प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
 
वासु
 
वह बहुत घबराई हुई सी बोल रही थी। आज सुबह पहली बार ही उस से बात हुई थी। वासु नाम था उस का। मुझे घर में खाना बनाने के लिए एक अदद महिला की ज़रुरत थी। आजकल सोसाइटी में व्हाट्सप्प से लगातार जुड़े रहने से बहुत से काम आसान हो जाते हैं। मैंने भी अपनी ज़रुरत डाली और उस के प्रत्युत्तर में आयी अनेक सम्भावनायें।  
रसोई में काम करवाना बहुत आसान नहीं होता। खाना मनपसंद न हो तो खाने का मज़ा खत्म। साथ ही खाने की मेज़ की गपशप का भी बंटाधार। हमारे परिवार में यह समय बहुत ही विशेष होता है। खाने के बाद और खाने के साथ घर से दुनिया तक की सभी ताज़ा तरीन ख़बरों पर विचारविमर्श, बहस और सुझाव जैसे मन और मस्तिष्क दोनों को फिर से नयी ऊर्जा से भर देता है। यह प्रतिदिन का  नियम है या यूँ कहिये कि नियम से बहसने की खानदानी परंपरा चली आ रही है हमारे परिवार में।  
 
लो बात खाना बनाने के लिए एक अदद मदद की हो रही थी और मैं कहाँ की बातों में  उलझ गयी। एक दो महिलायें आयीं भी, परीक्षण पर रखा, पर बात बनी नहीं। मैंने खोज और तेज़ कर दी। यूँ घर में खाना बनाने के लिए सभी हाथ सहायता के लिए आ जाते हैं, पर फिर भी मुझे एक सहायक की ज़रुरत महसूस हो रही थी। अब चूँकि मुझे मनभावन मदद नहीं मिल रही थी और जो चीज़ आप चाह  के भी न पा सके, वह पाने की इच्छा और तीव्र हो जाती है, यही  कुछ मेरे साथ भी  हुआ। मैंने फिर से दरकार लगाई और एक और फ़ोन नंबर चट्ट से ग्रुप पर चमका। 
बस उसी क्षण फ़ोन किया। वासु ने फ़ोन उठाया और बहुत ही सहमी सी आवाज़ में उत्तर दिया। मैंने उसे अगले दिन आने को कहा। सुबह १२ बजे के लगभग घंटी बजी, सामने एक पतली दुबली ३५-३७ वर्ष की मुस्कुराती वासु खड़ी थी। साथ मे  थी छोटी सी ८- १० साल की पायल। 
 
"अरे आने मे  बड़ी देर कर दी तुम ने", मैंने कहा। 
"ओह, क्या आप ने किसी और को रख लिया"? माथे पर चिंता की लकीर उकर आई।  "नहीं नहीं! रखा नहीं किसी को, बस आज का काम ख़तम हो गया, अब कल से तुम काम शुरू कर लेना.", मैंने सहजता से कहा। 
"काम क्या है?" उस ने पूछा। 
"सब्ज़ी कटवानी है और रोटियां बनवानी हैं।" 
डरते डरते उस ने पगार पूछी। सीधी थी। साथ मे कह भीं गयी, "मुझे रेट पता नहीं है। अभी नया काम शुरू कर रहीं हूँ।"
 "यहाँ १५०० का रेट चल रहा है. वैसे काम इतना नहीं है, पर मैं रेट के हिसाब से पूरा ही दूंगी।" मुझे उस पर कुछ ज़्यादा तरस आ गया था। सोच रही थी १८००- २००० दे दूँ, बहुत गरीब लग रही थी, पर कहीं उस के आत्मविश्वास को ठेस न पहुंचे इस डर से चुप हो गयी। साथ खड़ी बच्ची की आँखों मे काम पक्का होते देख चमक आ गयी थी, शायद उस की स्कूल की फीस का इंतज़ाम हो गया। 
 
"ठीक है, मैं फिर कितने बजे आऊँ?" 
"सुबह साढे - नौ दस तक आ जाना।" 
वह हामी भर चली गयी।  दोनों के चेहरों  पर एक तसल्ली सी दिखी और मुझे मन में कुछ अच्छा सा लगा। 
अगले दिन सुबह ९.३० बजे दोनों माँ बेटी हाज़िर हों गयीं। पायल वहीं से स्कूल जाती, ११ बजे का था उस का स्कूल। अब उस का रोज़ आना, काम करना और  थोड़ी सी बातें करने का सिलसिला शुरू हो गया। साफ़ सुथरी सुघड़ वासु मेरे दिल को भा गयी थी। बहुत दिनों बाद इतना मनभावन सहायक मिला था। मुझे बहुत  था। 
 
