प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जरा सोचिए!
सारा दोष बच्चों का ही नहीं होता!
 
पिछले दिनों पता चला मयंक अवसाद में है और उसका इलाज चल रहा है | तसल्ली हुई कि चलो इलाज शुरू हो गया क्योंकि अवसाद में जाने से पहले जब वो बात –बेबात पर अपने माँ –बाप , पत्नी पर चिल्लाता या बच्चों पर हाथ उठाता तभी मुझे शक होने लगा था कि कुछ तो गड़बड़ है वरना मयंक जैसा सभ्य, शालीन लड़का ऐसा नहीं कर सकता | बचपन से जानती हूँ उसे, कितना संवेदनशील बच्चा रहा है | जरा सी बात पर पिघल जाना और अपने खिलौने , कापियाँ दूसरे बच्चों को दे देना उसकी आदत थी | कितनी बार माता-पिता की मार भी खायी पर मयंक नहीं बदला तो नहीं बदला | 
 
आइये आप का भी मयंक से परिचय करा दें | मयंक उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में अपने माता –पिता व् दो भाइयों के साथ रहने वाला है | तीनों भाइयों में दो –दो साल का अंतर है | बचपन से ही तीनों भाई  पढने में बहुत होशियार थे | अपनी कक्षा में प्रथम आना, वाद –विवाद प्रतियोगिताएं जीतना, खेलकूद में भाग लेना व् कभी –कभी पदक जीतना उनके मिडिल स्कूल तक के जीवन का एक हिस्सा था | किसी के तीनों बेटे और तीनों इतने काबिल, इस बात के कारण उनके मध्यमवर्गीय माता –पिता  छोटे से शहर में बहुत यश पाने लगे, हर कोई आ कर उनको बधाई देता , “भाग्य हों तो आप जैसे, तीन के तीनों लड़के लायक, आगे की उम्र तो नोट गिनते हुए आराम से कटेगी |” माता –पिता का सर भी गर्व से तन जाता | यही वो समय था जब माता-पिता की आँखों में एक सपना पलने लगा ...IIT का , ये सपना उन्होंने अपने बेटों  की आँखों में भी बोना शुरू कर दिया | 
 
 
बच्चे जानते थे कि छोटे शहर में जहाँ शिक्षा व् कोचिंग की सुविधायें इतनी अच्छी नहीं हैं वहाँ  ये सपना पूरा करना इतना आसान नहीं है, फिर भी उन्होंने अपने आप को पूरी तरह झोंक दिया | ऑन लाइन ट्यूटोरियल्स व् टेस्ट सीरीज ज्वाइन की | बच्चों की मेहनत का आलम ये था कि सुबह तीन –साढ़े तीन बजे उठ जाते और देर रात तक पढाई करते | उनकी मेहनत को देखकर घर आने वाले  लोग आश्चर्य में पड़ जाते |  इस घनघोर तपस्या के परिणाम आने शुरू हुए | पहले बड़े बेटे का IIT में चयन हुआ , फिर मंझले का | मयंक उस समय ११ वीं में आया था , उसने अपने माँ से कहा , “ माँ मैं नहीं चाहता की IIT से पढूं , क्योंकि यहाँ अपने कस्बे  में उस लायक कोई नौकरी नहीं मिलेगी, मैं आप लोगों से दूर नहीं रहना चाहता, मैं यहीं रहना चाहता हूँ आपके पास, मैं यहीं कॉलेज में पढ़ाऊँगा|” उसका इतना कहना था कि माता –पिता के सपनों पर तो जैसे वज्रपात हो गया हो | उन्होंने रोना –पीटना शुरू कर दिया, “दोनों बेटे लायक निकले, एक तू नालायक निकला, पढना नहीं चाहता है, मेहनत नहीं करना चाहता है, बहाने बनाता है, दोनों भाइयों ने तो बहुत नाम रोशन किया पर तेरे कारण हम किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे |” 
 
संवेदनशील मयंक पर इस बात का गहरा असर हुआ | पढ़ने  में होशियार तो वो था ही उसने अपने दोनों भाइयों से भी ज्यादा कड़ी मेहनत शुरू कर दी, परिणामस्वरूप  IIT में उसकी रैंक 245 आई जो उसके बड़े भाइयों से कई गुना  बेहतर थी | मयंक मुंबई चला गया | वो दिन उनके माता –पिता के लिए बहुत अच्छे थे | हर तरफ वाहवाही मिलती , गर्व से उनका सर तना रहता | उनके तीनों लाडले बड़ी –बड़ी नौकरियों  के लिए चयनित हुए | खूब दहेज़ लेकर उनके विवाह हुए और बड़ा बेटा कनाडा में व दो  छोटे बंगलौर में रहने लगे | 
 
