प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धरोहर
 क्या भूलूं क्या याद करूँ  :~ “पद्दमभूषण” हरिवंश राय ‘बच्चन’
           (27 नवंबर 1907 – 18 जनवरी 2003)  
 
‘किसी भी बात को सबसे अधिक महत्वपूर्ण तरीके से कहने की कला का नाम कविता है कवि को अपने पाठकों से सीधा संबंध बनाना चाहिए। सिफारिश से न प्रेमी मिलता है न पाठक। कवि को आत्मविश्वासी होना चाहिए’ –@..... हरिवंश राय बच्चन
 
हरिवंश राय बच्चन ‘उत्तर छायावाद’ के प्रमुख और प्रतिष्ठित हिंदी के पहले लोकप्रिय कवि हैं। बच्चन के पूर्व या उसके बाद दूसरे किसी हिंदी कवि को अपने जीवन काल में और कभी जीवन के प्रारंभ में इतनी लोकप्रियता नहीं मिली। अपनी लोकप्रियता में वे अप्रतिम है। बच्चन ‘आह और वाह’ के कवि थे। उनकी लोकप्रियता का दबाब यह था कि उत्तर छायावाद काल के हिंदी साहित्य का पूरा का पूरा मूल्यांकन लगभग बच्चन जी  को केंद्र में रखकर देखा-परखा गया। 
मधुशाला की रचना 1933 में हुई। 1934-36 में यह ज्यादा चर्चित हुई। उसी अवधि के लेखक श्री रामवृक्ष शर्मा बेनीपुरी ने बिहार के युवकों को मधुशाला गा-गाकर शराब पीते देखा था और वे कह रहे थे, बच्चन अगर बिहार में कदम रक्खेगा, तो उसे मैं गोली मार दूंगा! विडंबना है कि बच्चन ने कभी शराब छुई ही नही। मधुशाला लोकप्रिय क्यों हुई? क्या काव्य के अंतर्निहित गुण के कारण? अगर कभी कोई समाज-विज्ञानी इस पर शोध करे और विश्लेषण करे तो बहुत ही आश्चर्यजनक निष्कर्ष निकलेंगे। पर यह बात तो तय है कि मधुशाला की लोकप्रियता के कारण कहीं बाहर थे।
लगभग 1936-37 का वही वर्ष, जब काशी में हिंदी की दो महान विभूतियों का देहांत हुआ था। जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद कम ही उम्र में, लेकिन हिंदी साहित्य को घनीभूत कर चुके थे। काशी में ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय में मधुशाला का पहला सार्वजनिक पाठ हुआ, जिसने बच्चन को लोकप्रियता की राह पर अग्रसर कर दिया, ठीक उसी प्रकार जैसे कुछ बरस पहले इसी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भारतीय राजनीति में शुरुआती कदम रख रहे दक्षिण अफ्रीका से लौटे गांधी के व्याख्यान ने उन्हें भी लोकप्रियता और विवाद का एक बड़ा मंच दे दिया था।
 
सन 1973 में अपनी ही घोषणा के अनुसार बच्चन का अंतिम काव्य-संग्रह प्रकाशित हुआ था- ‘जाल समेटा’। उस संग्रह में छोटी सी कविता है- ‘बूढा किसान’। कविता बहुत प्रसिद्ध नहीं हो सकी । फिर भी वह पूरी कविता मैं उद्धृत कर रहा हूं इसलिए कि शायद इससे बच्चन के कवि रूप का सही स्तर का अनुमान मिल सकेगा। 
बूढा किसान -
अब समाप्त हो चुका मेरा काम। 
करना है बस आराम ही आराम। 
अब न खुरपी, न हँसिया,
मेरी मिटटी में जो कुछ निहित था,
यूज़ मैंने जोत-बो,
अश्रु-स्वेद-रक्त से सींच निकाला,
काटा,
खलिहान का खलिहान पाटा
अब मौत क्या ले जाएगी मेरी मिट्टी से ठेंगा। 
 
