प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
रिटायरमेंट की पेंशन
 
देर रात से ही कामता प्रसाद की खाँसी तेज हो गयी। रह-रहकर खून की दो-चार उल्टियाँ भी हो गई। धर्मपत्नी काफी घबराई हुई थी फिर भी कामता प्रसाद ने सुभद्रा को ढाढ़स बंधाने की असफल चेष्टा की। एक सुभद्रा ही तो थी जो अब तक कामता प्रसाद का साथ निभा रही थी। आखिर सुभद्रा उनकी धर्मपत्नी थी और किसी स्त्री के लिए संसार की सबसे अनमोल चीज उसका पति होता है।इस बात को सुभद्रा अच्छे से समझती और इस हालत में कामता प्रसाद के लिए एक मात्र सहारा वही तो थी।
 
ऐसा नहीं था कि कामता प्रसाद के कोई संतान न थीं। सुभद्रा ने अपनी कोख से चार पुत्र तथा दो पुत्रियों को जना था। उनमें से दो तो जन्म के कुछ ही दिनों पश्चात मृत्यु का वरण कर चुके थे। स्वयं कामता प्रसाद सरकारी महकमे में मुंशी थे। जो भी वेतन मिलता इतने बड़े परिवार के भरण-पोषण में खर्च हो जाता। कामता प्रसाद हमेशा तंगी में ही रहते फिर भी अपने बच्चों की परवरिश में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी।अच्छी शिक्षा दिलाने का ही परिणाम था कि आज उनके जीवित बचे दोनों पुत्र सरकारी महकमे में उच्च पदों पर आसीन थे। पूरे सेवाकाल में बड़ी मुश्किल से जो थोड़ी-बहुत बचत की उससे रहने हेतु एक छोटा सा घर भी बन गया। दोनों पुत्रियों की शादी भी उन्होंने अच्छे से कर दी और वे दोनों अपने घर खुश थे। पुत्रियों के विवाह में उनके सर काफी कर्ज भी चढ़ गया जिससे वे अपनी नौकरी के अंतिम दिनों में ही उबर सके। दोनों पुत्र का विवाह भी हो गया और अपने परिवार के साथ वे दोनों घर से काफी दूर रहते थे। शुरू-शुरू में तो दोनों वर्ष में एकाध बार आ ही जाते परंतु समय के साथ यह अंतराल बढ़ता चला गया। बहुओं के उपेक्षित व्यवहार के कारण सुभद्रा भी कभी उनलोगों के पास जाने का साहस नहीं जुटा सकी और कामता प्रसाद ने भी पुत्रों के पास जाने के लिए सुभद्रा पर कभी  दबाव नहीं बनाया। धीरे-धीरे उनलोगों के पत्र आने भी बंद हो गए और स्वयं को निःसंतान मान कामता प्रसाद और सुभद्रा ने हृदय कठोर करके एक-दूसरे का सहारा बनकर जीवन जीने का दंभ झेलने लगे। पिछले पाँच वर्ष से तो पुत्रियों की भी कोई खोज-खबर नहीं थी।ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सबने ही कामता प्रसाद और सुभद्रा को भुला दिया हो।
 
कामता प्रसाद को सरकारी सेवा से अवकाश ग्रहण किये साल भर से ऊपर होने को आये। अचानक से वेतन बंद हो जाने से वे आर्थिक तंगी झेल रहे थे। पेंशन कार्यालय का चक्कर लगाते-लगाते उनके जूते घिस गये फिर भी उनका पेंशन निर्धारित नहीं हो सका। कई बार तो फाइलों को ईधर-उधर करवाने में चढ़ावा तक देना पड़ा। तिस पर से वे टी0 बी0 के मरीज भी हो गए। जो भी थोड़ी-बहुत जमा पूँजी थी वह भी पिछले एक साल में घर के आटा-दाल का खर्च चलाने में समाप्त हो गए। बीमारी की वजह से पड़ोसियों का कर्जा भी सर पर चढ़ गया - सो अलग। इतनी तंगी में भी उन्होंने कभी अपने बच्चों से आर्थिक मदद लेने का प्रयास नहीं किया। वे विचार करते - "वह जिसने इतने दिनों में अपने लाचार और बूढ़े माँ-बाप की तनिक भी सुधि नहीं ली वैसे नालायक बच्चों से आर्थिक मदद लेने की बात सोचना भी बेमानी होगी। क्या पता - कहीं इनकार ही न कर दे.....? इससे तो अच्छा है कि अभाव  में ही स्वाभिमान के साथ जीवन का त्याग कर दिया जाये। कम-से-कम मरने के बाद संतोष तो रहेगा कि जितना भी जिया अभिमान के साथ जिया।"
 