समय बदला | माता –पिता 65 से ऊपर हुए , शारीरिक व्याधियां घेरने लगीं | बेटों ने पास बुलाना चाहा  पर उन्हें अपने कस्बे  से इतना प्यार था कि महानगरीय जिन्दगी में उन्होंने रचने बसने से इंकार कर दिया | बेटा –बहू दोनों उन्हें अपने साथ चलने के लिए कहते पर उनका यही जवाब होता यहाँ तो पूरा क़स्बा जानता है, वहाँ  कौन अपना है, हमारा मन नहीं लगेगा | माता –पिता जब –जब बीमार पड़ते, मयंक जरूर आता परन्तु नौकरी के कारण दो –चार दिन से ज्यादा रुक नहीं पाता | अब माँ अक्सर मयंक पर भावनात्मक दवाब बनातीं,” इससे तो अच्छा भगवान् मुझे एक नालायक बेटा दे देता, कम से कम बुढ़ापे में सेवा तो करता, तुम सब तो अपने बीबी बच्चों के साथ ऐश कर रहे हो, देखो हम यहाँ घिसट रहे हैं, ऐसे ही एक दिन भगवान् के यहाँ चले जायेंगे, पर तुम लोगों को क्या?” ऐसा नहीं है कि वो ये बातें सिर्फ मयंक से कहतीं पर संवेदनशील मयंक अपराधबोध से भर जाता, उसका प्रभाव उसके घर और बच्चों पर पड़ता | 
 
ऐसे ही किसी समय में अपनी माँ के बहुत बीमार पड़ने पर उसने भावनात्मक दवाब में उसने अपनी नौकरी छोड़ दी और पत्नी –बच्चों के साथ माँ –पिता के पास कस्बे में रहने आ गया | माता –पिता बहुत खुश हुए परन्तु बड़े घर से आई पत्नी को अचानक से पति की छोटी नौकरी और कस्बाई जिन्दगी रास नहीं आई | बच्चों की शिक्षा से भी वो खुश नहीं थी | पति –पत्नी में झगड़े  होने लगे | वही माता –पिता जो मयंक के नौकरी छोड़ने पर खुश हुए थे , पत्नी के सामंजस्य न स्थापित कर पाने का सारा दवाब मयंक पर बनाने लगे कि तुम ने नकेल ढीली छोड़ रखी है तभी सब परेशानी है | उधर वही पत्नी जो बंगलौर में सास –ससुर के साथ रहने को तैयार थी, का अब तर्क होता कि विवाह से पहले ही उसे नौकरी छोड़ देनी चाहिए थी ताकि उसके माता –पिता इस घर में उसकी शादी ही न करते ... उसके साथ धोखा हुआ है | 
 
कुछ समय और बीतने पर जब माता –पिता बड़े भाइयों द्वारा लाये गए उपहारों को पास –पड़ोस में बहुत शान से दिखाते तो मयंक का मन मायूस  हो जाता | मयंक को हीनभावना पनपती कि वो इतने महंगे उपहार अपने माता-पिता के लिए नहीं ला सकता | मयंक खुद अपने को अपने भाइयों व उन साथियों से कमतर महसूस करने लगा जो आज बहुत ऊँचे –उचे पदों पर बैठे थे | IIT के अन्य दोस्तों के साथ उसने फोन व्हाट्स एप के कनेक्शन कट दिए ताकि उसको उनसे बात कर हीन न महसूस हो | अकेलापन बढ़ने लगा और  उसका स्वभाव चिडचिडा होने लगा ....और धीरे धीरे भयंकर अवसाद ने उसे घेर लिया | 
 
 
*ये कहानी सिर्फ मयंक की नहीं है बहुत से संवेदनशील बच्चों की है, जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर बड़ी नौकरियों में दूसरे शहरों में रह रहे हैं, जहाँ उनके माता –पिता आ कर रहना ही नहीं चाहते क्योंकि उन्हें अपनी कस्बाई जिन्दगी पसंद है पर बीमार पड़ने पर बच्चों को दोष देने से गुरेज नहीं करते | ऐसे बच्चे या तो अपराधबोध में जिन्दगी जीते  हैं या नौकरी छोड़ने जैसा कदम उठा लेते हैं जो उन्हें आगे अवसाद में ले जाता है |
 
आज बहुत से मध्यम वर्गीय माता –पिता अपने बच्चों की आँखों में ऐसे  सपने भरते हैं जिसको पाने के लिए बच्चों को अतिशय मेहनत करनी होती है | उस समय उन मासूम बच्चों की सबसे बड़ी ख़ुशी अपने सम्मान से ज्यादा अपने माता-पिता का नाम ऊँचा करना होती है | पर नौकरी लगने के बाद जब ये ही माता –पिता वृद्धावस्था में बच्चों के शहर में ना जा कर उसे कस्बे  में लौटने का भावनात्मक दवाब बनाते हैं तो उन्हें उस मेहनत का जरा भी ख्याल नहीं आता जो जो इस पद को प्राप्त करने के लिए उनके बच्चे ने अपने बचपन की मासूम उम्र में की थी |  क्या ये सोचना जरूरी नहीं है कि अचानक से पद –प्रतिष्ठा जाने से उनके मन मष्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? या इस तरह बार –बार उलाहना देने पर उनमें कितना भावनात्मक दवाब पड़ेगा | 
 
