प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कहानी
एक कश्मीरी
 
 
ड्राइवर को गाड़ी पार्क करने का आदेश देकर मैं तेजी से कांफ्रेंस हॉल की तरफ बढ़ गया। सभी अधिकारी उपस्थित हो चुके थे और मीटिंग कुछ ही देर में आरम्भ होने वाली थी। मैंने अपनी नेमप्लेट लगी जगह खोजी और आराम से कुर्सी में धंस गया। छः घण्टे की लम्बी यात्रा और चीफ की पिछले साल हर डिवीजन को दिये गये लक्ष्यों को लेकर लम्बी मीटिंग व आगामी वर्ष के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु दिशा-निर्देश। चीफ के कांफ्रेंस हॉल में प्रवेश करते ही हम सभी सावधानी से खडे़ हो गये कि तभी किसी का मोबाइल फोन बज उठा। "प्लीज़ स्विच ऑफ योर मोबाइल्स"- चीफ की तेज आवाज सुनाई दी। मीटिंग आरम्भ हो चुकी थी। चपरासी सभी को गरम चाय और समोसे सर्व कर रहा था।
 
चीफ के दाहिने ओर एक लम्बा व गोरा-चिट्टा अधिकारी बैठा हुआ था। ये हमारे रीजन के मुखिया थे। ऊपर से जितने कड़क, अन्दर से उतने ही मुलायम। एक योग्य अधिकारी के साथ-साथ कवि हृदय भी। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ और कविताएँ छपती थीं। अधिकतर वे उर्दू में ही लिखा करते और उर्दू-जगत में उनका नाम काफी जाना-पहचाना था। मीटिंग में जब भी चीफ किसी बात पर नाराज़ हो जाया करतीं, अपनी विनोदप्रियता से वे स्थिति को सम्भाल लेते।
 
मीटिंग का प्रथम दौर ख़त्म होते ही मैं भी उनके साथ हो लिया। चूंँकि मेरी नियुक्ति अभी नई-नई थी, अतः उनके अनुभवों से काफी कुछ सीखने को मिलता। विभागीय बातों के अलावा भी दुनिया की तमाम चीज़ों पर मैं उनसे खुलकर बातें किया करता। चूँंकि वे मेरे काफी वरिष्ठ थे, अतः हर चीज उनसे पूछने का साहस भी नहीं था। उनके बारे में काफी कुछ सुनता रहता था, मसलन- वे बहुत एकाकीप्रिय थे, इसी कारण उनकी पत्नी भी उनसे दूर कहीं विदेश में रहतीं और वहीं पर एक स्कूल में बतौर टीचर ज्वाइन कर लिया, एक लम्बे समय तक उन्होंने सेना में प्रतिनियुक्ति पर बिताया और अधिकतर दुर्गम जगहों पर उनकी पोस्टिंग रही थी, आज तक उन्होंने किसी भी जगह अपना टेन्योर पूरा नहीं किया था और न जाने क्या-क्या? यहाँ से भी उनके ट्रांसफर ऑर्डर आ चुके थे। बात शुरू करने के उद्देश्य से मैंने पूछा, सर- आप नयी जगह ज्वाइन कर रहे हैं? वे मुस्कुराते हुए बोले- "देखो.....लगता है जाना ही पडे़गा। वैसे भी किसी जगह मैं लम्बे समय तक नहीं टिक पाया हूँ।"
 
इस बीच चपरासी मेज़ पर खाना लगा चुका था। धीमे-धीमे हमने खाना आरम्भ कर दिया। कभी-कभी मैं उन्हें ध्यान से देखता और सोचता इस व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है? सामने से जितना ख़ुशमिज़ाज, फोन पर उतनी ही कड़क आवाज़। बातों के सिलसिले में ही वे मुझे अपने बीते दिनों के बारे में बताने लगे। मानो समय का पहिया अचानक मुड़कर पीछे चला गया हो। मूलतः वे कश्मीरी ब्राह्मण थे और उन्हें अपनी कश्मीरियत पर गर्व था। कश्मीर अर्थात धरती का स्वर्ग। राजनैतिक धाराओं की बात छोड़ दें तो न हिन्दू-मुसलमान का भेद और न आतंकवाद की छाया। सभी एक-दूसरे के त्यौहारों और सुख-दुःख में शरीक होते व जाति-धर्म से परे एक परिवार की तरह रहते। अपने बचपन का एक वाक़या सुनाते हुए वे कह रहे थे- एक बार मेरी छोटी बहन दुपट्टे को अस्त-व्यस्त गर्दन में लपेटे घूम रही थी कि तभी एक बुजुर्ग मुसलमान की निगाह उस पर पड़ी। उन्होंने उसे प्यार से बुलाया और पूछा- किसके घर की हो? परिचय मिलने पर उसने समझाया तुम शरीफ ब्राह्मण खानदान की लड़की हो और इस तरह दुपट्टे को गले में लपेटकर चलना अच्छा नहीं लगता। फिर उसे दुपट्टा ओढ़ने का सलीक़ा बताते हुए घर जाने को कहा और बोले "तुम भी मेरी  बेटी हो, तुम्हारी इज़्ज़त से ही हमारी इज़्ज़त भी जुड़ी हुई है। हम भले ही दो धर्मों को मानते हैं पर नारी की इज़्ज़त सभी की इज़्ज़त है।" अचानक वे ख़ामोश हो गये..........पता नहीं किन लोगों की नज़र लग गई हमारे कश्मीर को। देखते ही देखते उसे आतंकवाद का गढ़ बना दिया और हम अपने ही कश्मीर में बेगाने हो गये। हमने तो कभी हिन्दू-मुसलमान के प्रति दो-तरफा व्यवहार नहीं पाला, फिर कहाँ से आया ये सब?
 
