प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास मुलाक़ात
"लघुकथा में, लघु आकार हो सकता है लेकिन चिंतन नहीं।" - मुरलीधर वैष्णव
 
 
 
 
सुप्रसिद्ध साहित्यकार मुरलीधर वैष्णव जी की गद्य एवं पद्य विधाओं की अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपका कहानी संग्रह ‘पीड़ा के स्वर’, काव्य संग्रह ‘हैलो बसंत’, दो लघुकथा संग्रह ‘अक्षय तूणीर’ (पत्रिका प्रकाशन), ‘कितना कारावास’ (बोधि प्रकाशन) तथा पाँच बाल कथा संग्रह व एक बाल गीत संग्रह प्रकाशित हुए हैं।
जोधपुर निवासी, सरल, सहज, मृदु स्वभाव के स्वामी वैष्णव जी को वर्ष 2002 में राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार (पत्रिका में छपी श्रेष्ठतम कहानी हेतु), राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा विशिष्ट साहित्यकार सम्मान 2012 सहित विभिन्न विधाओं में डेढ़ दर्जन से अधिक पुरस्कार/सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। उनकी अहमदाबाद यात्रा के दौरान 'हस्ताक्षर' की संस्थापक एवं संपादक प्रीति 'अज्ञात' ने उनसे मुलाक़ात की तथा हमारे पाठकों के लिए उनके व्यक्तित्त्व और कृतित्त्व पर विस्तार से चर्चा भी की। उसी बातचीत के कुछ अंश आपके समक्ष प्रस्तुत हैं -
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- अपने प्रारंभिक दिनों के बारे में कुछ कहिये। उस समय किन लेखकों ने आपको प्रभावित किया तथा आप अपना प्रेरणा स्त्रोत किन्हें मानते हैं?
मुरलीधर वैष्णव- मेरा जन्म 9 फरवरी, 1946 को जोधपुर के एक कृष्ण मंदिर में हुआ। माता-पिता के अत्यन्त सादगीपूर्ण एवं संस्कारमय होने से पारिवारिक वातावरण अच्छा था। गरीबी थी, फ़ाक़े थे लेकिन खूब ठहाके भी थे। उन दिनों टीवी/मोबाइल जैसे वक्त के डाकू तो क्या हमारे यहां रेडियो तक नहीं था। अतः प्रकृति के सामीप्य, खेलकूद, व्यायाम, पठन-पाठन का खूब समय मिलता था।
1962 में मेट्रिकुलेशन व 1966 में हिन्दी, अंग्रेजी साहित्य व दर्शन शास्त्र विषयों में बी0ए0 पास किया। 1968 में एल0एल0बी0। स्नातक कोर्स के दौरान एन0सी0सी0 में ‘सी’ सर्टिफिकेट पास करने के साथ सीनियर कैडेट अंडर ऑफिसर रहा। सेना में अफसर बनने की प्रबल इच्छा थी लेकिन घरेलू हालात के कारण सेना में नहीं जा सका। बाद में मुझे अनुभव हुआ कि युद्ध केवल सीमा पर ही नहीं लड़े जाते, ज़िंदगी अपने आप में एक जंग होती है।
कॉलेज शिक्षा के दौरान, प्रेमचंद, टाल्सटॉय, शरतचन्द्र, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, शेक्सपियर, वर्ड्सवर्थ, पी0 शैले ज्यॉर्ज बर्नार्ड शा व बाद में अज्ञेय, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा आदि ने खूब प्रभावित एवं प्रेरित किया। वैसे मेरे सर्वाधिक प्रेरक-आदर्श स्वामी विवेकानन्द हैं।
 