दिन बीतने के साथ-साथ कामता प्रसाद का स्वास्थ्य भी गिरता जा रहा था। पेंशन की राशि अब तक न मिलने से आर्थिक मदद के नाम पर पड़ोसियों ने भी कन्नी काटना शुरू कर दिया। राशन वाले का कर्जा अधिक होने से वह भी सामान देने में आनाकानी करने लगा। मगर पेट की भूख और सुभद्रा के स्याह पड़ चुके चेहरे को याद करके वह अपमान का घूँट पीकर रह जाते। उनकी बेबसी ने सुभद्रा को समय पूर्व ही वृद्ध बना दिया। स्वयं के विवाह के समय सुभद्रा के लालिमायुक्त सुर्ख चेहरे को याद करके और वर्तमान में सुभद्रा के स्याह पड़ चुके चेहरे को देखकर वो अंदर तक पीड़ा से भर जाते। मगर बेचारे करते भी क्या.....?
 
सुबह तक जाकर कामता प्रसाद सामान्य हो पाये। आज एक बार फिर से वे पेंशन कार्यालय इस उम्मीद में गये कि अधिकारियों को शायद उनकी हालत पर दया आ जाये और उनकी पेंशन राशि का भुगतान हो जाये। उम्मीद के मुताबिक ही पेंशन कार्यालय की स्थिति थी। यत्र-तत्र धूल बिखरे पड़े थे और कोई भी कर्मचारी ठीक से अपना काम नहीं कर रहा था। दोपहर तक वे फाइल लेकर इस टेबल से उस टेबल भटकते रहे। थकान और कमजोरी की वजह से वे ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे। निराश और हताश एक बेंच पर जाकर वे बैठ गए। मन-ही-मन व्यवस्था के बारे में विचार करने लगे - "एक समय ऐसा भी था जब वे नौकरी में थे। तब कितनी ईमानदारी से काम होता था। और आज ये आलम है कि अपना ही पैसा प्राप्त करने के लिए कितने पापड़ बेलने पड़ रहे हैं....? इससे तो अच्छा होता कि सरकार इस व्यवस्था को ही बंद कर देती। कम से कम रिटायरमेंट के बाद किसी पेंशन का आसरा तो नहीं होता। लोग बुढ़ापे के सहारे के लिए पूर्व से ही कोई न कोई व्यवस्था कर ही लेते।" -- और भी न जाने क्या-क्या सोचते रहे कामता प्रसाद........।
 
उन्होंने महसूस किया - कोई उनकी बगल में आकर बैठ रहा है। मुड़कर देखा तो पाया - पान से रंगे काले दाँतो को निपोड़ता दफ्तर का चपरासी था। धीमे-से उसने कान में फुसफुसा कर कहा-- "साहब ने मुझे भेजा है। कहलवाया है- यदि कल तक आप दस हजार रुपए का प्रबंध कर दें तो आपका काम एक हफ्ते के भीतर हो जायेगा।" -- कहने के साथ ही एक बार फिर वह अपने दाँत निपोरने लगा। उसे देखकर कामता प्रसाद अंदर तक घृणा से भर उठे। जी में आया कि जोरों से उस चपरासी के मुँह पर थूक दें। किन्तु वे ऐसा न कर सके। बेवजह का हंगामा खड़ा हो जाता और वे ऐसा कदापि नहीं चाहते थे। निराश कदमों से वापिस घर आ गए और सीधे बिस्तर पर जाकर ढ़ेर हो गए। 
 
एक ग्लास पानी और एक कप चाय लेकर सुभद्रा उनके पास आयी। धीमे से कामता प्रसाद के हाथ में पानी का गिलास थमाकर पूछा - "आज तो काम हो गया न। अब तो फिर से दुबारा नहीं जाना पड़ेगा।" -- एकबारगी तो कामता प्रसाद के मन में आया कि वे सुभद्रा से बोल दें कि काम हो गया है। ना कहकर क्यों बेचारी का दिल दुखाया जाये। किन्तु सुभद्रा के सम्मुख वे झूठ न बोल सके। उसकी ओर मुखातिब हो उन्होंने कहा -- "नहीं। दस हजार रिश्वत माँग रहे हैं तब जाकर काम करेंगे। क्या उन्हें नहीं मालूम कि हम फूटी कौड़ी के लिए भी तरस रहे हैं.....? पैसों के अभाव में जरूरी दवाई तकनहीं खरीद पा रहे तो उन्हें रिश्वत कहाँ से देंगे....?" -- कहने के साथ ही कामता प्रसाद चुप हो गए। इसके बाद दोनों के मध्य मौन ही रहा। कामता प्रसाद ने गौर किया कि सुभद्रा शाम में कहीँ बाहर गयी है। शायद जरूरत का कोई सामान लेने गई हो-ऐसा सोच उन्होंने सुभद्रा को टोकना उचित नहीं समझा।
 
