प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धारावाहिक
गवाक्ष -11
 
प्रसव-पीड़ा की तीव्रता के साथ वह असहज होने लगी, अपने ऊपर से  नियंत्रण  हटने लगा और उसे क्रोध आने  लगा। गर्भ का शिशु उसके भीतर हाथ-पैर मार रहा था और वह अपने शिशु के उस स्पंदन का आनंद इस दूत के कारण नहीं ले पा रही थी। उसके बार-बार पूछने पर वह झल्लाने लगी, "तुम्हें कुछ समझ में नहीं आता क्या? आखिर क्यों जानना चाहते हो मेरी कोख के शिशु के पिता का नाम? कोई भी हो सकता है मेरे शिशु का पिता! तुम भी!" वह क्रोध से बोली। उसके मुख से दबे हुए स्वर निकल रहे थे, वह पीड़ा के कारण  दाँत भींचकर बोल रही थी। दूत भली प्रकार समझ रहा था कि अक्षरा उस समय बहुत क्रोध में थी परन्तु उसकी झल्लाहट भरी बात सुनकर वह सकते में आ गया। 
 
"मैं? तुम्हारा अर्थ है मैं इस शिशु का पिता हो सकता हूँ? मैं अर्थात ???"उसकी देह कंपित होने लगी,संभवत:वह पिता होने का अर्थ समझता था।
'क्या 'गवाक्ष' में भी  इसी प्रकार रिश्ते बनते -टूटते होंगे, क्या वहाँ भी ज़िंदगी इसी प्रकार ऊपर -नीचे बहती होगी, क्या वहाँ भी ज़िंदगी के अर्थ अपने-अपने अनुसार बाँट दिए जाते होंगे?' अक्षरा के मन की क्यारी में जैसे ढेरों  प्रश्न सिर उठाने लगे फिर उसने अपने विचारों को एक झटका दिया। उसे भय हुआ कि यदि वह इस दूत के साथ अधिक खुल जाएगी तब वह अवश्य ही उसका हरण कर लेगा, उसने अपनी जिज्ञासा को ताले में कैद करना उचित समझा। 
    
दूत का गात कँपित हो उठा
'क्या कह रही है यह स्त्री ?'उसने सोचा। कैसे हो सकता है वह उसके शिशु का पिता? वह आज पहली बार उसके परिचय में आया है। क्या कमाल की स्त्री है! दूत को उस सुन्दर बला से भय लगने लगा।   
"यानि पिता कोई भी हो सकता है पर माँ नहीं। समझे मूर्ख? माँ के अतिरिक्त और कोई इस सत्य को उद्घाटित नहीं कर सकता कि उसके शिशु का पिता कौन है? यह सत्य सर्वव्यापी,जगजानी है। स्त्री गर्भ धारण करती है,नौ मास तक शिशु को अपने गर्भ में रखकर अपने रक्त से सींचती है इसीलिए केवल वही यह  दावा कर सकती है कि उसके शिशु का पिता कौन है? वह शिशु को जन्म देती है,जननी कहलाती है।" गर्भवती का मुख मातृत्व के गर्व से दपदप करने लगा , उसने मृत्युदूत को बौखलाहट से भर दिया था। पुन: दूत पर प्रहार करते हुए वह बोली, "यह केवल मैं ही जान सकती हूँ कि मेरे शिशु का पिता कौन है? मैं नहीं समझती कि तुम्हें अथवा किसी अन्य को यह जानने का कोई अधिकार भी है" स्त्री की  दृढ़ता से दूत पर प्रहार पर प्रहार हो रहा था।
 
"मैं तुम्हें बताती हूँ माँ क्या होती है ! दुनिया की प्रत्येक माँ अपने शिशु को जन्म  देती है और अपने  स्थान पर उसको पिता का नाम देती है। कैसी महान कलाकार है माँ जो अपनी कलाकारी पर किसी दूसरे का नाम खुदवा देती है ! लेकिन अपने इस शिशु को मैं अपना नाम दूंगी" वह ममता से भरकर अपने उदर को सहलाने लगी।
'फिर ये समाज, ये दुनियादारी..जिसका अंग हो तुम?" वह बोला। 
"किस समाज और किस दुनियादारी की बात कर रहे हो? जानते ही कितना हो तुम इस दुनिया और इस दुनियादारी के बारे में? बस हवा में सुन लिया और हो गया" 
"नहीं,नहीं मैं तो बस इसलिए कह रहा था कि तुम अकेली और निरीह" उसे चुप हो जाना पड़ा क्योंकि बीच में ही वह  दृढ़ स्वरों में  बोल उठी  थी। 
"न मैं निरीह हूँ और न ही बेचारी, जाओ जाकर किसी निरीह और बेचारी की तलाश करो। मैं एक सबल  माँ हूँ जो अपने शिशु की सुरक्षा के लिए बीहड़ बनों और विशाल पर्वतों से टकरा सकती हूँ।" वह इतने ज़ोर से बोली कि  बेचारा दूत घबरा गया, उसको लगा अभी यह स्त्री उठकर आस-पास रखे औज़ारों में से कुछ भी उठाकर उसे दे मारेगी, वह बेचारा तो वैसे ही दण्ड भुगत रहा था।
 
