
सदा रहेगा एक फिर, अपना हिन्दुस्तान।।
अपना हिन्दुस्तान, बनेगा ऊँचा जग में।
रखें अगर सद्भाव, ज़िन्दगी रूपी मग में।
कह 'रंजन' कविराय, हमेशा है वह जीता।
जिसका मन क़ुरआन, और वाणी है गीता।।
 
 
ऊर्जा बच्चों में भरी, अगम, असीम, अथाह।
इनके भुजबल, ज्ञान को, दें बस सच्ची राह।।
दें बस सच्ची राह, सत्य का मर्म बताएँ।
ख़ूब करा अभ्यास, जीतना इन्हें सिखाएँ।
कह 'रंजन' कविराय, करें मत ढीला पुर्जा।
तन, मन का व्यायाम, बढ़ाता जीवन-ऊर्जा।।
 
 
मत करना तुम फ्लैट को, घर कहने की भूल।
अगर न हों माता-पिता, सुख-वैभव निर्मूल।।
सुख-वैभव निर्मूल, नहीं घर वह घर जैसा।
जिसका हो आधार, स्वर्ण, चाँदी और पैसा।
कह 'रंजन' कविराय, प्यार जीवन का गहना।
नहीं बड़ों की छाँव, उसे तुम घर मत कहना।।
 
 
होती है मुस्कान से, प्रेम-मिलन शुरुआत।
आगे बढ़ती बात तब, सजती है बारात।।
सजती है बारात, पहुँचती है सजनी घर।
हार गले में डाल, प्रिया अपना लेती वर।
जड़ जाते यूँ भाल, सृष्टि के अनगिन मोती।
मरघट होता विश्व, अगर मुस्कान न होती।।
 
 
वो क्या जानें इस मलिन, राजनीति की चाल।
बनी रही रोटी सदा, जिनके लिए सवाल।।
जिनके लिए सवाल, रहा हर दिन ही जीना।
खेतों में दिन-रात, बहाते वही पसीना।
कह 'रंजन' कविराय, उन्हें हक़ उनका दे दो।
भारत का उत्थान, कराने वाले हैं वो।।

- रंजन कुमार झा
 
रचनाकार परिचय
रंजन कुमार झा

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