कविता के इस रूप में बच्चन की यह आत्मस्वीकृति है। इस कविता की भाषा को सुनिए। भीतर बैठे व्यक्ति को पहचानिए। उम्र के चौथेपन में अपना सारा काम समाप्त करके अपने पिछले जीवन को निहारता यह व्यक्ति कौन है? मौत को ठेंगा दिखाते मजबूत आत्मविश्वास वाले व्यक्ति का नाम क्या है? बूढा? जी हां !  एक फक्कड़ भारतीय वृद्ध, जो दुनिया के तमाम ज्ञान-विज्ञान को चिंतन-दर्शन को अपने अनुभवों की जांच में पकाकर ही अपनाता है। अपने अनुभवजनित ज्ञान पर अटूट आस्था रखने वाले और दुनिया की किसी भी नई वस्तु को थथमथाकर शंकालु दृष्टि से देखने वाले परम संतुष्ट इस व्यक्ति का नाम है भारतीय वृद्ध।
 
बच्चन के आलेख में बुढ़ापे और किसान को याद करना थोड़ा अटपटा लग सकता है। किसान-कर्म से यथासंभव परहेज रखनेवाली, नौकरी को महत्व देनेवाली, नगरोन्मुखी  कायस्थ जाति में 27 नवंबर 1907 में जन्म, इलाहाबाद में शिक्षा-दीक्षा, नौकरी, फिर दिल्ली, लंदन, मुंबई जैसे महानगरों में रहने वाले, अंग्रेजी पढ़ाने वाले प्राध्यापक बच्चन का किसान से क्या संबंध हो सकता है भला ! किसान प्रतीक है और हममें कौन किसान नहीं है! अज्ञेय की आधुनिक चमड़ी को थोड़ा खुरचने पर हमें किसान झांकता मिलेगा। लोहिया तो दिल्ली तक को बड़ा-सा गांव है मानते थे और बच्चन का जो समय है, वह भारतीय नगरों पर कुंडली मारकर बैठे ग्रामीण संस्कार और मानसिकता का है। लेकिन मस्ती और मादकता, जोश और जवानी लुटाने वाले कवि को वार्धक्य से जोड़ना क्या उचित है। बच्चन ने खुद को भी मस्ती का खोजी ही कहा है-
वह हाला, कर शांत सके जो/ मेरे अंतर की ज्वाला, 
जिसमें मैं बिम्बित प्रतिबिंबित/ प्रतिपल वह मेरा प्याला, 
मधुशाला वह नहीं जहां पर/ मदिरा बेची जाती है 
प्रीत जहां मस्ती की मिलती/ मेरी तो वह मधुशाला।
तीस के दशक का यह एक युवक है, जिसका अंतर ज्वालाओं से भरा हुआ है। वह युवा मधुशाला के रूप में कैसे समाज की खोज और निर्माण में है, जिसमें मस्ती और ही मस्ती है। अंतर की यह वाला विद्रोह की है। तमाम झूठी नैतिकताओं, बंधनों और दासता के प्रति विद्रोह और इसी विद्रोह की आग उसके अंतर में जल रही है।
 
उत्तर छायावादी कविता अपनी सहजता, सरलता, लोकप्रियता और मास अपील के कारण भक्ति काव्य की याद दिलाती है। आधुनिक हिंदी काव्य का इतिहास में उत्तर छायावादकालीन कविताएं कहावतों की तरह लोगों की जुबान पर चढ़ती है। ‘जो बीत गई सो बात गई’ (बच्चन) हों या ‘माया के मोहक वन की क्या कहूं कहानी परदेसी’ (दिनकर), ‘कल्पना करो नवीन कल्पना करो नवीन कल्पना करो’ (नेपाली) हों या ‘कितनी बार तुम्हें देखा पर आंखें नहीं भरी’ (सुमन) जैसी पंक्तियां हिंदी भाषी समाज के शिक्षित लोगों की जुबान पर बात-बात में आज भी चढ़ी हुई है और इस रूप में यह उर्दू शायरी से होड़ लेती है। ये अकारण नहीं है कि इस काल के प्रायः सभी प्रमुख कवि का काव्य-पाठ अत्यंत आकर्षक, मोहक और नाटकीय शैली में विकसित है। नेपाली, बच्चन, दिनकर, जानकी वल्लभ शास्त्री, रूद्र, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के प्रभावशाली काव्य पाठ जिन्होंने सुने हैं, उन्हें पता है कि कविता को किताबों से निकाल कर उसे जनता के बीच समादृत करने में इन कवियों की कितनी बड़ी भूमिका है और इस रूप में कविता की तुलना सिर्फ भक्ति की कविता से हो सकती है। वही गायकी, वही तन्मयता, वही फक्कडपन इस दौर की कविता में भी है। पन्त जी ने बच्चन के बारे में लिखा है कि "वह ‘रूपाभ’ के संपादन के जमाने में तुलसीदास की कविताएं, विशेष रूप से ‘विनय पत्रिका’ और ‘निशा निमंत्रण’ खूब पढ़ता था और उसमें डूबा रहता था।" क्या ‘विनय पत्रिका’ और ‘निशा निमंत्रण’ तथा ‘एकांत संगीत’ आदि में समानता के कुछ सूत्र है? इसका अध्ययन करने पर दोनों काल की कविताओं की कुछ समान भावभूमियों को देखा जा सकता है।
 
