प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए
मासूमियत क्यों आहत हो!
 
 
बहुत देर से एक युवती को अपने चेम्बर के बाहर बैठा देखकर मेरे मन में एक सवाल उठा, क्यों बैठी है यह युवती? जबकि दो बार रिसेप्शनिस्ट ने उसको आवाज़ देकर पूछ लिया, क्या हुआ है आपको? क्या चाहती हैं आप? किसी परिचित का इंतज़ार है आपको? या फिर आपके यहाँ आने की वजह क्या है? चूंकि रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ बुलंद थी तो मुझे उसका तो सुनाई दिया पर उस युवती ने क्या कहा, मेरे कानों तक नही पहुँचा। मेरे भी मरीज़ लगातार आ जा रहे थे तो मैं भी उसको बीच-बीच में देख लेती पर उठकर उसके पास जाने का नहीं सोच पाई। अब उसको क़रीब-क़रीब दो घंटे से गुमसुम ही बैठा देख मुझसे रहा नहीं गया तो उठ कर उसके पास पहुँची और मैंने उसको कहा- "अंदर आने का मन हो तो आ जाओ, क्या नाम है तुम्हारा?" मेरे प्रश्न पूछते ही मशीन के जैसे भावविहीन वो उठ खड़ी हुई और अंदर आकर मेरे पास की कुर्सी पर बैठ गई।
 
"दिशा हूँ मैं।" कहकर वह शान्त मेरे चेहरे की तरफ एकटक देखने लगी। उसकी चुप्पी को तोड़ने के उद्देश्य से मैंने उससे अगला प्रश्न पूछा- "दिशा तुम कैसा महसूस कर रही हो इस समय, अगर तुम ठीक महसूस कर रही हो तो कुछ पूछूँ तुमसे। हम्ममम्म...करके वो तो चुप हो गई पर उसकी आँखों से आँसुओ की एक अविरल धारा बह चली। शायद मेरे व्यवहार में उसको कुछ अपनापन महसूस हुआ हो और उसके हृदय के उद्वेग उमड़ पड़े हों। अपनी कुर्सी से उठकर मैंने उसके सर पर हाथ रखा ही था कि उसने मेरे से चिपककर सुबकते हुए रोना शुरू कर दिया। उसके लिए मैंने पानी मँगवाया और उससे पूछा- "दिशा अगर अभी और रोना चाहती हो तो पूरी भड़ास निकाल लो फिर शान्त होकर चाहो तो मुझे अपना मानकर,कुछ अपनी बातें कह सकती हो। कोई भी दबाब नहीं। आज नहीं तो कल जब तुमको ठीक लगेगा; हम बात करेंगे, पर आज इस अनकहे सैलाब की वजह को निर्द्वन्द ही बहने दो।"
 
काफी देर के बाद जब उसका रोना बंद हुआ, तब हल्की-सी अनचाही मुस्कुराहट के साथ वो उठी और बोली मेरा कल का कोई समय नियत कर दीजिए, आज मुझसे आपसे अच्छी तरह बात नहीं होगी मैम। मैं कल आऊँगी। मैंने उसके आने का समय सवेरे नौ बजे का निश्चत कर दिया। अगले दिन सवेरे-सवेरे जब मैं पहुँची तो दिशा को सामने पाया।
"गुडमार्निंग दिशा। कैसी हो? अच्छा लगा तुमको नियत समय पर पाकर। आज मुझसे बात करना चाहोगी ऐसा तुमको देखकर मैं महसूस कर पा रही हूँ।"
"जी मैम! आज आपको मुझे समय देना ही होगा क्योंकि मैं स्वयं के लिए ही परेशान हूँ। मेरी समस्या मुझसे ही जुड़ी है। मेरा अपना क्रोध मेरे लिए बहुत बड़ी समस्या बनता जा रहा है। मेरे पति उच्चपदासीन है। दो बच्चों से मेरा घर कुसुमित है। मुझे किसी भी बात या किसी चीज़ की कमी नही है पर मुझे किसी भी छोटी या बड़ी बात पर आया हुआ क्रोध घर की शान्ति को भंग कर देता है। इस अवस्था में मुझे समझ नहीं आता, मुझे क्या करना चाहिए क्या नही? मैं उल्टा सीधा बोलकर ही चुप नहीं होती हूँ बल्कि जो हाथ में आ जाये उसको फेंक भी सकती हूँ। ऐसी स्थिति में मेरे पति व बच्चे सब इधर-उधर हो जाते हैं, क्योंकि उनको भी नहीं पता इस स्थिति में क्या करना चाहिए। कल जब मैं यहाँ दो घंटे तक बैठी रही तब क्रोध की स्थिति में ही घर से आई थी। तब आपने अवलोकन किया होगा कि इतना समय गुज़रने के बाद भी मैं आपसे बात करने की स्थिति में नहीं थी।" दिशा अब चुप होकर मेरी और एकटक देखने लगी। शायद उसे मेरी प्रतिक्रिया अपेक्षित थी।
 
