प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
लघुकथा- नियति
 
 
मैं आँसू की एक बूँद हूँ। मुझे भेजा गया है धरती पर किसी की आँखों से बरसने के लिए। मेरी नियति है- किसी के दुख केआँसू बनना। मगर नियति ने मुझे किस व्यक्ति की आँखों से गिरूँ, इसकी स्वतंत्रता दे रखी है। मैं सोच रही हूँ किसको अपना निमित्त के रूप मे चुनाव करूँ। मेरे सामने कर्ज मे डुबे रमुआ किसान का परिवार है। मैं सोचने लगी इस परिवार में किसके नयन से टपक पड़ूँ!
 
एक वृद्ध किसान चारपाई पर लेटा खाँस रहा है। लगता है वो रमुआ का बाप है। दमा से साँस लेने में तकलीफ हो रही है। अनेक व्याधियों से ग्रसित उसका शरीर जर्जर हो चुका है। उसके मन मे विभिन्न व्यंजन खाने की इच्छा है। आलू-मटर की सब्जी पूरी, खीर, मिठाई और न जाने क्या-क्या? मगर न स्वास्थ साथ दे रहा है, न घर वाले ही ये भोजन दे रहे हैं। क्या मैं उसके नयन कोर से गिरूँ?
 
पास में रमुआ सिर पर हाथ धरे बेहद रूआँसा चितिंत अवस्था मे ज़मीन पर बैठा है। घरवाली से कह रहा है इस बार फसल बरबाद हो चुकी है। खाने के लाले पडने वाले है। इसमें जो साहूकार से कर्ज लिया था, उसे कैसे भरे। वेदना से उसका गला भरा जा रहा है। क्या मैं उसकी अश्रू बूँद बन छलकूँ?
रमुआ की पत्नी पति को सांत्वना देने के लिए चाय बनाने रसोई में है। चायपत्ती की लास्ट खेप उबलते पानी में डाल सोच रही है कल क्या होगा? बेटा, बेटी, ससुरजी को कल क्या भोजन देगी! खाली डिब्बे उसकी नज़र के सामने है। क्या उसके गालों पर चमकूँ?
 
कमरे में एक किशोरी रमुआ की बात सुन दुखी बैठी है। सोच कर मन को म्लान किये जा रही है कि पिता पहले ही चिंतिंत है, ऐसे मे उसके ब्याह के लिए जो दहेज देने का पिता वादा कर आये हैं, उसका क्या होगा! वो अपने पिता के दुख को और बढ़ा रही है। क्या मैं उसके भीगे मन को छोड़ आँखों से बहूँ?
 
तभी किसान का बेटा नज़र आया। जोश और हौसले से भरा हुआ। पिता की बातें सुनकर भावुक हो उठा। बैठे पिता के काँधें पर हाथ रखकर कह रहा है हर समस्या का हल होता है, मिलकर कोई उपाय सोच लेंगे। मैं उसकी आँखों से भाव विश्वास तथा आशा की बूँद बन छलक पड़ी।

- कंचन अपराजिता
 
रचनाकार परिचय
कंचन अपराजिता

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