प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
नेकियों का असीर ज़िन्दा है
मुझमें कोई फ़क़ीर ज़िन्दा है
 
शायरी ने किसे दिया मरने
देख लो अब भी मीर ज़िन्दा है
 
झूठ को झूठ ही कहेंगे वो
अब भी जिनका ज़मीर ज़िन्दा है
 
बाँटता हूँ ख़ुशी ज़माने को
मुझमें कोई अमीर ज़िन्दा है
 
सोचता है भला जो बस अपना
सब में ऐसा हक़ीर ज़िन्दा है
 
मान लूँ हार किस तरह अपनी
खेल में जब वज़ीर ज़िन्दा है
 
और कुछ भी बचा नहीं मुझमें
सिर्फ़ इक राहगीर ज़िन्दा है
 
जो बताती है बावफ़ा हूँ मैं
हाथ में वो लकीर ज़िन्दा है
 
देखकर शायरी 'अहद' तेरी
लग रहा है कबीर ज़िन्दा है
 
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ग़ज़ल-
 
दुनिया की सैर का ये चक्कर नया-नया है
जिस ओर देखता हूँ मंज़र नया-नया है
 
बिल्कुल अलग जहां से हालत है मेरे दिल की
अन्दर से ये पुराना बाहर नया-नया है
 
बेचैन इसलिए हूँ मख़मल की सेज पर मैं
मेरे लिये अभी यह बिस्तर नया-नया है
 
लगने लगी जहां की हर चीज़ रायगां अब
बदलाव-सा ये मेरे अन्दर नया-नया है
 
बेहतर बता सकेगा वो घर की एहमियत को
जग में हुआ अभी जो बेघर नया-नया है 
 
ख़ुद पर गुरूर तुमको शायद है इसलिए ही
ये हाथ में तुम्हारे ख़ंजर नया-नया है
 
मेरे जुनून से वो वाक़िफ़ नहीं है शायद
जो मेरे रास्ते का पत्थर नया-नया है
 
धरती के साथ उसने रिश्ते भुला दिये सब
वो शख़्स जिसके सर पर अम्बर नया-नया है
 
भाते नहीं हैं इसको ये बूढ़ी सोच वाले
जो साथ है 'अहद' के लश्कर नया-नया है
         
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ग़ज़ल-
 
ज़िन्दगी के क़रार की चिट्ठी
भेज दी उसने प्यार की चिट्ठी
 
रात-दिन बार-बार पढ़ता हूँ
है मज़ेदार यार की चिठ्ठी
 
ये यकीं है ज़रूर आयेगी
इस खिज़ां को बहार की चिट्ठी
 
एक दिन तेरे नाम भेजूँगा
मैं करोड़ों-हज़ार की चिट्ठी
 
रंज है ये कि पढ़ नहीं पायी
वो मेरे इन्तज़ार की चिट्टी
 
याद में बार-बार रोया था
पढ़ के मैं एक बार की चिट्टी
 
दे गयी है सुकून बेटे को
एक माँ के दुलार की चिट्ठी
 
बेवफ़ा बोलकर मुझे उसने
फाड़ दी एतबार की चिट्ठी
 
आज भी पास है 'अहद' मेरे
इक हसीं यादगार की चिट्ठी
 
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ग़ज़ल-
 
हर पल ये महसूस किया है
कलियुग में मानव सस्ता है
 
देख न पाये जनता का दुख
इस युग का राजा अंधा है
 
साथ न जायेगा जब कुछ भी
फिर क्या दुनिया में अपना है
 
देख के दिल्ली की घटना को
हर लड़की का दिल सहमा है
 
माँ का प्यार छुपा है इसमें
मैंने जो स्वेटर पहना है
 
प्यार जिसे है हर मज़हब से
वो रब का सच्चा बन्दा है
 
कौन यहाँ क्या है, वो जाने
वो सबके दिल में रहता है
 
बच्चों के नाज़ुक कंधों पर
अब कितना भारी बस्ता है
 
जबसे बिछड़ा यार 'अहद' का
तब से वो चुप-चुप रहता है
 
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ग़ज़ल-
 
काश ऐसा समाज हो जाये
प्यार जिसका रिवाज हो जाये
 
प्यार ही प्यार हो दिलों में बस
ठीक सबका मिज़ाज हो जाये
 
कोई भूखा मरे न दुनिया में
इतना सस्ता अनाज हो जाये
 
चूर हैं जो थकन से बरसों की
उन पलों की मसाज हो जाये
 
जो बहुत ही ग़रीब हैं जग में
मुफ्त उनका इलाज हो जाये
 
मज़हबी रोग से जो पीड़ित हैं
अब तो उनका इलाज हो जाये
 
जानता हूँ फ़रेब देगा वो
कल जो होना है आज हो जाये
 
ऐ ख़ुदा इस जहान में हर-सू
बस मुहब्बत का राज हो जाये
 
शायरी तो 'अहद' बहुत कर ली
अब ज़रा कामकाज हो जाये
 
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ग़ज़ल-
 
ज़िन्दगी के वास्ते ये ठीक है
धड़कनों के वो बहुत नज़दीक है
 
मर रही हैं कोख में अब लड़कियाँ
आ गयी कैसी भला तकनीक है
 
किसने अगवा कर लिया है चाँद को
रात कितनी आज ये तारीक है
 
पाप इससे कोई छुप सकता नहीं
इस क़दर रब की नज़र बारीक है
 
बेबसी में जो किसी ने हो किया
समझो वो एहसान भी इक भीक है
 
हो रहे हैं दफ़्न आशिक रोज़ ही
ऐ जहां ये कौन-सी तहरीक है
 
दुश्मनी मत कर किसी से तू 'अहद'
हर बशर से प्यार करना ठीक है

- अमित अहद
 
रचनाकार परिचय
अमित अहद

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