नवम्बर 2018
अंक - 44 | कुल अंक - 56
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी
मी टू
 
 
"तू जानती भी है ये दो शब्द मुँह से निकालते ही सब बिखर जायेगा। दो छोटी-छोटी बेटियाँ हैं तेरी, उनका क्या होगा? पागल मत बन, अभी यह केम्पेन सिर्फ उन औरतों के लिए है, जिन्हें यह सब करके कोई फ़र्क नहीं पड़ता। वे सेल्फ़ डिपेंड हैं, अपना गुज़ारा किसी तरह कर लेंगी। उन्हें किसी को जवाब नहीं देना पड़ेगा और तू! किस-किस का मुँह बन्द करती फिरेगी? ससुराल में सब थू-थू करेंगे वो तो ठीक है, प्रबुद्ध ने अगर तुझे और बच्चियों को अपनाने से मना कर दिया तो कहाँ जायेगी? अपने बूढ़े माँ-बाप का भी तो सोच जो वेल-सेटल बेटे के बावजूद मोहताज हैं, उन पर भार बनेगी!"
ख़ास दोस्त वाणी की अधिकार भरी झिड़की के बाद प्राची ने अपने आपको चुप रखने की ठान ली थी। आख़िर वाणी का हरेक तर्क अपने आप में एक ज़ंजीर था, जिनको वह बीस साल से अपने पैरों में किसी न किसी रूप में महसूस करती आ रही थी।
 
टीवी पर #MeToo सुनते-सुनते वह लगभग तय कर चुकी थी कि इस अभियान में वह भी शामिल होगी, ताकि ख़ुद पर हुए अन्याय का बदला लेने के साथ-साथ वह महिला जागरूकता में भी योगदान दे सके। तक़रीबन बीस साल पहले जब वह ग्यारहवीं की छात्रा थी, एक ऐसी अनहोनी गुज़री थी उस पर जिसे वह आज तक हज़ार कोशिशों के बावजूद नहीं भुला पायी। गाहे-बगाहे वह जिल्लत भरा ज़िन्दगी का अनचाहा हिस्सा उसकी आँखों के सामने आकर उसे दबोच लेता है और आज भी उन दिनों की भांति वह घुटकर रह जाती है। चाचा की उस दरिन्दगी की दास्तान किसी तरह हिम्मत करके जब माँ को सुनाई थी तो माँ ने उसे फुसफुसाते स्वर में 'धीरे बोल, किसी ने सुन लिया तो बदनामी हो जायेगी' कहकर हज़ार मिन्नतें और क़समों के बाद साफ़ हिदायत दी थी कि अगर यह बात हम दोनों के सिवा किसी तीसरे तक गयी तो मेरा मरा मुँह देखेगी। हालाँकि माँ ने अपना वादा कि 'मैं सब सम्हाल लूँगी', चाचा को शहर से बाहर नौकरी के लिए भिजवाकर पूरा कर लिया था लेकिन एक टीस, एक ज़ख्म उसके अबोध मन पर ऐसा उभरा था जो आज तक नहीं भर सका।
 
