प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2015
अंक -35

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

स्वतंत्रता- दिवस के उपलक्ष्य में काव्यगोष्ठी का आयोजन

 

काव्यमंच, जोधपुर द्वारा रविवार 16 अगस्त, 2015 को  स्वतंत्रता-दिवस के उपलक्ष्य में रेलवे इंस्टिट्यूट, स्टेशन रोड में एक यादगार काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें हिंदी, उर्दू और राजस्थानी भाषाओँ के कवियों ने भाग लिया। वीर रस के युवा कवि आकाश 'नौरंगी' ने जोश भरने वाली रचना ‘सीने  में दम मांगेगी, आँखों में पानी मांगेगी, आज़ादी अपनी कीमत केवल कुर्बानी मांगेगी’ का ओजपूर्ण  स्वर में पाठ कर श्रोताओं को देशभक्ति के रंग में सराबोर कर दिया। छगन राव ने ‘कहां ढूँढू जगत में उनको वो बोस भगत आजाद नहीं, उन्होंने दिलायी हमें आजादी पर फिर भी हम आजाद नहीं’ तथा दीपा राव ने ‘आपस के रंगों में मत बांटो इंसानों को, हमारे घरों पर हमारा तिरंगा लहराने दो’ सुनाकर इस सिलसिले को आगे बढ़ाया।


इश्राकुल इस्लाम 'माहिर' ने ‘खुशबू न उड़े जिसकी वो रंग चढ़ा जाओ, हर गुल में मोहब्बत का इक बाग़ बसा जाओ’, मुहम्मद अफज़ल जोधपुरी ने ‘कोई सफ़र के वास्ते घर छोड़ के गया, महसूस यूँ हुआ कि दुआ से असर गया’, डॉ. साजिद निसार ने ‘क्या अज़ब हाल है देखो इस जमाने का, करना पड़ता है खुलासा भी मुस्कुराने का’, अशफ़ाक अहमद फौजदार ने ‘इनकार करने वाले इकरार क्या करेंगे, शिकस्ता दिल है वो प्यार क्या करेंगे’, फ़ानी जोधपुरी ने ‘होश में ले आऊंगा मंजर सभी, सोई तस्वीरों पे पानी डाल के’ खुर्शीद खैराड़ी ने ‘आंधी में एक दीप जलाकर आया हूँ, अंधियारे को आँख दिखाकर आया हूँ’ एवम् दिनेश सिंदल ने ‘फूल बगीया में खुशबूयें लाया ही नहीं’ जैसी बेहतरीन ग़ज़लें सुनाकर गोष्ठी को एक कामयाब मुशायरे में तब्दील कर दिया। गीतांजलि व्यास ने ‘उसको देखूं तो आख भर आये, एक नदी से मुझ में उतर आये’, पूर्णदत्त जोशी ने ‘वो पेड़ की अम्बियां वो गाँव की गलियां, याद आते हैं बहुत ही याद आते हैं’, दीपक जैन ने ‘एक लम्हा बीत रहा यूँ ही’ कविताओं का पाठ कर गोष्ठी को नए आयाम दिए।

शैलेन्द्र ढड्ढा ‘मनुष्य क्यों नहीं होता है इस क्षण से संतुष्ट, क्यों वो अतीत या भविष्य में गोते लगाता है, मिथ्या ज्ञान का दंभ हमारे रेशे-रेशे में फेन फैलाता फुफकारता जाता है’, सुनीता चौधरी ने ‘तबसे! वक्त गुनगुना रहा, वही मधुर हंसी युगों से’, मधुर परिहार ने ‘वही तो वो सूखी डाली था, हाथों में थामे हम जिसे घंटो बतियाते’ नीना छीबर ने ‘जी हाँ! हम स्वतंत्र है’ आदि मुक्त छंद रचनाएँ प्रस्तुत की। हरीदास व्यास, राकेश मुथा, आकाश मिड्ढा, वाजिद हसन काज़ी, कल्याण के. विश्नोई, ओमप्रकाश गोयल, प्रताप पागल, सारा शारदा, कमलेश तिवारी, सुरेश सुकुमार ने भी कार्यक्रम में अपनी सुन्दर रचनाओं के माध्यम से श्रोताओं को अंत तक बांधे रखा। मुख्य अतिथि राजस्थानी, हिंदी और उर्दू पर समान अधिकार रखने वाले श्याम सुन्दर भारती के ‘अना को बेच कर जो शोहरत मिले तो उस पर लानत है’ और कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मशहूर शायर हबीब कैफ़ी के ‘क्या हुआ है कुछ हुआ नहीं है, यूँ जीया है कि जीया नहीं है’ ग़ज़लपाठ से काव्य-गोष्ठी सफल समापन हुआ। अंत में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए काव्यमंच अध्यक्ष शैलेन्द्र ढड्ढा ने कहा कि काव्यमंच की यह नौवीं गोष्ठी है और ये गोष्ठियां अब शहर की सांस्कृतिक हलचल का अनिवार्य अंग बनती जा रही है।
कार्यक्रम का सफल संचालन वाजिद हसन काजी ने किया।



- सुरेन बिश्नोई