उत्तर-छायावाद के सर्वाधिक लोकप्रिय और समर्थ कवि हैं बच्चन। उनकी ‘मधुशाला’ हो या दूसरी मधुवर्षी कविताएं उनमें सिर्फ प्रतीक के रूप में मधु है, शेष सारी चीजें अपने समय और समाज की है, जो राष्ट्रीय आंदोलन की हलचलों से पैदा हुई है। ‘मधुशाला’, ‘मधुबाला’, ‘मधुकलश’ आदि में धर्म और समाज के ठेकेदारों की जो आलोचना की गई है, उससे सभी पाठक परिचित हैं।
‘मधुशाला’, ‘मधुबाला’, ‘मधुकलश’ के बाद बच्चन की काव्य-प्रतिभा ‘निशा निमंत्रण’ और ‘एकांत संगीत’ में शिखर पर दिखती है। व्यक्ति-मन की जैसी निजी और अनोखी दुनिया ‘निशा निमंत्रण’ में दिखाई देती है वैसी हिंदी कविता में पहले नहीं दिखी थी। भले ही निराला ने लिखा हो कि ‘मैंने मैं शैली अपनाई’ और पंत ने ‘बालिका’ को अपनी ‘मनोरम मित्र’ माना हो, लेकिन जिसे आधुनिक अर्थों में व्यक्ति कहते हैं और जिसे व्यक्ति का निजी सुख-दुख कहते हैं वह पहली बार हिंदी कविता में पूरे उत्कर्ष के साथ बच्चन में दिखता है। इसलिए ‘निशा निमंत्रण’ का हिंदी कविता में ऐतिहासिक महत्व है। लेकिन उसके बाद उनकी कविताओं को वैसी लोकप्रियता नहीं मिलती, हाँलाकि  बच्चन की निगाह इस बीच समाज में हो रहे महत्वपूर्ण परिवर्तन से हटी नहीं है। लेकिन कोई एक ऐसी चीज उनके कवि-व्यक्तित्व से गायब हो चुकी है, जिससे यह कविताएं अब वह समां नहीं बाँध पाती जिससे लिए उनकी ख्याति रही है।
 
चौथे दशक का विद्रोही युवा सन 50 के बाद दिल्ली का एक संतुष्ट नागरिक बन जाता है। बच्चन के परवर्ती साहित्य के रचनाकार के भीतर से चौथे दशक का अंतर में ज्वाला लिए युवा गायब है। गायब है वह युवा बेचैनी जो एक रचनाकार की सबसे बड़ी पूँजी है। रह गया है एक संतुष्ट मध्यमवर्गीय नागरिक और खाता-पीता किसान, जो अभ्यस्त होने के कारण बहुत कुछ लिखता रहता है। कभी भीतर की बौद्धिक नागर चेतना ‘बुद्ध और नाचघर’ लिखती है, कभी  भीतर की लोक-चेतना लोकधुनों पर आधारित गीत- ‘मेले में खोई गुजरिया/ मिले मुझसे मिलाए’।
 
अंत में रह जाता है सिर्फ वार्धक्य। जीवन से परम संतुष्ट और चौथेपन के संन्यास में जीता। ‘जाल समेटा’ की भूमिका में बच्चन ने लिखा है- ‘कविता ‘मोह’ से शुरू होती है और ‘मोहभंग’ पर समाप्त’। यह मोहभंग क्या युवा सपने का मोहभंग था? यही ‘मोहभंग’ क्या दिनकर से ‘हारे को हरिनाम’ लिखा रहा था और बच्चन से ‘बूढा किसान’?
 
 

- नीरज कृष्ण