"बात तो तुम्हारी ठीक है और तुम्हारा प्रश्न भी, मैं भला कैसे तुम्हारे शिशु को ले जा सकता हूँ, मैं तो तुम्हें लेने आया था!"
'न जाने उसके हिस्से में ही ऐसे लोग क्यों आते हैं?' कॉस्मॉस के मस्तिष्क में फिर प्रश्न उभरा !
सहसा स्त्री  को लगा अब वह उसका पीछा छोड़ देगा लेकिन वह गलत थी।
"एक  काम हो  सकता है, शिशु को जन्म देकर  तुम मेरे साथ चल सकती हो?" दूत ने चुटकी बजाई। 
"लगता है तुम मंदबुद्धि हो! क्या कोई माँ अपने नन्हे शिशु को छोड़कर कहीं जा सकती है?” 
यह तो उसने सोचा ही नहीं था। 
"माँ सदा  समर्पण करती है और समर्पण एक मन:स्थिति है। जिसके लिए माँ कुछ सोचती नहीं ,समय नहीं लेती, -बस प्रत्येक स्थिति में स्वयं का समर्पण करती है। अपनी भावनाओं का,अपनी इच्छाओं का,अपनी भूख का,अपनी प्यास का, जो कुछ भी उसके बच्चे को आवश्यकता होती है, माँ बच्चे को बिना किसी शर्त के देती है । 
माँ का सब कुछ ही तो समर्पित होता है, बिना किसी शर्त को ध्यान में रखे अपने आराम का,अपने मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य का और तभी माँ; माँ होती है जिसका स्थान कोई नहीं ले सकता। यह प्रेम बिना शर्त का प्रेम होता है। जानते हो ,समर्पण का अर्थ क्या होता है?" फिर स्वयं ही बोल उठी,"समर्पण ---व्यर्थ की बातें,व्यर्थ की सोच,व्यर्थ की चिंता निकालकर फेंक देना, यही समर्पण है जो स्वयमेव हो जाता है। जब हम किसी भी परिस्थिति में कुछ बदलाव कर ही नहीं सकते,वह समर्पण हो जाता है। जब माँ बच्चे को प्रत्येक परिस्थिति में अपना 100% देती है ,उसके एवज में उसकी कोई इच्छा ,कोई मांग नहीं होती ,वह समर्पण हो जाता है । अब तुम ही सोचो, बच्चे को इस प्रकार छोड़कर जाया जा सकता है, जैसी तुम मुझसे अपेक्षा कर रहे हो? " 
 
कॉस्मॉस चकरा  गया, उसकी बुद्धि ने जैसे काम करना ही  बंद कर दिया। कुछ तो कहना था-
"अपने बारे में बताओ न " वह बच्चों की भाँति बोला। 
“अभी मैं तुमसे कुछ बात नहीं कर सकती, यहाँ से जाओ। कभी अवसर मिलेगा तब देखेंगे।"अक्षरा की प्रसव-पीड़ा बढ़ गई थी।
 मृत्यु-दूत की स्थिति इस समय 'मरता क्या न करता 'की सी थी। वह शांत मुद्रा में गर्भवती स्त्री के चेहरे पर पीड़ा के चिन्ह देखते हुए कक्ष से बाहर निकल गया। 
 यह निरीह कॉस्मॉस जहाँ भी जाता, वहीं से अपने भीतर एक नई संवेदना भरकर ले आता। भयभीत भी था किन्तु बेबस भी। उसकी बुद्धि में कुछ भी नहीं आ  रहा था, वह क्या करे?  मंत्री जी ने उसे अपने प्रोफ़ेसर के कार्य में विघ्न न डालने की हिदायत दी थी जिसका उसने पालन करने का प्रयास भी किया था  परन्तु उसके भीतर उगती संवेदना ने उसे एक गर्भवती स्त्री की  मनोदशा व शारीरिक पीड़ा से आत्मग्लानि से भर दिया था। "समर्पण, अपने आपको झुका देना और माँ तो सदा बच्चे के समक्ष झुकती ही आई है।" कॉस्मॉस के  लिए यह एक नया अनुभव था। उसे एक माँ की इस संवेदना ने भीतर तक छू लिया था।   
 