सुबह होने को आयी। कामता प्रसाद अब तक अलसाये छत को घूर रहे थे। सुभद्रा की आवाज ने उनकी तंद्रा भंग की। पूछ रही थी - "क्या पेंशन कार्यालय नहीं जायेंगे....? उन्होंने तो आज ही बुलाया है न।"
-- "क्यों मजाक करती हो सुभद्रा...? दस हजार होंगे तो जाऊँगा न। और तुम तो जानती हो कि हमारे पास कुछ भी नहीं।" -- कातर स्वर में कामता प्रसाद ने कहा।
-- "आपके पास नहीं हैं तो क्या हुआ - मेरे पास तो है। मैं आपकी पत्नी हूँ और मेरे पास जो भी है वह आपका ही तो है।" - कहने के साथ सुभद्रा ने दस हजार रुपए की गड्डी कामता प्रसाद के हाथ पर रख दी। कामता प्रसाद अवाक से सुभद्रा का मुँह ताकते रह गए। उन्हें समझते देर न लगी कल शाम जरूर अपने गहने बेचकर सुभद्रा ये पैसे लायी  है। अपनी बेबसी पर वे तड़प उठे। उन्होंने सुभद्रा से कहा -- "ये मुझसे नहीं होगा। किसी स्त्री के लिए उसके आभूषण बड़े कीमती होते हैं और ये मुझसे कतई नहीं होगा कि मैं तुम्हारे आभूषण बेचकर रिश्वत की भेंट चढ़ाऊँ।"
 
-- "बेशक किसी स्त्री के लिए उसके आभूषण बड़े कीमती होते हैं - किन्तु पति से ज्यादा नहीं। एक स्त्री के लिए उसके पति की क्या अहमयित होती है - ये आप नहीं समझ सकते। आप फिक्र न करें और शीघ्र जाकर काम करवा लें। ईश्वर ने चाहा तो ऐसे बहुत सारे गहने फिर से आ जायेंगे। और वैसे भी इस उम्र में इन आभूषणों की मेरे लिए क्या उपयोगिता रह गयी है...?" - दृढ़ स्वर में सुभद्रा ने कहा तो कामता प्रसाद इनकार न कर सके। कांपते हाथों से उन्होंने नोटों का बंडल उठाया और जाकर उस चपरासी के मुँह पर दे मारा। नोटों का बंडल लेते समय उस चपरासी के मुँह पर एक विजयी मुस्कान उभर आयी और अब भी वह अपनी खीसें निपोड़ रहा था। कामता प्रसाद अपमान का घूँट पीकर रह गए। बोझिल कदमों से वापिस घर आ गए। घर में घुसने से पूर्व पाँव उनका साथ नहीं दे रहे थे। सुभद्रा ने दरवाजा खोला। सुभद्रा के प्रश्नवाचक नजरों का सामना करने की शक्ति उनमें शेष नहीं थी और वे सीधे अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर धंस गये।
 
धीरे-धीरे समय बीतता रहा फिर भी पेंशन की राशि के भुगतान का कहीं पता नहीं था। आर्थिक मजबूरी के कारण कामता प्रसाद की दवाइयां बंद थीं और दिन-ब-दिन उनका स्वास्थ्य गिरता ही जा रहा था। कमजोरी इतनी हो गयी कि बिस्तर से उठना तक मुश्किल हो गया। वह तो सुभद्रा ही थी जो रात-दिन उनकी सेवा में लगी रहती और चेहरे पर तनिक भी परेशानी का भाव नहीं आने देती।सुभद्रा के कारण ही तो वे अब तक जीवित थे। सुभद्रा के कभी बाहर चले जाने पर बिस्तर पर पड़े-पड़े ही वे काफी देर तक रोते रहते......  किन्तु सुभद्रा के सम्मुख अपने आँसू बहाकर उसे दुखी करना नहीं चाहते थे।
 
आज शाम से ही उनकी स्थिति बिगड़ती चली गयी। शुरू में तो वे काफी देर तक खांसते रहे और फिर देर रात तक खून की उल्टियाँ भी हो गई। एक तो रात का समय...... उसपर से सुभद्रा घर में अकेली......। कामता प्रसाद के सिरहाने बैठ सुभद्रा धीरे-धीरे उनके सर पर अपना हाथ फेरते हुये सुबह होने का इंतजार करने लगी ताकि डॉक्टर की।मदद ली जा सके। सोचते-सोचते न जाने कब सुभद्रा की आँख लग गई और धीरे-धीरे कामता प्रसाद का शरीर शांत होता चला गया।
 