"हम्म्म्म! बोलती जाओ दिशा सुन रही हूँ तुमको मैं। सच कहूँ तो मुझे तुम्हारी ख़ुद के प्रति ईमानदारी बहुत पसंद आई। अब अगर अपना बचपन से जुड़ा कुछ शेयर करोगी तो अच्छा लगेगा मुझे क्योंकि कई बार समस्याओं के समाधान भूतकाल के किसी भी कालखण्ड में छिपे हो सकते है।" मेरी बात को सुनकर दिशा ने आगे बोलना जारी रखा।
"व्यक्तिगत रूप में मेरे माता-पिता दोनों ही बहुत पढ़े-लिखे, बहुत अच्छे इंसान थे। पापा उच्चपदासीन और माँ सुघड़ गृहिणी। पर दोनों के बीच आये दिन किसी न किसी बात पर मनमुटाव इतना बढ़ता कि महीनों तक बातचीत के आसार नज़र नहीं आते। आज सोचती हूँ तो लगता है दोनों का अहम बहुत बड़ा था, वही उन दोनों के आपसी कलह की बहुत मजबूत-सी वजह भी था। उस समय दोनों के बीच का अवसाद हम बच्चों पर उतरता। तेज़-तेज़ चीखों के बीच होता उनका वार्तालाप, मुझे दहशत में भर देता तो कभी रात-रात भर जागने को मज़बूर कर देता। जब बहुत छोटी थी तो बहुत ज़्यादा समझ नहीं आता था पर जैसे-जैसे बड़ी हुई तो समझ आया कि बे-मेल विवाह जैसी चीज़े भी होती हैं। जहाँ साथ रहना कभी बच्चों की वजह से मज़बूरी तो कभी वापस विवाह न कर पाने की आर्थिक स्थिति। जब माँ-पापा लड़ते, तब कसकर अपनी मुट्ठियों को भींचकर या अपने कान बंद कर उनकी चीखों को दबाने की भरसक कोशिशें करती पर, बेवजह की हमारी पिटाई बहुत आहत करती थी हम दोनों भाई-बहन को। बचपन का क्रोध कब मेरे अंदर-अंदर गहराता गया; मेरा युवा होता मन कभी नहीं समझ पाया। आज मेरे बच्चे और पति बहुत अच्छे हैं, उन्होंने मेरे इस क्रोध को कम करने की बहुत कोशिश की पर वो भी हार गए। उनके कहने पर ही मैं आपके सामने अपनी समस्या को लेकर आ पाई हूँ, क्योंकि बहुत परेशान हूँ ख़ुद से ही मैं।"
 
दिशा को एक गिलास पानी पिला; मैंने उसको निश्चिंत रहने का आश्वासन दिया और हफ्ते में चार दिन उसकी कॉउंसिललिंग का समय नियत कर बराबर आने को कहा। कुछ दवाइयों और योग के मिले-जुले अभ्यास से दिशा तो चार-छः महीने में धीरे-धीरे स्वस्थता की ओर बढ़ती गई पर हर सेशन में उससे हुई बातचीत न जाने कितनी ही बार मुझे सोचने पर मज़बूर करती गई कि नन्हीं कोपलें कितनी ही बार वो दर्द अंदर ही अंदर सहेजती जाती हैं जो कि उनकी पीड़ा की वजह बनती है। स्वस्थ बचपन हर बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए कितना ज़रूरी होता है, मेरी सोच के साथ-साथ अनगिनत प्रश्न खड़े करता गया। परिवार की नींव रखते ही पति-पत्नी को नवजीव को लाने से पूर्व यह नियोजित ज़रूर करना चाहिए कि वो वास्तव में माँ-पिता बनने योग्य हैं भी कि नहीं। शारारिक और मानसिक रूप से सकारात्मक व स्वस्थ्य होना दोनों के आपसी रिश्ते के लिए ही नहीं बल्कि आने वाले नवागंतुक के लिए भी ज़रूरी है। कोई भी मासूम उनके कलह का भागी बने, सोचनीय है क्योंकि क्रोध नकारात्मक सोच की चरम प्रतिक्रिया है, जहाँ सोच-विचार जैसे भाव खत्म हो जाते है और नकारात्मक उर्जा ही प्रवाहित होती है। जब तक कोई भी नकारात्मक भाव स्वयं तक ही सीमित रहे तब तक ही ठीक रहता है, पर जब किसी भी नकारामक भाव का असर आस-पास के लोगों पर भी होने लगे तो समस्याएं जन्म लेती हैं और ऐसे ही नकारात्मक भावों का असर जब परिवार में बच्चों पर पड़ने लगे तो नवांकुर बचपन बिखरने लगता है और मासूमियत बहुत आहत होती है।
 
विषय बहुत सोचनीय है क्योंकि वर्तमान के अनुभव भविष्य में किस रूप में सामने आएँगे, इसका निर्धारण बहुत सोच-समझ से जुड़ा हुआ है। क्यों आहत हो मासूमियत? परिवार की नींव परिपक्व सोच और प्रेम से सींची हो तो मासूस व्यक्तित्व में भी बिखराव कम नज़र आएगा। सोचिएगा ज़रूर।

- प्रगति गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रगति गुप्ता

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