प्रीति ‘अज्ञात'- आपके घर परिवार में कौन कौन हैं ? क्या उनमें से भी किसी का रुझान लेखन की ओर है ?
मुरलीधर वैष्णव- परिवार में मेरी पत्नी पुष्प, तीन बेटे व एक बेटी है। बड़ा बेटा भारत सपरिवार टोरंटो (कनाडा) में व मंझला बेटा शारजाह में सपरिवार रहते हैं। वे वहां अच्छे पद पर हैं। बेटी अहमदाबाद में सहा0 प्रोफेसर (मनोविज्ञान) के रूप में कार्यरत है व सबसे छोटा बेटा जोधपुर में सपरिवार हमारे साथ रहता है। वह वकील है। मेरी पत्नी साहित्यानुरागी है। मेरी चारों संतानों को भी साहित्य में रुचि है।
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- आपकी साहित्यिक यात्रा कब और कैसे आरम्भ हुई? क्या आपकी प्रथम प्रकाशित रचना आंग्ल भाषा की थी? 
मुरलीधर वैष्णव- जी, मेरी सबसे पहली रचना 1966 में अंग्रेजी कविता ‘मैसेज‘ के रूप में थी जो उस वर्ष की विश्वविद्यालय वार्षिक पत्रिका में छपी थी। फिर मोंपासा (प्रसिद्ध फ्रेंच कथाकार) की कहानी ‘पीस ऑफ स्ट्रिंग’ एवं अन्य का हिन्दी में अनुवाद किया। मेरी पहली कहानी ‘मांद से ड्राईंग रूम तक’ 1984 में ‘मुक्ता‘ में छपी। खुशी की बात है कि उसका अंग्रेजी व फ्रेंच भाषा में भी अनुवाद हुआ। फिर यदा-कदा कहानियां, लघुकथाएं, कविताएं, आलेख आदि लिखने का सिलसिला चल पड़ा।
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- लेखन में पर्याप्त रुचि रखने एवं जज के रूप में सेवा निवृत्ति होने के बाद भी आप सेवार्थ वक़ालत से जुड़े हैं और साथ-साथ दोनों ही कार्य बेहतर तरीके से संचालित कर रहे हैं, इसके लिए आप निस्संदेह बधाई के पात्र हैं। नौकरी से अब तक की यात्रा कैसी रही? 
मुरलीधर वैष्णव- धन्यवाद, प्रीति जी। मेरा अब तक का जीवन अत्यंत सुखद एवं संतोषजनक रहा। 1968 में एल0एल0बी0 पास करने के बाद लोक अभियोजक बना। 1975 में राजस्थान न्यायिक सेवा में चयनित होकर मजिस्ट्रेट बना। अदालतों में लोक अभियोजक एवं मजिस्ट्रेट/जज के रूप में करीब पैंतीस साल के अनुभव के बाद 2006 में मैं वरिष्ठ सेशन न्यायाधीश पद से रिटायर हुआ। लेकिर टायर (थका) अभी भी नहीं हुआ हूँ। रिटायरमेंट के बाद पांच साल के लिए सरकार ने उपभोक्ता न्यायाधीश के रूप में पुर्ननियुक्ति की। उसके बाद भी राजस्थान न्यायिक अकादमी जोधपुर में प्रशिक्षु मजिस्ट्रेट्स को पढ़ाने के लिए अतिथि विधि प्रोफेसर का कार्य किया। आज भी सेवार्थ वकालत, अनेक सामाजिक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़कर व साहित्य सृजन में यथा सामर्थ्य व्यस्त रहता हूं। अच्छा लगता है। पर्यावरण संरक्षण में विशेष रुचि है। अब तक करीब साढ़े पांच हजार पेड़ लगा चुका हूँ।
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- वैसे तो आप मूलतः गद्य विधा (कहानी, लघुकथा) में ही लिखते हैं पर आपका एक काव्य संग्रह ‘हैलो बसंत’ भी आया है। किस विधा में आप सहज अनुभव करते हैं।
मुरलीधर वैष्णव- साहित्य सृजन में समकालीन चेतना संबंधी चिंतन, कहन, विचार सघनता, भाव प्रणवता व लय आदि बारीक तत्व गद्य में पद्य व पद्य में गद्य के रुप में खूबसूरती से अंर्तसमाहित होने लगे हैं। लेकिन हां, मेरा झुकाव गद्य (कहानी, लघुकथा व निबन्ध) के प्रति ज्यादा रहा है। इसी के साथ यह भी सत्य है कि आत्मिक तृप्ति तो कविता लिखने से ही होती है। कविता का आचमन मुझे भीतर से कई दिनों तक झंकृत रखता है। कविता में अमूर्त सूक्ष्मता से अधिक मुझे लोकधर्मिता के विषय अधिक आकर्षित करते हैं।
