प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
लघुकथा- सागर पर भूलभुलैया
 
"दादी, ओ दादी, एक बात बताओगी?"
"हूँS पूछो।"
"पहले मेरी तरफ देखो। ये किताब पढ़ना बंद करो। वैसे मुझे मालूम है कि तुम्हारे पास मेरे इस सवाल का कोई जवाब नहीं है।"
दादी ने चौंक कर किताब पर से नज़रें हटा लीं, "अच्छा! फिर ऐसा कौन-सा सवाल लेकर आए हो इस बार? चलो, अब पूछो भी।" 
"क्या तुम्हें मालूम है कि भगवान को किसने बनाया? मतलब उनका जन्म कैसे हुआ?"
दादी एक पल को सोचने लगी, फिर संभल कर बोली, "भगवान हमेशा से इस ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। मतलब, कण-कण में समाये हैं।"
"ना ना, मेरा मतलब कभी पैदा भी तो हुए होंगे!"
"भगवान न कभी पैदा होते हैं, न कभी उनकी मृत्यु होती है। वे अजर और अमर हैं।"
"तो फिर दिखते क्यों नहीं?"
"ये हवा, जिसे तुम आॅक्सीजन कहते हो, जिससे साँस लेते हो। क्या तुम उसे देख पाते होे?" 
"नहीं!" आश्चर्य से उसकी आँखें फैल गयीं।
"ये आवाज़ें जो तुम सुना करते हो, उसे भी क्या तुम देख पाते हो?"
"ऊँहुँ! सिर्फ महसूस करता हूँ।" सोचते हुए वह बोला।
"वही तोS और भगवान ने हमें जो दो आँखें दी हैं।"
"अच्छा, अच्छा! अब समझ गया मैं... आँखें दिखती हैं मगर देखना...।"
"हाँ देखना यानि कि दृष्टि, उसमें भी भगवान व्याप्त है।
"तभी तो भगवान सुप्रीम पॉवर है! मगर दादी, ये जो सारे नाम हैं न, भगवान जी के जैसे- शंकर, शिव और हनुमान जी, ये सब झूठे नाम हैं, लोगों के बनाए हुए। भगवान तो सिर्फ एक होता है।" 
दादी कुछ असमंजस में पड़ गयी। मगर दूसरे ही पल बोल पड़ी, "तुम्हारे भी तो कितने सारे नाम हैं!"
"मेरा तो बस एक नाम है, अंकुर।"
"अच्छा! और जो अपने दादा-दादी का पोता है, अपने नाना-नानी का नाती है, अपने दोस्तों का दोस्त और अपनी टीचर का स्टूडेंट है, ज़रा ये तो बताओ कि फिर वह कौन है?"
"ओह दादी! रियली थैंक्यू दादी!" कहकर अंकुर ने सोने के लिए अपनी आँखें मूँद लीं।
 
दादी ने भी राहत की साँस ली, मानो एक बार फिर वह लहरों पर झूलती भूलभुलैया में से बचकर बाहर निकल आई थी।
 
 
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लघुकथा- आई लव यू दादी
 
अंदर से आती लड़ाई की तेज़ आवाज़ें उसके मन को विचलित करे दे रही थीं। हर बार की तरह आज फिर सात साल का मनु दौड़ता हुआ उसके पास आया और बोला, “देखा दादी, पापा-मम्मी सुधरेंगे थोड़ी न! हर बार न लड़ने का वादा करते हैं, फिर भी लड़ते हैं। कल ही हम सब उनकी एनिवर्सरी पर कितनी ख़ुशी-ख़ुशी क्लब में डिनर करने गये थे।" कहते-कहते उसकी आँखें भर आयीं।
वह चिंतित हो उठी, कहीं ये कलह मनु के कोमल मन पर कुंठा का रूप न धारण कर ले। वह खुद को संतुलित करते हुए मुस्कुराकर बोल पड़ी, "मियाँ-बीबी की लड़ाई जैसे दूध में मलाई"।
मनु की मासूम आँखें विस्फिरित होकर फैल गई, “इसका क्या मतलब होता है दादी?”
"इसका मतलब- जब दूध को उबाला जाता है, तब उसमें मलाई पड़ती ही पड़ती है। जो तुम्हें ज़रा भी पसन्द नहीं और फिर जब मम्मा तुम्हें दूध देती है तो मलाई छानकर। लेकिन वही मलाई तुम्हें ब्रैड में लगाकर खाना कितना पसन्द है!"
"हम्म! ये तो है...।"
"बस इसी तरह ये प्यार भी होता है, प्यार में लड़ाई हो ही जाती है। लड़ाई मतलब मलाई। कुछ आया समझ में।”
मनु ने दादी का हाथ अपने हाथों में ले लिया और खिलखिलाते हुए बोल पड़ा, "सचमुच तुम्हारे पास तो मेरी हर बात का जवाब रहता है। आई लव यू दादी।" 
 
दादी ने राहत की एक साँस ली।

- प्रेरणा गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रेरणा गुप्ता

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कथा-कुसुम (5)