वह न बिंदी लगाती थी न सिंदूर और न चूड़ियां। यानी सुहाग की कोई भी निशानी नहीं। यूँ तो मैं खुद इस नियम को नहीं मानती पर वासु को ऐसा करते देख मुझे कुछ अजब लगा।  गाँवों में ये परम्पराएं अभी भी दिल से निभाई जाती हैं। खैर! मैं पूछ तो कुछ न पायी। फ़िर धीरे धीरे पता लगा कि उस के पति ने तीन बच्चों के बाद उसे छोड़ दिया। शादी के ७-८ साल बाद। अच्छा तो यह" सेवन ईयर 'itch'  का मामला है। मैं मन ही मन हंस दी। हर आदमी अपने को धर्मेंदर समझने लगा है क्या?  थोड़ा गुस्सा भी आया। 
राजस्थान के गाँव से आती है वासु।  गुजरात की सीमा से लगा हुआ छोटा सा गाँव। अभी भी गाँवों मे ऐसी मरदूद परम्पराएं चल रही हैं, जहाँ कानून का कोई डर नहीं है। खैर! कानून का डर होता तो क्या हमारे समाज में इतनी बुराईयां पनपतीं? औरत के प्रति पुरुष बिना किसी डर के इतना अत्याचारी हो पाता?
 
मैंने फिर पूछा -"तीनों लड़कियां हैं क्या, जो आदमी ने छोड़ दिया?" 
"नहीं २ बेटे और यह १ बेटी है। बेटे बड़े हैं, गाँव में सास ससुर के पास है। मैं बेटी के साथ यहाँ अहमदाबाद में काम के सिलसिले में रहती हूँ। 
"हिम्मत की दाद देती हूँ", मन ही मन मैंने कहा। वाक़ई, गाँव से अकेले अनजान शहर में  आके काम करना, विदेश जाने जैसा ही तो है। कितना खतरा है, काम मिले न मिले, फिर कैसे घर मिले, सुरक्षा और सावधानी कैसे बरती होगी इस सीधी साधी वासु ने?. मेरे मन मे  हज़ारों प्रश्न उठ खड़े हुए। और हो भी क्यों ना? आज के समाज मे औरत की सुरक्षा कितना बड़ा मुद्दा है, यह किसी से छुपा है क्या? 
 
"कोर्ट मे केस नहीं किया"? मैंने फिर उस के घाव को कोंचा। मेरा इरादा उसे ठेस पहुँचाना कदाचित न था। किसी और की ज़िन्दगी मैं ताक़झाँक करना यूँ तो मेरी आदत में भी शुमार नहीं था, पर यह किस्सा बहुत दिलचस्प होता जा रहा था। वासु की एक विशेषता थी कि वह अपने भूतकाल  की बातें बिना किसी भावनात्मकता के उत्तर देती थी। मानो उन दिनों से अपने को बिलकुल काट चुकी हो या अपने अपमान को पी चुकी हो। 
"नहीं। जब पहली बार उस ने कहा कि वह मुझे छोड़ना चाहता है तो मैं एकदम घबरा गयी थी, पायल बहुत छोटी थी, कोई साल सवा साल की रही होगी। अच्छा कमाता था, घर से बाहर निकली नहीं थी। बच्चे कैसे पलेंगे! यह बड़ा सा प्रश्न मुंह बाए सर पर हथौड़े सा लग रहा था। आखिर दोनों की ही तो है यह ज़िम्मेदारी। फिर सोचा अगर इसे कुछ हो जाता, भगवान् को प्यारा हो जाता तो भी तो पालती। बस उस दिन से उसे मैंने अपनी ज़िन्दगी से मरा माना और आगे बढ़ गयी। समय लगा, शुरू में, पर अब वह मौजूद ही नहीं है मेरे लिये।" मेरा दिल उस के प्रति इज़्ज़त से भर गया। औरत मे कितना दमखम होता है, यह उस डेढ़ हड्डी की पतली दुबली वासु ने मुझे समझा दिया। 
 
यूँ ही दिन बिताते गए, वह रोज़ काम पर आती। काम समझ गयी थी, धीरे धीरे सहज हो चली थी। उस दिन १५ अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष्य में घर पर नाश्ते में पूरी कचौड़ी का आयोजन किया। नाश्ता क्या, ब्रंच ही समझिये। अब कहाँ वह खाने वाले रह गए हैं, जो तीन टाइम कैलोरीज से भरपूर खाना डकार जाएँ। परिवार के सदस्यों को गरम गर्म खिलाने के उदेश्य से मैं भी उस के साथ खड़े हो कर कचोरियाँ तलवाने लगी।  कचोरियाँ अकेले बनाना ज़रा मुश्किल भी है और फिर तेज़ी  से नहीं बनती। अब जब दो महिलाएं काम कर रहीं हो  तो जीभ पर ताला तो लगा नहीं सकते।  बस बातचीत होने लगी और उसी में पता लगा कि उस का पति शादी  कर के पास के ही किसी गाँव में  रहता है। उस की इस शादी से  तीन लड़कियां हैं। यह बता के कुछ गर्व से भर गयी, आखिर उस के दो बेटे जो थे। 
 