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- आपने बाल साहित्य पर भी बहुत काम किया है। बच्चों के लिए लिखते समय आप किन तत्त्वों को प्रधानता देते हैं।
मुरलीधर वैष्णव- यह सर्वविदित है कि बच्चों के लिए लिखना बच्चों का खेल नहीं है। मुझे बच्चों से बहुत प्यार है। मैं अपनी पोती साराह के साथ प्रतिदिन कम से कम दो घंटे खेलता हूँ, उससे बतियाता हूँ। बच्चों के साथ हम हमारे बचपन को पुनः जी पाने का अवसर पाते हैं। निर्मल आनंद हमें तनाव मुक्त करता है। हमारे अहंकार के पारे को कम करता है। सरल रोचक भाषा में नवीन ताज़गी भरे विषयों का मनोरंजक व संदेशप्रद बाल साहित्य सृजन ही सार्थक रहता है। 
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- क्या साहित्यिक संस्थाएं गुटबाजी में उलझ कर रह गई है। आपके शहर की संस्थाओं के क्या हाल हैं?
मुरलीधर वैष्णव- हाँ, सुनने में जरूर आता है। लेकिन मेरा ध्यान इस ओर कम ही जाता है। एक अनुभव मेरा जरूर अप्रिय रहा जब मेरे काव्य संग्रह ‘हैलो बसंत’ की कृष्ण स्तुति की पहली कविता ‘हे वासुदेव’ को पढ़ कर एक ‘प्रगतिशील’ कवि ने किसी से कहा कि ‘क्या ये कवि संघी (आरएसएस के) हैं ? मानो अपने ईष्ट पर कविता लिखना कोई हेय या अप्रगतिशीलता का परिचायक हो। शराब एवं अवैध संबंधों व परिवार की अनदेखी करने वाली जीवनशैली को आधुनिकता व प्रगतिशीलता का पर्याय मानने वाले चंद लेखक ‘जैसा लिख वैसा दिख’ के सिद्धान्त की परवाह नहीं करते। ऐसे में फिर जोड़ तोड़, गुटबाजी एवं साहित्य की मार्केटिंग के फंडों को शह मिलनी तो लाज़मी है।
खुशी की बात है कि जोधपुर स्थित बीस से अधिक साहित्यिक संस्थाओं का वातावरण कमोवेश अच्छा, सौहार्द्रपूर्ण व आपसी सहयोग वाला है।
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- आपकी पुस्तकों की परिकल्पना व प्रकाशन से जुड़े अनुभवों के बारे में विस्तार से बतलाएं।
मुरलीधर वैष्णव- मेरी पहली पुस्तक, कहानी संग्रह ‘पीड़ा के स्वर’ 2002 में सोजत (जिला पाली) के एक स्थानीय प्रकाशन से प्रकाशित हुई। अनुभवहीनता के कारण यह कार्य कुछ महंगा पड़ा। फिर राजस्थान पत्रिका ने मेरा प्रथम लघुकथा संग्रह ‘अक्षय तूणीर’ रॉयल्टी के साथ प्रकाशित किया। उसका दूसरा संस्करण भी उन्होंने प्रकाशित किया। जोधपुर के तेजी से उभरते रॉयल प्रकाशन ने मेरे बाल साहित्य की पांच पुस्तकें प्रकाशित की। यह अनुभव भी अच्छा रहा। बोधि प्रकाशन जयपुर से मेरा काव्य संग्रह ‘हैलो बसंत’ एवं दूसरा लघुकथा संग्रह ‘कितना कारावास’ प्रकाशित हुए। यह एक सामान्य अनुभव है कि आमतौर पर प्रकाशकों का लेखकों के प्रति विशुद्ध व्यवसायिक तथा शोषणात्मक रवैया ही रहता है। यदि पुस्तक स्तरीय है तो फिर रॉयल्टी मिले या न भी मिले पुस्तक तो निःशुल्क छापनी ही चाहिये। सरकारें इस बारे में उदासीन रही है। न तो कोई कानून है इस बारे में न प्रकाशकों पर अंकुश। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। बड़े एवं स्थापित लेखकों को तथा सरकार व एकेडेमियों को इसके लिए कुछ करना चाहिये।
 