गर्भवती अक्षरा  ने प्रसव-पीड़ा से नेत्र मूँद लिए,उसके नेत्रों की कोरों से अश्रु ऐसे  बहने लगे जैसे किसी मोम की चिकनी सतह पर पानी बह रहा हो। कैसी दुहरी मार पड़ी थी उस पर! उसके मन में कितनी ही बार शिशु के पिता के चेहरे की कल्पना बनी थी किन्तु सब व्यर्थ था। कुछ समय तक वह अपने छोटेपन में बेचारी बनकर गुमसुम हो गई किन्तु अपनी पूरी स्थिति पर ध्यान केंद्रित करने के पश्चात उसने सकारात्मकता की डोर पकड़ ली। वह दर्शन की एक ज़हीन छात्रा थी जिसके टूटने का अर्थ जीवन से विश्वास उठ जाना था। उसने अंत में अपने शिशु को जन्म देने का निश्चय किया और जैसे ही उसने निश्चय किया, वह अपने विचारों तथा व्यवहारिकता में दृढ़ होती चली गई। कॉस्मॉस के चले जाने के पश्चात उसे  कमरे में उसकी प्रिय सखी शुभ्रा,भाभी स्वरा तथा भाई सत्यनिष्ठ दिखाई दिए। 
 
"मैं भाभी,भैया को बुलाने चली गई थी, नर्स को कहकर गई थी। कुछ परेशानी तो नहीं हुई?" कमरे में घुसते ही उसने सफाई दे डाली। 
भाभी आते ही उसके गले चिपटकर रो पड़ीं,"कैसी है तू?"
"डॉक्टर कहते हैं सब ठीक है पर अभी समय लगेगा।" भाई ने सिर पर लाड से हाथ फेरा। 
अक्षरा को शायद  कोई इंजैक्शन दे दिया गया था, पीड़ा उसके चेहरे पर पसरी हुई थी और आँखों में अँधकार भरने लगा था। डॉक्टर के आदेशानुसार तीनों चुपचाप कमरे में पड़े हुए सोफे पर बैठ गए । 
बंद नेत्रों में भरे भूतकाल के सपनों भरे सतरंगी  दिन उसके समक्ष मुखर होने लगे और वह उनसे जुड़ने लगी ।   
 
सत्याक्षरा अर्थात बालपन की स्वीटी ,युवावस्था की अक्षरा ,स्कूल-कॉलेज की सत्याक्षरा ! एक नाज़ुक सी नन्ही बच्ची  के इतने ही नहीं न जाने कितने नाम ! छुटकी, गुड़िया,डॉली ,रोज़ी,महक जो जिसका मन होता अपने अनुसार उसका नामकरण कर देता। नन्ही सी गुड़िया सबकी बाहों में उछलती रहती, मचलती तो कंधे पर उठाकर उसे सैर कराई जाती, रोती तो आँसू पोंछने के लिए कई हाथ आगे बढ़ जाते। बालपन के नखरे पूरी मुहब्बत व उत्साह से झेले गए। समय की रफ़्तार ने न जाने कहाँ,कैसे त्वरित पँख लगा लिए थे कि पता ही नहीं चला वह किन नाज़ुक क्षणों में सोलहवीं दहलीज़ पर आ खडी हुई। उसके सोलहवें वर्ष का स्वागत कितने हर्षोल्लास से किया गया था ! अड़ौसी-पड़ौसी ,नाते-रिश्तेदार सभी के उदर में खलबली मच गई थी! एक बेटा भी तो हुआ था बरसों पहले, कितना बुद्धिमान! ज़हीन बच्चा ! कितना समझदार! उसके लिए तो इतने दिखावे किए नहीं गए थे ! हाँ, अक्षरा  का बड़ा भाई सत्यनिष्ठ ! वो भी बहन से लगभग दस वर्ष बड़ा। 
“मास्टर,मास्टरनी का दिमाग़ चल गया है बुढ़ापे की संतान, वो भी लड़की! उस पर कैसे फुदक रहा है पूरा परिवार ! बेटे को भी घुट्टी पिला दी है। भाई बहन के लिए हर पल  न्योछावर करने के लिए तैयार रहता है। अपने बारे में तो वह कुछ सोचता ही नहीं।" समाज की आदत है ताने कसने की ! बेटी को इतना लाड़ देना समाज पचा नहीं पाता !
             