समय के साथ-साथ उसने फिर से अपने आपको समेटा और एक सामान्य जीवन जीना शुरू कर दिया था। पढ़ाई पूरी की। माँ-बाप की पसन्द से शादी की। घर-गृहस्थी की तमाम ज़िम्मेदारियाँ बा-ख़ूबी निभायीं और अब अपनी दोनों बेटियों की परवरिश में लगी है ताकि उन्हें अच्छा करियर और अच्छी ज़िन्दगी मिल सके। यूँ देखा जाए तो उसके जीवन में कोई कमी नहीं, कोई परेशानी नहीं। समझदार पति, जो अब तक एक अच्छा बेटा और बाप भी साबित हुआ है। अच्छे सास-ससुर, देवर-देवरानी और उनके बच्चों से भरा पूरा परिवार है, जो हर अवसर पर मिल-जुलकर रहता है और अपने आपको ख़ुशनसीब समझता है। उसके जैसी सुशील, संस्कारी और जवाबदेह बहू पाकर पूरा परिवार संतुष्ट है। ननदें भी मौके-अवसर पर ख़ुशी-ख़ुशी आती हैं और उससे ख़ूब ख़ुश रहती हैं। कुल मिलाकर
घर का हर मेम्बर उसे बहुत प्यार करता है। हर तरह से एक ख़ुशहाल और सुखद ज़िन्दगी थी लेकिन किशोरावस्था की वह टीस अक्सर उसका दम घोंटती रहती थी। शादी के बाद पति से भी कभी इस बात का ज़िक्र नहीं कर पायी थी वह। यूँ प्रबुद्ध उसे बहुत प्यार करते हैं लेकिन यह एक ऐसी बात थी, जो किसी भी
पुरुष के अहम् को ठेस पहुँचा सकती थी और शान्त, समझदार होने के बावजूद आख़िर वह भी एक मध्यमवर्गीय पुरुष ही थे, जो अपने परिवार की खुशियों पर
गर्व करते थे।
 
प्राची इस #MeToo मुद्दे की हर एक्टिविटी पर लगातार नज़र रक्खे थी और इसमें आवाज़ उठाने वाली सभी औरतों से बहुत इम्प्रेस भी थी। वह जानती थी कि यह मुद्दा जितना छोटा दिखता है, उतना है नहीं। आज के जागरूक होते समय में इस आन्दोलन की बहुत इम्पोर्टेंस है। आज जब समय तेज़ी से बदल रहा है, महिलाओं से जुड़ी हर छोटी-बड़ी समस्याओं पर खुलकर चर्चाएँ होने लगी हैं और उनके समाधान भी ढूंढे जाने लगे हैं। महिलाओं को अपने अधिकार हासिल होते हुए दिख रहे हैं, ऐसे में इस केम्पेन में एक आवाज़ भी हज़ार चीखों-सा महत्त्व रखती है, वह जानती है। और एक ऐसे दौर में; जहाँ बच्चियाँ घर, मोहल्ले, बाज़ार या स्कूल किसी जगह सुरक्षित नहीं हैं, हर दिन किसी न किसी भयानक ख़बर से सामना हो रहा है, जिसे सुन औरत होने से भी डर लगता है, ऐसे में इस तरह के आन्दोलन का महत्त्व और बढ़ जाता है। आख़िर उसकी अपनी भी दो प्यारी-सी बेटियाँ हैं, जिनकी चिन्ता उसे परेशान करने ही लगी है। बड़ी वाली सोनिका, जो टीनेज दौर से गुज़र रही है, ज़रा देर अगर बाहर चली जाए तो वह परेशान हो उठती है कि जल्दी आ जाए घर। ट्यूशन क्लास जाने और आने के बीच, थोड़ा-सा देर से पहुँचने पर उसे ऐसी-ऐसी मनहूस बातें घेरे रहती हैं कि बस! फिर वह इस आन्दोलन से बेख़बर कैसे रह सकती है, जो किसी न किसी रूप में इन परेशानियों के हल का एक हिस्सा है। कल को उसकी बच्ची के साथ भी उसी की ही तरह........उफ्फ्फ़! हे भगवान् मेरी बच्चियों की हमेशा रक्षा करना!
 