प्रीति ‘अज्ञात‘- आपका पहला पुरस्कार व उससे जुड़ा अनुभव साझा करना चाहेंगे?
मुरलीधर वैष्णव- मुझे पहला राष्ट्रीय स्तरीय राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार वर्ष, 2002 में पत्रिका में छपी मेरी श्रेष्ठतम कहानी ‘अंतिम झूठ’ के लिए मिला, जो पत्रिका में दो भाग में छपी थी। तब मैं पाली में सेवारत था। एक शाम जयपुर से पत्रिका कार्यालय से उक्त पुरस्कार की सूचना मिली। यह अप्रत्याशित खुशी का क्षण था। इससे भविष्य में मुझे और बेहतर लिखने का हौसला भी मिला।
 
प्रीति‘अज्ञात‘- क्या आपकी स्मृतियों में कोई ऐसी घटना है जिसका आपके लेखन या कर्मशीलता पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा?
मुरलीधर वैष्णव- हां, 1983 की बात है। मैं बांसवाड़ा (राजस्थान) के सघन आदिवासी क्षेत्र कुशलगढ़ में मजिस्ट्रेट पद पर तैनात था। थांवरी नामक एक आदिवासी महिला के विरुद्ध मेरी अदालत में चार्जशीट पेश हुई। उस पर अपने ही पति की हत्या का आरोप था। मैंने पत्रावली को गौर से पढ़ा। थांवरी को ध्यानपूर्वक सुना। वह गिड़गिड़ा रही थी कि उसके दुश्मनों ने ही उसके पति की हत्या की व उसकी जमीन हड़पने के लिए उसे झूठा फंसाया है। मुझे लगा कि थांवरी निर्दोष है। खैर, मुकदमा सेशन न्यायालय बांसवाड़ा में चलना था सो मैंने उस मुकदमे को वहां कमिट किया। कुछ अर्से बाद उसके वकील ने बतलाया कि थांवरी को उम्र कैद की सजा हो गई। पता नहीं क्यों, लेकिन मुझे यह सुनकर बड़ा दुख हुआ। वैसे  अदालत में कई आरोपी आते रहते हैं लेकिन मुझे नहीं मालूम कि क्यों मैं थांवरी के लिए प्रार्थना करने लगा। फिर करीब छः माह बाद पता चला कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने थांवरी की जेल अपील स्वीकार करते हुए उसे हत्या के आरोप से मुक्त कर दिया। 
उसके बाद मेरी संवेदनाएं व भीतरी अहसास जैसे अधिक क्रियाशील हो उठे और वह न्याय प्रदान करने में तथा साहित्य सृजन में काफी सहायक बने।
 
प्रीति 'अज्ञात‘- पत्रिका में प्रकाशित होने या पुस्तक प्रकाशन के लिए आज कल लोग तरह तरह के उपक्रम कर रहे हैं। आप इसे किस तरह देखते हैं?
मुरलीधर वैष्णव- साहित्यकार के रूप में एक बार स्थापित हो जाने या व्यक्तिगत सम्पर्क/संबंधों का कुछ प्रभाव तो पड़ता है फिर भी बड़े पत्र पत्रिकाएं रचना के स्तर से समझौता कम ही करते हैं। लेखक को बस श्रेष्ठ सृजन की ओर प्रवृत्त होना चाहिये।अगर उसमें प्रतिभा है तो वह प्रकाशित तो होकर रहता है. आज नहीं तो कल।
 
प्रीति‘अज्ञात‘ - सोशियल मीडिया में हर मुद्दे पर खुल कर कहा जा रहा है। कुछ बातें शालीनता को लांघ कर कही जाने लगी हैं। अभिव्यक्ति की इस हद तक स्वतंत्रता कितनी जायज है?
मुरलीधर वैष्णव- आपने जो हद बतलाई उसके आगे की अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं बल्कि स्वच्छन्दता है जो कत्तई स्वीकार्य नहीं होनी चाहिये। फेसबुक/व्हाट्सअप वालों को इस पर पाबन्दी लगाने के साथ साथ साइबर कानून के उल्लंघन के लिए दोषी व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करनी चाहिये। साहित्य चोरी के संबंध में भी कॉपी राइट एक्ट के तहत कार्यवाही होना आवश्यक है।
सोशियल मीडिया एक क्रांति का रूप ले चुका है। इसके अनेक लाभ भी हैं। लेकिन इसका भाषाई शुद्धता, अफवाह फैलाने, अनियंत्रित/अवांछित टिप्पणियां करने से प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ रहा है।
 