कुछ दिन और हुए, तो मैंने कहा कि तुम मशीन से कपडे सुखा दिया करो और सूखे कपडे तह कर दिया करो, ५०० रु और  दे दूंगी। उस के पास टाइम की कमी तो थी नहीं। उसने शौक़ से काम पकड़ लिया और मुझे कृतार्थ कर दिया। हाँ, कृतार्थ ही तो किया क्योंकि मुझे कुछ अच्छा करने का मौका तो दिया उस ने। 
यह जान के अच्छा लगा कि उस के सास ससुर ने अपने बेटे से रिश्ता ख़तम कर दिया है और वासु को मंझदार में नहीं छोड़ा। घर यानी ससुराल में ज़मीन हैं कुछ, ऐसा बताया वासु ने, जो सास ससुर ने वासु के नाम कर दी हैं.  पर उस से बस पेट भरने लायक ही  उपज होती है, बच्चों को पढ़ाने की फीस का जुगाड़ करना मुश्किल हो गया था। सो वासु को सास ससुर ने शहर जाने की सलाह दी। बेटी को साथ ले आयी। ज़माना खराब है, भाई नादान और दादा दादी उम्रदराज़, उन के भरोसे बेटी छोड़ नहीं सकती थी। सो साथ ले आयी। मैंने भी मन ही मन सोचा, सही किया। दोनों को एक दूसरे का सहारा है। 
 
वह कहते हैं न, "गॉड हेल्प्स दोस हु हेल्प्स देमसेल्व्स!"  बस अहमदाबाद आते ही उसे एक घर में काम मिला। उसी एक घर में काम करते करते, वासु  ने ७ साल निकाल दिए।  बच्ची का स्कूल में दाखिला, पढ़ाई और एक अदद रहने को कमरा। सभी में उन्होंने सहायता की। उनके चेन्नई जाने के बाद एक बार फिर उसे काम की तलाश करनी पड़ी और फिर मेरे यहाँ काम शुरू किया। धीरे धीरे उसे सोसाइटी में बहुत काम मिल गया।  खूब मेहनत और ख़ुशी से काम करती, गाँव आती जाती, सभी रिश्ते निभाती। वह एक ही सपने को ले कर अपनी राह पर निरंतर चली जा रही थी। एक धुन सी सवार थी कि बच्चों को पढ़ा लिखा कर अपने पैरो पर खड़ा करना है। पायल की पढ़ाई पूरी होने तक वह काम करती रही। सोसाइटी में इतने घर थे, एक काम छूट भी जाता तो दूसरा मिल जाता।  समय अपनी रफ़्तार से चलता रहा। पायल ने बी.एड कर लिया था, दोनों बेटे भी अच्छे पढ़ लिख गए थे।  घरों मे काम करते करते ही उसने अपने एक बेटे को इंजीनियर बनाया और दूसरे ने एग्रीकल्चर में स्नातक की डिग्री ली। वह गाँव मैं ही रहना चाहता था। वासु भी अब थकने लगी थी। 
 
वासु ने मुझे घर में काम करने वालों के सपनों और कठिन रास्तों से अवगत करवाया।  मुझे मानवता का एक पाठ पढ़ा गयी वह। अपने सुरक्षित घरोंदो में बैठे हमें पता ही नहीं चलता कि हम से कितनी बड़ी उम्मीद लगा के बैठे हैं यह "दो कौड़ी के कामवाले", जो जब चाहे छुट्टी ले लेते हैं और पैसा बढ़ाने के लिए ब्लैकमेल करते हैं!
आज बरसों बाद हाथों में पायल की शादी का कार्ड पकड़े उमा जी समय की नाव में बैठ मानों पिछले १५ वर्षों  की यात्रा कर आयीं। जैसे यह शादी का कार्ड नहीं, कोई टाइम मशीन हो। कैसे एक कड़ी से कड़ी जुड़ती गयी और पायल का भविष्य उजला और प्रकाशमय होता गया। ख़ुशी इस बात की भी थी कि इन कड़ियों में एक कड़ी मैं भी हूँ, उमा जी ने सोचा। 
पायल को एक सुखी जीवन देने में उस की दादी सब से मज़बूत कड़ी साबित हुई। यदि वह उस समय वासु का साथ नहीं देती, उस के सपनों को उड़ने का सम्बल न देती तो शायद पायल आज एक खूबसूरत कहानी का किरदार न हो पाती!

- पुष्पनीर
 
रचनाकार परिचय
पुष्पनीर

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कथा-कुसुम (1)