मैं उनको ध्यान से सुन रहा था और उनकी आवाज़ के दर्द को समझने की कोशिश कर रहा था। वो बता रहे थे कि सिविल सर्विस में आने से पहले वे एक दैनिक पत्र में काम किया करते थे। वर्ष 1980 के दौर में जब भारत पर सोवियत संघ की सरपरस्ती का आरोप लगता था तो अखबारों में बडे़-बडे़ लेख छपते। भारत में कम्युनिस्ट लोग अच्छी तादाद में थे, और वे सोवियत संघ से प्रकाशित होने वाले तमाम विचारों और लेखन-सामग्री को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं को उपलब्ध कराते। मैं उनको ध्यान से पढ़ता था और तब मेरे अन्दर भी सोवियत संघ के प्रति एक विशेष अनुराग पैदा होता। पर वह दिन भी आया जब सोवियत संघ का बिखराव हुआ और कश्मीर भी आंतक की बलि चढ़ गया। वे मुझे तत्कालीन राजनीति की नब्ज़ को समझाने की कोशिश करते। मैं अबोध शिशु की तरह उनका चेहरा देखता और अपने आधुनिक इतिहास के ज्ञान में थोड़ी वृद्धि पाता।
 
चपरासी आकर जूठी प्लेटें हटा जाता है और आइसक्रीम की बाबत पूछता है पर उसे वे दो कड़क चाय लाने का आदेश देते हैं। तभी उनके मोबाइल में मैसेज टोन आता है, वे मैसेज को पढ़ते हैं और मेरी तरफ नज़र उठाकर बोलते हैं, बेटे का मैसेज है। अब वे अपने बेटे के बारे में बताने लगे। पिछले दिनों उसने एक नौकरी हेतु आवेदन किया और जमकर मेहनत की पर रिजल्ट निगेटिव रहा। मैं उस पर काफी नाराज़ हुआ और उस पर हाथ भी उठा दिया। एक हफ्ते के भीतर ही वह नाराज़ होकर अपनी मम्मी के पास विदेश चला गया। हँसते हुए बोले- अच्छा ही किया उसने, यहाँ पर तो कैट, एम्स जैसी परीक्षाओं के पेपर लीक होकर बिक रहे हैं, फिर अच्छी नौकरी की क्या गारंटी? वहाँ विदेश में अच्छा पैसा कमाता है। एक लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले, यह भी एक तरह का मानसिक आतंकवाद ही है।
 
बातों का सिलसिला फिर कश्मीर की तरफ मुड़ गया। वे बताने लगे जब मेरी नियुक्ति कश्मीर में थी तो जब भी अपने गाँव पहुँचता तो मोहल्ले की सारी औरतें चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान, मेरी कार को बाँहों में घेरकर चूमने की कोशिश करतीं। उनके लिये मेरी कार ही मेरे बड़े अधिकारी होने की पहचान थी। मैं अपने गाँव का पहला व्यक्ति था, जो इतने बड़े ओहदे तक पहुँचा था। जब भी मैं गाँव जाता तो सभी बुजुर्ग हिन्दू और मुसलमान मेरा हालचाल लेने आते। पाँव छूते ही वे मुझे बाँहों में भर लेते और बोलते- बेटा तू तो बड़ा अधिकारी बन गया है, अब तो दिल्ली में ही कोठी बनवायेगा। मैं कहता- नहीं चाचा, मैं तो यहीं अपने पुश्तैनी मकान में ही रहूँगा.......... अचानक उनकी आँखों की कोर से दो आँसू टपके और उनका गला भर्रा गया। पर मेरा सपना, सपना ही रह गया....न जाने कितने दिन हो गये मुझे कश्मीर गये। पिछले दिनों अख़बार में पढ़ा था कि मेरे गाँव में सेना और आतंकवादियों के बीच गोलीबारी हुयी है। आतंकवादी जिस घर में छुपे हुये थे, वह मेरा ही पुश्तैनी मकान था.......पुरखों की बनाई हुयी अमानत और मेरे सपनों का इतना बुरा हश्र होगा, कभी सोचा भी नहीं था। अब तो किसी को बताने से भी डर लगता है कि मैं कश्मीरी हूँ। आँसुओं को रूमाल से पोंछते हुए वे कह रहे थे- पता नहीं हमारे कश्मीर को किसकी नज़र लग गई?
 
हमने कभी किसी को हिन्दू-मुसलमान की निगाह से नहीं देखा। पर कुछ लोगों के चलते हम अपने ही घर में बेगाने हो गये। जिन हिन्दू-मुसलमानों ने कभी एक-दूसरे के त्यौहारों और सुख-दुःख को साथ जिया था, आज उन्हें ही जेहादी और शरणार्थी जैसे नामों से पुकारा जाने लगा। कुछ देर तक वे ख़ामोश रहे और फिर बोले, अपने जीते जी चाहूँगा कि कश्मीर एक दिन फिर पहले जैसा कश्मीर बने और मैं वहाँ पर एक छोटा-सा घर बनवा कर रह सकूँ......पर पता नहीं ऐसा होगा कि नहीं?
दरवाज़े पर खड़ा चपरासी बता रहा था कि चीफ मैडम मीटिंग के लिये बुला रही हैं। वे अभी आया कहकर बाथरूम की ओर बढ़ गये.....शायद अपने चेहरे की मासूम कश्मीरियत धुलकर एक अधिकारी का रौब चेहरे पर लाने हेतु।

- कृष्ण कुमार यादव
 
रचनाकार परिचय
कृष्ण कुमार यादव

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