प्रीति‘अज्ञात‘- आज के दौर में क्या एक लेखक अपनी लेखनी को रोजगार का जरिया बना सकता है?
मुरलीधर वैष्णव- यह लगभग असंभव है। अनेक पत्रिकाएं तो मानदेय भी नहीं देती है। देती भी है तो नाम मात्र की राशि। हाँ, कुछ स्थापित लेखक छद्म नाम से सस्ती व्यवसायिक पत्रिकाओं में काम चलाऊ रचनाएं भेज कर थोड़ा कमा लेते हैं, लेकिन उससे ठीक से जीवन यापन संभव नहीं है। विकसित देशों में लेखक अपनी स्तरीय सृजन क्षमता से वैभवशाली जीवन जी सकता है। भारत में व विशेषतः हिन्दी साहित्य में यह सब सपने जैसा है।
 
प्रीति ‘अज्ञात‘ - आपके लिहाज से एक अच्छी पुस्तक की क्या विशेषता होनी चाहिये।
मुरलीधर वैष्णव- पुस्तक किसी भी विधा पर हो उसमें भाषा-शैली की नवीनता, विषय की ताज़गी, वर्तमान विषमताओं से जूझते आदमी की मनुष्यता को बचाने व उसे विकसित करने की प्रेरणा होनी चाहिये।
 
प्रीति‘अज्ञात‘- साहित्य के बारे में आप क्या सोचते हैं ?
मुरलीधर वैष्णव- इस बारे में विख्यात कथाकार निर्मल वर्मा के विचारों से मैं खूब प्रभावित हूं कि साहित्यकार का सामाजिक, पारिवारिक, राजनीतिक व धार्मिक सत्ताओं के अधीन जीने वाला व्यक्तित्त्व उसका आंशिक व्यक्तित्त्व  ही होता है। वह पूर्णता की ओर तभी अग्रसर होता है जब प्रकृति और अनंत ब्रह्मांड से जुड़ कर आदमी में मनुष्यता को बचाने के लिए साहित्य सृजन करें। एक कवि अपने भीतर के सूखे और सूने कोनों को जब तक अपनी संवेदनात्मक आर्द्रता से भर नहीं देता तब तक श्रेष्ठ काव्य का रचाव नहीं होता। 
 
प्रीति‘अज्ञात‘ - इन दिनों लघुकथा विधा तेजी से पसंद की जाने लगी है। क्या इसका कारण पाठक के पास पठन का समयाभाव है?
मुरलीधर वैष्णव- नहीं, यह एक परोक्ष कारण हो सकता है। लघुकथा में केवल लघु लघु ही नहीं होता। लघु आकार हो सकता है लेकिन चिंतन नहीं। जीवन के किसी पल को शब्दों रूपी मोती से पिरोना, उसमें नायक के तीर सी मारक शक्ति होना आवश्यक है। यदि सात आठ पंक्ति की लघुकथा किसी को सात आठ दिन के लिए बैचेन कर दें  तो यह लघुकथा की कम सार्थकता नहीं है।
 
प्रीति‘अज्ञात‘- हमारी पत्रिका ‘हस्ताक्षर’ एवं युवा रचनाकारों के लिए आपका कोई संदेश?
मुरलीधर वैष्णव- वेब पत्रिकाओं मेंं ‘हस्ताक्षर’ का एक विशिष्ट स्थान है। स्तरीय रचना-सामग्री सुंदर कलेवर व संपादकीय खूब प्रभावी हैं। संपादक के भीतर श्रेष्ठ साहित्यकार का होना पत्रिका के स्तर को प्रतिबिम्बित तो करता ही है। भविष्य में ‘हस्ताक्षर’ मुद्रित रूप भी ले, इसकी मैं हार्दिक शुभकामना करता हूं।
अनेक युवा रचनाकारों की सृजन प्रतिभा देख कर मुझे बहुत प्रसन्नता होती है। उनसे मुझे सीखने को भी मिलता है। लेकिन इसी के साथ मुझे उन युवा रचनाकारों से निराशा  हाथ लगती है जो बिना श्रेष्ठ साहित्य पढ़े हल्की फुल्की रचनाओं को यत्र तत्र प्रकाशित करवा कर आत्ममुग्धता ग्रस्त रहते हैं। वस्तुतः आजकल पठन-पाठन का गहरा संकट है। किसी भी विधा की राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर की कृति पढ़ कर न हम केवल अपने ज्ञान में वृद्धि करते हैं वरन् श्रेष्ठ साहित्य सृजन की ओर प्रवृत भी होते हैं। साहित्य में नोबल पुरस्कार के लिए भारत से नामित स्व0 विजयदान देथा उर्फ बिज्जी कहा करते थे कि ‘पढ़ो मण भर और लिखो कण भर’।
 