शास्त्री युगल अर्थात सत्यनिष्ठ एवं सत्याक्षरा के माता-पिता दोनों शिक्षण में संलग्न थे। परंपरावादी  होते हुए भी हितकर बदलावों से उन्हें कोई आपत्ति न होती। वे समाज के ढकोसलों से सदा दूर रहते तथा जीवन में वर्तमान को स्वीकारते हुए प्रसन्नता से अपने समक्ष आने वाली  कठिनाई का सामना करते रहे अत: कठिनाईयाँ भी उनके पुरुषार्थ के समक्ष  टिक नहीं सकी थीं। स्मिता तथा सत्यलंकार  शास्त्री का विवाह भी खासी उम्र में हुआ था। विवाह के वर्ष भर में बेटे के जन्म के पश्चात लंबे दस वर्षों तक वे अपने बेटे सत्यनिष्ठ में  सुन्दर संस्कार सींचते रहे। दस वर्षों के पश्चात स्मिता की  प्रौढ़ावस्था  में जब एक नन्ही सी सुकोमल परी के आगमन का अचानक ही संदेश प्राप्त हुआ, हाँ,संदेश ही तो था। स्मिता की शारीरिक अस्वस्थता व शरीर में  बदलावों  के बारे  में चिंतित  पति-पत्नी जब  महिला स्वास्थ्य केन्द्र गए तब महिला-चिकित्सक के द्वारा ज्ञात हुआ कि स्मिता पुन: माँ बनने वाली है। चालीस वर्षीया स्मिता नख-शिख लाल भभूका हो उठी! इस उम्र में माँ ! समाज में सब क्या  कहेंगे? स्मिता  के मन में हलचल होने लगी। डॉक्टर ने स्पष्ट  शब्दों में चेतावनी दी थी कि यद्यपि गर्भ को अधिक समय नहीं हुआ है तथापि उन्हें माँ व शिशु के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए  बच्चा रखना ही होगा।पति-पत्नी दोनों भ्रूण हत्या के बारे में सोच भी नहीं सकते थे, उनके संस्कार ही उन्हें इसकी आज्ञा नहीं देते थे। इस प्रकार सत्याक्षरा माँ  के ममतामय आँचल में आ गई थी। 
 
अट्ठारह वर्ष की होने पर भव्य समारोह में धूमधाम से उसका जन्मदिन मनाते  हुए पिता सत्यालंकार को दिल का भयंकर दौरा पड़ा और परिवार में दुःख और मायूसी के बादलों ने आनंद व  प्रसन्नता  को अपनी काली चादर के नीचे ढ़क लिया। इतनी शीघ्र बदलाव हो सकता है क्या? जीवन की प्रसन्नताएँ इतनी  क्षणभृंगुर! लगता, दिन के उजियारे काल -रात्रि  में परिवर्तित हो गए।कुछ ही समय में जीवन की वास्तविकता स्वीकार ली गई, थमा हुआ सा जीवन पुन:गति पकड़ने की चेष्टा में संलग्न हो गया। सत्यनिष्ठ तब तक अपनी शिक्षा पूर्ण करके एक सम्मानीय पद पर प्रतिष्ठित हो चुका था। वह बहन तथा माँ को बाध्य करके अपने साथ पूना ले आया जहाँ से लगभग एक वर्ष पश्चात ही उसका स्थानांतरण बंबई  हो गया। अपने परीक्षा-परिणाम के फलस्वरूप अक्षरा को बंबई के  नामी तथा स्तरीय कॉलेज में प्रवेश प्राप्त हो गया। बहन की शिक्षा में रूचि थी और वह शिक्षण में माँ व भाई का नाम रोशन कर रही थी। अपने पुत्र व पुत्री की प्रगति देखकर माँ बहुत प्रसन्न थी किन्तु वह  पति का वियोग बहुत दिनों तक नहीं संभाल सकीं और  अपनी लाड़ली पुत्री को बेटे के हवाले करके उन्होंने भी संसार से विदा ले ली।
माँ  के जाने के कुछ दिनों के पश्चात ही सत्यनिष्ठ बहन के विवाह के बारे में चिंतित रहने लगा ;
"अक्षरा !अब बस तेरी शादी किसी अच्छी जगह हो जाए तो मैं निश्चिन्त  हो जाऊँ--"
"क्यों भाई ! क्या जीवन का ध्येय केवल शादी ही है? इससे आगे कुछ नहीं? 
मैं अभी अध्ययन करना चाहती हूँ, माँ भी  तो चाहती थीं कि मैं आगे अध्ययन  करूँ।" 
 

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- डॉ. प्रणव भारती