* ढेर सारा दहेज़ ले कर अपने बेटे को बेचते  समय उन्हें इस बात का ख्याल नहीं रहता कि ऊँचे घर की ( क्योंकि इतना दहेज़ मध्यमवर्गीय माता –पिता नहीं दे सकते जो करोंड़ों में हो ) लड़की  जो एक अफसर की पत्नी बन कर आई है, क्या बेटे के नौकरी छोड़ देने पर उसे खुद के साथ धोखा हुआ महसूस नहीं होगा | बेटे पर दवाब बनाते हुए क्या माता –पिता की ये जिम्मेदारी नहीं है कि वो ये समझे जो आपका बेटा है वो किसी का पति व पिता भी है | 
 
*पैसे वाले बेटों से घर में रहने वाले बेटों की तुलना कर के क्या माता-पिता उन्हें बात-बात पर जलील नहीं करते | 
 ये बात सच है कि वृद्धावस्था में सहारे की जरूरत होती है, उनको लाचार अवस्था में छोड़ देना एक गुनाह है परतु कुछ प्रतिशत बच्चे ऐसे भी हैं जो बहुत ही संवेदनशील हैं जो जिन्दगी की उलझन में खुद उलझ कर रह गए हैं वो या तो अपराधबोध में जी रहे हैं या अवसाद में .... जिनके बारे में न ज्यादा लिखा जाता है न ज्यादा बात होती है | यहाँ तक कि माता –पिता भी अपने बच्चे की मनोदशा उसकी घुटन समझ नहीं पाते , फिर समाज से क्या उम्मीद की जाए | 
अभी हाल में एक आई ए एस अधिकारी की आत्महत्या आज के समय में बढ़ते ऐसे भावनातमक दवाबों की ओर इशारा करती है | क्या जरूरत नहीं है कि आज की इस समस्या में केवल बच्चों को गुनहगार न साबित करके समस्या के हर पहलू पर विचार किया जाए , तभी समाधान निकलने की  संभावना है | 
 
कुछ समाधान जो मुझे समझ आ रहे हैं ...
 
1 ) जिस तरह से बुढ़ापे के लिए आर्थिक निवेश करते हैं उसी तरह से ये सोचना भी जरूरी है कि बुढ़ापे में आप कहाँ रहेंगे | जब आप बच्चों  की आँखों में बड़े सपने भर रहे होते हैं तो ये भी समझ  लीजिये कि उनको पाने की मेहनत बच्चे कर रहे हैं आप नहीं ...उनकी मेहनत के अनुसार पद –प्रतिष्ठा पाना उनका हक़ है इसलिए तय कर लें कि इसके लिए आप उन्हें परोक्ष या अपरोक्ष ताने नहीं देंगे | 
2) बच्चों के मन में ये बात पहले से डाल  दें कि हम तो तुम्हारे साथ रहेंगे ,बहु आने पर भी उसे ये ना लगे कि ये जिम्मेदारी उसे निभानी नहीं है | बल्कि शुरू में जब अपने बच्चों को पालने में उसे दिक्कत हो तो ज्यादा से ज्यादा सहयोग करें ... इससे रिश्ते मजबूत होते हैं | 
3) अपने बेटे की शादी अपनी हैसियत के हिसाब से करें | दहेज़ के लालच में बहुत बड़े घर की बेटी ला कर उस के ऊपर सामंजस्य का पूरा बोझ ना डाल दें | ये उसके प्रति भी अन्याय होगा | 
4) अगर आप अपने ही कस्बे में रहते हैं तो बेटा धन से जो सुविधाएं उपलब्ध करा रहा है उसे लेने से इनकार न करें | मैं ऐसे बहुत से मध्यमवर्गीय लोगों को जानती हूँ जिन्हें बेटे द्वारा लगायी गयी कामवाली, ड्राइवर, नर्स आदि फिजूलखर्ची लगता है | वो ये सारे काम खुद करना चाहते हैं पर अशक्त शरीर से कर नहीं पाते हैं, जिस कारण बार –बार बीमार पड़ते हैं ...तब वो खुद और पडोसी बच्चों को दोष देते हैं | यहाँ माता –पिता और बच्चों दोनों को एक दूसरे की मजबूरी समझने की जरूरत है | 
5) अगर माता –पिता अपने ही कस्बे में रहने का फैसला करते हैं तो उन्हें अपने आस –पड़ोस में संबंध इतने अच्छे बनाने चाहिए कि जरूरत पड़ने पर वो  तुरंत मदद कर दें | इसके लिए उन्हें आस –पड़ोस के बच्चों की देखभाल आदि का काम वैसे ही सहर्ष स्वीकार करना चाहिए जैसे वो अपने नाती –पोतों की करते | समाज एक दूसरे की जरूरत को समझने व् सहयोग करने से ही बनता है | 
 
क्योंकि बच्चों  को नौकरी या जीवकोपार्जन के लिए गृहनगर से बाहर जाना है इसलिए आज की इस समस्या को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता | हम सब को इस बारे में सोचना है | आप भी अपने विचार अवश्य रखें |
 
 

- वंदना बाजपेयी
 
रचनाकार परिचय
वंदना बाजपेयी

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