प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिए
कहीं यह परेशानी का सबब तो नहीं?
 
 
पहनावे से माँ और बेटा सम्भ्रांत परिवार के लगते थे। बच्चे की उम्र यही कोई सात-आठ वर्ष की रही होगी। सेंटर की सीढ़ियों पर चढ़ते ही माँ के मोबाइल पर किसी फ़ोन आ जाने से वो फ़ोन में व्यस्त हो गई और माँ के व्यस्त होते ही मानो बच्चे को स्वतंत्रता हासिल हो गई हो। पहले तो उस बच्चे ने सेंटर की सीढ़ियों पर बार-बार चढ़ने फिर उतरने का खेल जारी रखा, जिसकी वजह से आने वाले मरीज़ों को असुविधा भी हुई पर बच्चा जान कर कोई भी कुछ नहीं बोला। फिर उस बच्चे ने रिसेप्शन के आस-पास पहुँच कर अपने हाथों से बनाई हुई कृत्रिम कार को दौड़ाना शुरू किया। उसकी यह कार बेंच और कुर्सी पर से भी और दूसरे मरीज़ों के आस-पास दौड़ना शुरू हो गई। स्टाफ के दो-तीन बार टोकने पर भी, सारी की सारी बातें बच्चे के सिर के ऊपर से गुज़र रही थीं। जब भी उसकी माँ की नज़र कुछ देर फ़ोन से हटकर उस पर पड़ती तो अनायास ही बोलती- "रौनक! शैतानी मत करो, कम्पाउण्डर अंकल सुई लगा देंगे।" और अपने फ़ोन में मगन हो जाती।
 
इन दोनों की बातों से मुझे अंदाज़ा हो चुका था कि बेटे का नाम रौनक है। दूसरी ओर एक और बच्चा लगभग हमउम्र ही होगा रौनक का, चुपचाप आते-जाते मरीज़ों का अवलोकन करने में जुटा था। बीच-बीच में कुछ गाने गुनगुनाता तो कभी कुछ अपने स्कूल की बातें माँ को सुनाता हुआ प्रतीत हो रहा था। ये दोनों माँ-बेटे पहनावे से साधारण परिवार से ही लगते थे। इस बच्चे की माँ अपनी कुछ जांचों के लिए खून का सैंपल देने आई थी। माँ के सैम्पल देते समय माँ के साथ-साथ बच्चे की आँखों में पानी की नमी को मैं बहुत अच्छे से देख पाई। सैंपल देने के बाद दोनों ही रिपोर्ट के लिए शाम को आने का बोलकर निकल गये।
 
अब तक शायद रौनक की माँ का फ़ोन डिसकनेक्ट हो चुका था सो उसने अब स्टाफ को अपना पर्चा देकर अपनी जांचों के लिए सैम्पल देने का आग्रह किया। रीटा नाम था इस मरीज़ा का, यह मुझे सुनाई पड़ गया था। जब तक माँ अपना खून का सैंपल देती, रौनक अपनी कृत्रिम कार चलाता हुआ मेरे चेम्बर में आ गया। मेरे पास कोई मरीज़ न होने से मैंने उस बच्चे को गौर से देखना शुरू किया।
 
"आप कौन हैं? रौनक ने मुझे पूछा। आप यहाँ क्यों बैठी हैं?" मेरे से प्रश्न पूछते-पूछते रौनक ने मेरी टेबल पर पड़े पेन-पेंसिल को छेड़ना शुरू कर दिया। उसकी लगातार चलती हुई शैतानियाँ अब तक स्टाफ के लिए भी परेशानी का सबब बनती जा रही थी। स्टाफ के बराबर रोकने और डांटने के बावजूद भी वह अपनी ही धुन में मग्न था। तभी रौनक की माँ ने मेरे चेम्बर में प्रवेश किया और हँसते हुए अपने बेटे से बोली- "रौनक! आज तो तुमने बहुत शैतानियाँ कीं बेटा। तुम बहुत शैतान हो गए हो, पापा को बताऊँगी।" फिर अचानक मेरी तरफ घूमकर बोली- "मैम! आपको तंग तो नहीं किया मेरे बेटे ने। बहुत एक्टिव है यह, कहीं टिक कर बैठ ही नहीं सकता है और इतना होशियार है मैम, कि घर के सभी लोगों का मन लगा कर रखता है। इसकी बातें आप भी सुनेगी तो आपको पता ही नहीं चलेगा कब दिन ख़त्म हो गया। बहुत लाड़ला बच्चा है हमारे घर का यह।"
 
अब रीटा की लगातार बातें सुनते-सुनते मुझे भी उसको बीच में ही टोकने के लिए मजबूर होना पड़ा। "रीटा जी, किसी दिन थोड़ा समय लेकर आइये, हम रौनक के लिए ज़रूर से बातें करेंगे। अभी मुझे निकलना है।"
अगले ही दिन रीटा जब अपनी रिपोर्ट्स लेने आई तो मुझे सामने खाली देख पूछने आ गईं- "मैम, अगर आप खाली हों तो कुछ देर आपसे से बातें करूँ?" रीटा ने पूछा। "हाँ हाँ, आइये बैठिए।" मेरे उत्तर देते ही रीटा मेरे पास आकर कुर्सी पर बैठ गई।
"कल आप रौनक के लिए कुछ कहना चाहती थीं, अभी आपको खाली देखा तो सोचा थोड़ी देर आपके पास मिलती चलूँ।"
"रीटा जी, कितने बच्चे है आपके?" मैंने पूछा। 
"रौनक हमारी इकलौती संतान है मैम और हम एक ही बच्चा चाहते थे ताकि बच्चे को बहुत अच्छे से पढ़ा-लिखा कर बड़ा आदमी बना सकें। इसकी हर ख़्वाहिश पूरी करना चाहते हैं ताकि जो कमियाँ हमारे बचपन में रहीं, वो इसको न रहे।" रीटा अब मेरे चेहरे की तरफ देख कर मुझे सुनने के लिए उत्सुक हो उठी। "रीटा जी, पहली बात तो यह कहना चाहूँगी कि आज आपने बहुत अच्छा किया कि रौनक को साथ नहीं लायीं क्योंकि मैं आपसे अकेले में ही बात करना चाहती थी। आज हमारे बीच जो भी बातचीत होगी, उसको अगर आप समझ पायीं तो एक सकारात्मक परिवर्तन होगा और अगर आप समझने में असमर्थ रहीं तो हो सकता है कि हमारा एक मरीज़ आगे के लिए कम हो जाये।
 