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मुरलीधर वैष्णव
जन्म- 09 फरवरी 1946, जोधपुर
माता-पिता- स्व.मिश्री देवी व स्व.महंत हनुमान दास जी
शिक्षा- बी.ए., एलएल.बी. (जोधपुर) 
संप्रति- वरिष्ठ साहित्यकार,जिला-न्यायाधीश से.नि.,एवं विधिक सलाहकार 
अनुभव- सेवा निवृत वरिष्ठ जिला एवं सेशन न्यायाधीश, 2006 में सेवा निवृति के बाद 5 वर्ष के लिए न्यायाधीश, उपभेक्ता सरंक्षण मंच, जोधपुर के पद पर पुर्निर्नयुक्ति.
राज.न्यायिक अकादमी में अतिथि विधि प्राद्यापक के रुप में कार्य.
 
प्रकाशन- गद्य-पद्य की कुल दस पुस्तकें प्रकाशित। कहानी संग्रह  ‘पीड़ा के स्वर‘, दो लघुकथा-संग्रह ‘अक्षय तूणीर‘; ;राज.पत्रिका प्रकाशनद्ध एवं ‘कितना कारावास‘। एक काव्य-संग्रह ‘हैलो बसंत‘   चार बालकथा-संग्रह,‘ पर्यावरण चेतना की बाल कथाएं‘ं,‘चरित्र विकास की बाल कहानियां‘ ‘जल और कमल‘, व ‘अबु टॉवर‘, व एक बाल गीत संग्रह ‘चींटी का उपकार‘। राष्ट्रीय  व अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय  पत्र-पत्रिकाओं में दर्जनों कहानियां, लघु कथाएं, कविताएं व आलेख प्रकाशित व सतत प्रकाशन। राजस्थानी में कविताएं. अंग्रेजी में अनेक आलेख राष्ट्र्र्रीय व अंतर्राष्टीय पत्रिका व जर्नल्स में प्रकाशित।
प्रकाशनाधीन -दूसरा काव्य-संग्रह, दूसरा कहानी-संग्रह व  निबंध-संग्रह। 
सम्मान-  राजस्थान साहित्य अकादमी विशिष्ट साहित्यकार सम्मान,2012, राजस्थान पत्रिका सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार (श्रेष्ठतम कहानी)2002, वीर दुर्गादास राठौड़ साहित्य सम्मान,2009ए  सुमित्रा नंदन पंत बाल साहित्य सम्मान, अल्मोड़ा,,2011, साहित्य मंडल नाथद्वारा द्वारा ‘हिन्दी भाषा भूषण’ सम्मान,2014, शब्द-निष्ठा लघुकथा पुरस्कार,2017 अजमेर व सर्जनात्मक संतुष्टि संस्थान लघुकथा पुरस्कार सहित अनेक सम्मान/पुरस्कार।
अन्य-1.  2004 में राज.उच्च न्यायालय द्वारा तत्कालीन उपकुलपति ज.ना.व्यास विश्वविद्यालय द्वारा कारित वित्तीय अनियमितताओं की उच्च स्तरीय जांच कमेटी का चेयरमेन नियुक्त
2.  2005 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार राज.क्रिकेट एसोसियेशन का चुनाव पर्यवेक्षक नियुक्त
3.  अब तक करीब 5500 वृक्षारोपण व 150 विधिक शिक्षा/सहायता शिविरों में भागीदारी 
 
संपर्क- ए-77, रामेश्वर नगर, बासनी-प्रथम, जोधपुर-342005,  मो.9460776100

 


- मुरलीधर वैष्णव
 
रचनाकार परिचय
मुरलीधर वैष्णव

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