प्राची वाणी की हर बात को समझती है। ऐसा नहीं कि वाणी के डाँटने से पहले उसने इन सब बातों पर सोचा ही नहीं था। वह इस एक आवाज़ से होने वाले हर
नुकसान से बा-ख़बर थी। वह अच्छी तरह जानती थी कि यह एक आवाज़, मुश्किलों के एक ऐसे तूफ़ान को पुकारने वाली आवाज़ है, जो उसका सालों की मेहनत से बना ख़ूबसूरत आशियाना तबाह कर सकता है। पति प्रबुद्ध इस पर जाने क्या रियेक्ट करेंगे! साथ देने के चांसेज न के बराबर हैं। अगर साथ देना भी चाहें तो उन्हें कितनों को जवाब देना पड़ेगा, कितनी बे-इज्ज़ती सहनी होगी, इसकी कल्पना से ही सिहरन होती है। बेटी की तरह हाथों-हाथ रखने वाले सास-ससुर अपनी दाग़दार बहू को बहू भी कह पाएँगे या नहीं! अगर यह घर उसे ठुकरा देगा तो उसका कौनसा ठिकाना रह जाएगा! माँ-पापा पहले से उम्र के हाथों मोहताज हुए बैठे हैं, ऐसे में दो बेटियों के साथ! भाई से किसी तरह की उम्मीद नहीं, वह तो अपनी मेमसाहब बीवी के हुस्न की छाया और क़ामयाब कारोबारी के नशे से इतर कुछ देखे तो आसपास दिखायी दे उसे। खैर, वह वाणी की हर बात से सहमत थी और ख़ूब जानती थी कि अभी यह सब हम मिडिल क्लास की औरतों के बस की चीज़ नहीं है।
 
इस सोच के भँवर में वह पिछले क़रीब पन्द्रह दिन से डूब-उतर रही है। एक तरफ़ परिवार को बिखरने से बचाने की ज़िम्मेदारी और दूसरी तरफ़ बेटियों के लिए
कुछ करने की जवाबदेही! वह कुछ तय नहीं कर पा रही थी। उसे ऐसा लग रहा था कि एक तरफ़ कुआँ है, जिसकी ओर क़दम बढाते ही वह अपने साथ-साथ अपनी बच्चियों, पति और सास-ससुर सबको लेकर उसमें धड़ाम से गिरेगी और दूसरी तरफ़ खाई है, जिसकी तरफ़ धीमे-धीमे क़दम बढ़ रहे हैं और वह अपनी दोनों बेटियों सहित उसमें उतरे जा रही है। एक तरफ़ ज़िम्मेदारी थी, जो याद दिला रही थी कि मेरी वजह से यह बर्बादी नहीं जबकि दूसरी तरफ़ उसका कर्तव्य बोध था, जो लगातार उकसा रहा था कि 'अभी नहीं तो कभी नहीं'।
 
तमाम उधेड़बुन के बीच आज फिर उसने एक न्यूज़ चैनल पर यह ख़बर सुनी कि 'एक आठ साल की मासूम बच्ची को ब्लैकमेल कर, पिछले तीन महीने से पड़ोस की एक आंटी ने करवाया यौन शोषण, मुँह खोलने पर परिवार को ख़त्म करने की धमकी देकर डराया गया। बच्ची पिछले कुछ समय से लगातार गुमसुम रहती थी, परिवारवालों ने बहला-फ़ुसला कर पूछा तो टूट गयी और इस घिनौने खेल का घड़ा फूट पड़ा। पुलिस ने पड़ोस की महिला और उसके तीन साथी पुरुष जो; इस काम में शामिल थे, को गिरफ़्तार किया।' ख़बर सुनकर उसे लगा जैसे किसी ने उसके सिर पर बड़े हथौड़े से एक ज़ोरदार वार किया हो। उसने महसूस किया कि उसका दिमाग़ सुन्न पड़ गया है और आँखों को एक काले अँधेरे परदे ने लील लिया है। उस अँधेरे परदे पर अचानक उसे अपनी दोनों बेटियों के नुचे हुए चेहरों वाली तस्वीर नज़र आयी, जिसके नीचे लाल रंग से लिखा था-  #MeToo
 
सहसा उसकी चीख निकल पड़ी और वह ज़ोर से चिल्लाई- "तुम नहीं मेरी बच्चियों! इससे पहले की तुम्हें कहने पड़ें, ये दो शब्द मैं कहूँगीSSSSS

- के. पी. अनमोल

रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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