प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
नवम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जयतु संस्कृतम्
 कविता
 
"नहि कोऽपि चिन्तितोऽस्ति"
 
 
देशेऽपि वा विदेशे यत्र स्थले गतोऽहम्,
दृष्टं च खं विधुर्भू: रविरेव रम्यतोऽस्ति।1।
 
रात्रिर्जलं धरित्री वह्नि: दिवाऽपि वायु:।
नित्यं समानरूपे सर्वत्र संश्रितोऽस्ति।2।
 
बुद्धिर्मनो विवेको वाचो ध्वनिश्च दृष्टि:।
वेधोsपि चैकपुरुष: प्रकृतौ सुमिश्रितोऽस्ति।3।
 
देवोऽपि शक्तिमूल: तस्यैव सर्वसृष्टि:।
सम्पूर्णजीवलोको विधिनैव निर्मितोऽस्ति।4।
 
पुण्यं किमत्र पापं पुरुषार्थपूरणार्थम्।
स्वार्थं विमुच्य को य: परमार्थतत्परोऽस्ति।5।
 
जातो जगति जनो यो मृत्युं ध्रुवं  स यात:।
ज्ञात्वापि  तद् यथार्थं लोकेऽधुना भ्रमोऽस्ति।6।
 
उच्चोऽस्मि मध्यमो वा दलित: कुतोऽत्र जात:।
आरक्षणे समाजो वर्गेषु वर्णितोऽस्ति।7।
 
संलक्ष्य भेदभावं शिक्षालयेषु बन्धो! ।
रसराज! राजनीतौ नहि कोऽपि चिन्तितोऽस्ति।8।

- डॉ.राजेन्द्र त्रिपाठी रसराज
 
रचनाकार परिचय
डॉ.राजेन्द्र त्रिपाठी रसराज

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जयतु संस्कृतम् (3)