चिड़ियों के चहचहाने की आवाज ने सुभद्रा को नींद से जगाया। वह हड़बड़ा कर उठ बैठी और कुछ पूछने के लिए कामता प्रसाद को हिलाया तो उनका शरीर एक ओर लुढ़क गया। उनका शरीर ठंडा था और उनके प्राण-पखेरू कब के उड़ चुके थे। कांपते हाथों से सुभद्रा ने उनके नेत्र बंद किये और पछाड़ खाकर गिर पड़ी। धीरे-धीरे पड़ोसियों की भीड़ बढ़ती चली गयी। किसी पड़ोसी ने अपना पुनीत कर्तव्य समझकर दोनों पुत्र और पुत्रियों को फोन पर सूचना दे दी। शाम तक वे सब भी अंतिम संस्कार में शरीक होने पहुंच गए। एकबारगी सुभद्रा के मन में आया कि वह बच्चों से कह दे कि वे यहाँ से चले जायें। अब क्या करने आये हैं.....? किन्तु सामाजिक रीति रिवाज और कायदे कानून को याद करके सुभद्रा ऐसा न कर सकी। वह तो जैसे जड़ हो गई थी।
 
कामता प्रसाद का अंतिम संस्कार करने के बाद सब वापिस आ गये। समाज के सारे प्रतिष्ठित व्यक्ति वहाँ मौजूद थे और ब्राम्हण भोज आदि देने पर विचार कर रहे थे। कोई पूरी बिरादरी...... तो कोई पूरे गाँव..... को भोज देने की सलाह दे रहा था। सुभद्रा महसूस कर रही थी-उसके पुत्रों का चेहरा पीला पड़ रहा है मानो इस खर्च से वे किसी तरह निकल भाग जाना चाह रहे हों। किन्तु पूरा समाज उनपर दवाब बनाये हुए था।
 
उसी समय वहाँ पर डाकिया आया और सुभद्रा के के हाथ में एक लिफाफा थमा दिया। लिफाफा खोलते ही उसने एक गहरी सांस ली और वहाँ इकट्ठी भीड़ की समस्या का भी समाधान हो गया। सुभद्रा ने वह लिफाफा अपने पुत्र को थमा दिया। लिफाफे में पूरे दो लाख रुपए का चेक था जिसे कामता प्रसाद के पेंशन की राशि के रूप में भुगतान किया गया था। अगले कई दिनों तक घर में खूब चहल-पहल का माहौल रहा। पूरे गाँव के लोगों को कई दिनों तक भोज दी गई। सबने छककर खाया और कामता प्रसाद की जय जयकार करते रहे। उनके पुत्रों का कद भी समाज में ऊँचा हो गया और वे स्वयं को गौरवान्वित महसूस करने लगे। मन-ही-मन वे अपने पिता के प्रति कृतज्ञ हो गए और उन्हें धन्यवाद दे रहे थे कि मरते-मरते पिताजी कुछ ऐसा काम कर गये जिसके कारण आज वे समाज में खूब सम्मान पा रहे थे।
 
सुभद्रा विचार कर रही थी - "रिटायरमेंट की पेंशन की राशि ने कामता प्रसाद को क्या सुख दिया....? अन्तिम समय तक तो वे पाई-पाई के लिए तरसते रहे और फिर एक दिन दवा और इलाज के अभाव में मृत्यु का वरण कर लिया। आज इन पैसों का उपयोग करने के लिए वे इस संसार में ही नहीं हैं। हाँ - इन पैसों से एक काम अवश्य हुआ कि उनका अंतिम संस्कार अच्छे से हो गया। वरना उनके पुत्र तो ऐसे थे जो अपना धन खर्च करके उनका अंतिम संस्कार भी न करते।"
 
अपने पुत्रों के व्यवहार के प्रति सुभद्रा का मन कड़वाहट से भर उठा और वह उठकर अंदर चली गयी। कामता प्रसाद जिस कमरे में रहते थे सुभद्रा सीधा उसी कमरे में गयी और कामता प्रसाद की एक बड़ी सी तस्वीर को अपने सीने से लगाये काफी देर तक सुबकती रही........
 

- अमिताभ कुमार
 
रचनाकार परिचय
अमिताभ कुमार

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कथा-कुसुम (1)