प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

लघुकथाएँ
नारी सशक्तिकरण की रिपोर्ट
 
शाम को घर लौटकर संदीप ने बड़े उत्साह से अपनी पत्नी विदिशा से पूछा, "आज टीवी पर मेरी धमाकेदार रिपोर्ट देखी? नारी सशक्तिकरण की क्या शानदार पैरवी की। नारी अधिकार बढ़ाने की कितनी जोरदार माँग की!" 
विदिशा ने धीमे स्वर में सिर नीचे करके कहा, "जी नहीं! वो रात को आपने देर तक पैर दबाने को कहा ना, फिर मेरी नींद उचट गई। दोपहर में मेरी आँख लग गई। मैं जगी तब तक प्रसारण हो चुका था।"
संदीप आपे से बाहर हो गया। दाँत पीसकर बोला, "यू फूल! हरा… ! मैंने इतनी मेहनत से रिपोर्ट बनाई और इडियट कहीं की, तू पड़ी-पड़ी पलंग तोड़ रही थी! तुम लोगों का कभी कुछ नहीं हो सकता।"
 
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ईर्ष्या
 
"बड़ा प्रमोट कर रहे हैं आजकल फलानी को, कभी हमें भी छापिए" उसने सम्पादक को शिकायती लहजे में कहा।
"लेकिन वो बहुत मेहनत करती है। आए दिन प्रासंगिक सामग्री यानी लेख, कहानी और कविता आदि भेजती रहती है। उसमें से कुछ न कुछ सेलेक्ट हो ही जाता है। या यूँ समझिये कि हमें उन मैटर्स की ज़रूरत रहती है।" सम्पादक ने सफाई दी।
"अजी इतने नासमझ हम भी नहीं। कभी हुक्म तो कीजिये हम भी मेहनत कर लेंगे और इतने अप्रासंगिक तो हम भी नहीं हुए अभी। बस 35 वसन्त ही तो देखे हैं। हमारे मैटर की भी ज़रूरत पैदा करके देखिये न।" लेखिका ने इठला कर कहा।
सम्पादक निरुत्तर और भौंचक्का था। उसने हाथ जोड़कर कहा, "ठीक है! कभी और बात करता हूँ।"
ख़ुद पर उछल सकने वाले कीचड़ की कल्पना मात्र से वह सिहर गया। उसने नवांकुर लेखिका के सारे आर्टिकल रोक दिए। उधर 35 वसन्त वाली बस इसी से ख़ुश थी कि नवांकुर लेखिका उगने से पहले ही उसकी तेज़ाबी चाल से मुरझा गयी।
 
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मी टू डील
 
"हैलो,निशांत सर?!"
अननोन नम्बर से फोन आया था। निशांत जी जल्दी से उठाते नहीं अनजान लोगों के फोन। लेकिन आज बिलकुल फ्री थे इसलिए एक रिंग में ही उठा लिया।
बहुत महीन और मीठी आवाज़ थी।
निशांत जी ने कहा, "यस! कौन??"
"सर! मैं निमिषा। आपके अंडर में काम करती थी विस्टा एंटरटेनमेंट कम्पनी में....पहचाना?"
"अरे, हाँ हाँ निमिषा। कहो कैसी हो? आज इतने बरसों बाद? क्या कर रही हो आजकल?" निशांत जी ने निमिषा का हालचाल पूछा।
"सर, एकदम ठीक हूँ। याद है... आप मुझे कभी पटाखा, कभी फुलझड़ी तो कभी बिजली कहते थे?" कहकर निमिषा ने ज़ोर से ठहाका लगाया।
निशांत जी को ऐसा कुछ याद नहीं आया। बस इतना याद था कि वे निमिषा को मेहनती और प्रतिभावान कर्मचारियों में से एक मानते थे और कभी-कभी उसकी सराहना और उससे हल्का-फुल्का हंसी मज़ाक कर लेते थे।
उन्होंने झूठ-मूठ की हँसी हँसते हुए कहा, "हाँ हाँ। बोलो कैसे याद किया।
निमिषा बोली, "सर, मैं तो उस शाम को याद करके आज भी शर्मा जाती हूँ जब आपने मुझे अपनी बाँहों में भींच लिया और चुम्बन ले लिया था। याद है न?"
 
निशांत जी को वाकई ऐसा कुछ भी याद नहीं आ रहा था। लेकिन बात को आगे बढ़ाने की गरज से बोले, "अच्छा? और बताओ।" हालांकि वे धीरे से बुदबुदाए भी कि ये सब कब हुआ?
"सर, ख़ुद की इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी चला रही हूँ। लेकिन कुछ ख़ास चल नहीं रही। बस उसी सिलसिले में याद किया आपको। आप तो इस फील्ड के मास्टर हैं। बेटी भी जवान हो गयी है। उसको भी जमाना है। कुछ मदद कीजिये न।" निमिषा ने अपनी वाणी में मिश्री घोल कर कहा।
निशांत जी बोले, "ठीक है! आप अपना विजिटिंग कार्ड और बेटी का प्रोफाइल व्हाट्सऐप कर दीजिये। मैं दो चार बड़े कार्पोरेट्स और शादी ब्याह के काम करने वाले कैटरर्स को कह दूँगा।"
निमिषा बोली, "अरे सर! इतनी तकलीफ थोड़े ही दूँगी आपको। ये सब तो हम माँ-बेटी कर लेंगे। आप तो बस दस लाख रूपए करवा दीजिये।"
निशांत को आश्चर्य हुआ। भला इतने दिन बाद अचानक कोई फोन करके कर्ज कैसे माँग सकता है। कोई ख़ास पहचान भी नहीं।
निशांत जी बोले, "निमिषा जी, इतने पैसे तो नहीं हैं मेरे पास। बाज़ार काफी ठण्डा है। माफ़ कीजिएगा। वैसे आपको लोन चाहिए तो मैं एकाध फाइनेन्सर्स का नाम सुझा सकता हूँ।"
"बहुत भोले हैं आप। कर्ज नहीं चाहिये मुझे। आपका बाज़ार ठण्डा है तो क्या हुआ। अभी मी टू का बाज़ार गर्म है। आपने ख़ुद फोन पर स्वीकार किया कि आप मुझसे कैसी कैसी बातें कर चुके हैं। सब रिकॉर्ड किया हुआ है मेरे पास। इनमें से काम की बातें मैं ख़ुद छाँट लूँगी। आपको शाम पाँच बजे तक वक्त देती हूँ सोच लीजिएगा। इसके बाद मैं पहले सोशल मीडिया और फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में धमाका करूंगी। फिर मुझे दोष मत दीजिएगा।"
निमिषा ने फोन काट दिया।
 
निशांत जी बेचैन हो गए। बार-बार घड़ी और टीवी देख रहे थे। समाचारों ने उन्हें और भी विचलित कर दिया। पौने पाँच बजे उन्होंने सरेंडर कर दिया। डील पाँच लाख में फाइनल हुई।

 


- शिखर चंद जैन
 
रचनाकार परिचय
शिखर चंद जैन

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कथा-कुसुम (1)