"रीटा जी, रौनक उम्र के जिस दौर से गुज़र रहा है, उसमें बच्चों का शारीरिक विकास तो खान-पान से स्वतः ही होता है मगर मानसिक विकास के लिए मूल्यों व संस्कारों की बुआई इसी समय सबसे ज़्यादा होती है। वैसे तो यह सब सीखना सारी उम्र ही होता है पर बच्चों को किस जगह पर किस तरह का व्यवहार करना है, यह सीखना बहुत ज़रूरी है। बड़ा आदमी बनने की सबसे बड़ी शर्त यही है। उच्च पढ़ाई-लिखाई तब ही और पल्लवित होते हैं, जब मूल्यों और संस्कारों की नींव बहुत मजबूत हो। आपने शायद कल गौर से नहीं देखा, रौनक के जैसे ही उस हमउम्र बच्चे को जो माँ के लिए चिंतित था। मानवीय संवेदनाएं जाग्रत तब होंगी जब ठहराव होगा। चंचलता बहुत अच्छी लगती है बच्चों में। इस एक गुण की वजह से ही तो बच्चे सबका मन मोहते हैं पर स्थिति और परिस्थिति दोनों के लिए समझदारी विकसित करने की ज़िम्मेवारी आपकी है क्योंकि इसमें आपके परिवार का भविष्य सुरक्षित है। आप बहुत अच्छे परिवार से हैं। आप एक या दो बच्चों का भरण-पोषण बहुत अच्छे से कर सकती हैं। दूसरे बच्चे का सानिध्य बच्चों में और भी जाने कितने मानवीय गुणों को जन्म देता है, इस पर भी सोचकर देखिये। बच्चों को बहुत प्यार करिये क्योंकि वे होते ही प्यार करने के लिए हैं और प्रेम की भाषा में ही इन नवांकुरों में सुदृढ़ वृक्ष बनने के गुण छिपे रहते हैं। रीटा जी, माफ़ करियेगा, अगर मेरी किसी बात ने आपको पीड़ित किया हो। सच यह है कि मैं जिस क्षेत्र में कार्यरत हूँ, वहाँ इस नन्ही पौध के लिए इतनी चिंतित हो जाती हूँ कि अपने को कहने से रोक नहीं पाती। आपका और आपसे पहले मेरा समय इतना जटिल नहीं था, जितना कि आज की पीढ़ी के लिए है। यहाँ पर वही अच्छे से पनपेगा, जिसको रोपने से लेकर पनपने में खाद का विशेष ध्यान रखा गया हो। आप समझ रही हैं ना जो में कहना चाहती हूँ?"
 
इतना सब कुछ बोल, मैं रीटा की ओर देखने लगी, शायद मेरी बातें सुनते-सुनते रीटा भी सोचने पर मजबूर हो गई थी। "शायद ठीक कहा आपने मैम! कभी इस तरह सोचा ही नहीं मैंने। बस बच्चे को पाकर इतना ख़ुश थे हम कि लाड़ प्यार से ऊपर सोच ही नहीं पाए। इसी वजह से बहुत सतही बातों पर हमारा ध्यान गया। अच्छे व्यक्तित्त्व के लिए मानवीय संवेदनाएं  बहुत ज़रूरी हैं। उनको हमें ही महसूस करवाना सिखाना है और इसके लिए हमारा गुणात्मक समय बच्चे को देना शायद बहुत ज़रूरी है। आपने ठीक ही कहा- संस्कारों को बोना भी एक कला है और यही बड़ा आदमी बनने के लिए ज़रूरी भी। बहुत आभार आपका! अक्सर ही माँ-बाप अपने बच्चे के लाड़ में इतने लिप्त होते हैं कि उनको उनमें विकसित होती कमियाँ नज़र नहीं आतीं और अगर आ भी जाती हैं तो उनको ढंकने की कोशिशें करते हैं। आज आपकी वजह से मैं भी सोचने पर मजबूर हुई। शुक्रिया आपका। पर मुझे समय-समय पर आपकी ज़रूरत पड़ेगी। क्या आप मुझे मदद करेंगी?" मेरे सर हिला कर उसको आश्वस्त करने से वो निश्चिंत हो गई। "अब मैं चलती हूँ, फिर मिलूँगी आपसे।" कहकर रीटा चेम्बर से निकल गई।
 
रीटा के निकलते ही मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि अक़्सर ही माँ-बाप अपने लाड़ प्यार में बच्चों को जो सच में देना चाहिए, उसको भूल जाते हैं। बचपन में बच्चों की उद्दण्डता के लिए माँ-बाप भी दोषी हैं क्योंकि छोटी उम्र में बच्चों का दायरा घर तक ही सीमित होता है। इसको सोचना न सिर्फ परिवार के लिए बल्कि समाज के लिए भी बहुत ज़रूरी है। एक बार सोचकर देखिये ज़रूर।

- प्रगति गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रगति गुप्ता

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