प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अक्टूबर 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म समीक्षा
रिश्तों की सिलाई करना सिखाती है सुई धागा
 
 
 
निर्देशक– शरत कटारिया
प्रोड्यूसर/निर्माता– आदित्य चौपड़ा
कलाकार– वरुण धवन, अनुष्का शर्मा, रघुबीर यादव , नमित दास, गोविंद पांडेय आदि
 
 
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ परि जाय॥
 
अब आप सोचेंगे फिल्म रिव्यू या समीक्षा में रहिमन जी के दोहे का क्या काम तो वो तो आप खुद ही समझ लीजिए। रिव्यू पढ़कर या फ़िल्म को देखकर। आपका हाले दिल भी कुछ ऐसा ही कह उठेगा। वैसे हाल फिलहाल की फिल्मों में ऐसा बहुत कम हुआ है कि वो आपको शुरुआत में ही बाँध ले और अंत तक बाँधें रखे। अपने गौरव, अस्मिता और खोई हुई पहचान को पुनश्च पाने का प्रयास हजारों बार आप और हम पर्दे पर देख चुके हैं। और ये सब हमें मनोरंजन देने के साथ-साथ संदेश भी देते हुए दिखाई देती है। पैडमैन और राजी जैसी फिल्म के बाद अगर किसी को याद किया जाए तो सुई धागा का नाम सबसे पहले जेहन में आपके आए तो भी कोई अतिश्योक्ति वाली बात नहीं है। 
 
दरअसल यह फिल्म ही कुछ ऐसी है कि इसके बीच में आने वाला इंटरवल भी आपको एक बारगी अखरता है और आपके मुँह से स्वाभाविक रूप से निकल जाए कि अरे यार ये क्यों आ गया तो मुझ नाचीज को एक बारगी जरा याद कर लीजिएगा। खैर फिल्म की कहानी कुछ यूँ है कि – “सब ठीक है” एक निम्न मध्यमवर्गीय परिवार जो गाँव से उठ कर शहर आया और यहाँ भी दो टुक रोजी रोटियों के जुगाड़ में पिसता रहा। मालिकों का कुत्ता बना, बंदर बना पर सब ठीक है। क्योंकि उसके पास कोई और चारा जो नहीं। ऐसी कहानियाँ फ़िल्मी पर्दे पर आपको जरुर रोमांचित करती है किन्तु वहीं सिनेमा घरों से बाहर निकलने के बाद फिर वही अपने आस पास जब आप उन लोगों को देखते हैं जो दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं तो आपका सारा मनोरंजन काफूर भी हो जाता है। फिल्म में मौजी के रूप में वरुण धवन है जिनका जितना अभिनय है उतनी ही नेपथ्य में आवाज भी। और इस मौजी का एक बड़ा भाई है जो अपनी बीवी का कुत्ता बन बैठा है और अपने ससुराल वालों के सामने रिरियाता रहता है। वहीं उसका छोटा भाई मौजी है जिसने शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी अपनी बीवी ममता यानी अनुष्का शर्मा के साथ बैठ कर खाना तक नहीं खाया। और इस तरह के सीन हों या फिल्म में ममता की सास की नौटंकियाँ और फिर असल में बीमार हो अस्पताल के बिस्तर पर पड़ना। या फिर मौजी के बाप का इतना कच्चे दिल का होना कि टीवी सीरियल में लड़की की बिदाई देखकर रो देना वहीं खुद का बेटा उसे छोड़ अपने ससुराल में घर जवाई बन बैठा उसका उसे दुःख तक नहीं। बस ले देकर अपने छोटे बेटे को निकम्मा, आवारा बता कर उसे सुनाता रहता है। लगभग एक साधारण से परिवार से उठाई हुई यह कहानी जब सिनेमाई पर्दे पर रोमांस, प्यार, तकरार और तू तू मैं मैं के साथ-साथ हँसी-ठठे के फ़व्वारे छोड़ती है तो दिल खुश हो जाता है।
 
बाकि फिल्म की कहानी जानने के लिए आपको सिनेमाघर का रुख अवश्य करना चाहिए। यह फिल्म आपको मनोरंजन के साथ साथ प्रेरणा भी प्रदान करेगी। प्रेरणा रिश्तों को बनाए रखने की, प्रेरणा सकारात्मक रहने की और विशेष बात यह फिल्म आपको किसी भी मोड़ पर कतई निराश नहीं करेगी। हाँ फिल्म का दुसरा हाफ़ जरुर एक मिनट के लिए विचलित कर सकता है और लगता है कि जैसे फिल्म बेवजह खींची चली जा रही है। लेकिन चुइंगम की तरह उसे खींचने से बचाने का काम जो निर्देशक और फिल्म के एडिटर ने किया है वह इस फिल्म को हर पहलू में फिट बना देता है।
 
फिल्म के संवादों की बात करें तो ये जरूरत के मुताबिक़ है। जहाँ जरूरत पड़ी रोमांस और जहाँ जरूरत पड़ी भावुकता का मिश्रण। अभिनय के मामले में निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की झाँकी को फिल्म के सभी कलाकारों ने बखूबी निभाया है और एकदम अच्छे से अपने क्षेत्र को पकड़ कर रखने में कामयाबी पाई है। वहीं फिल्म का दूसरा पहलू निम्न मध्मयवर्गीय परिवारों के कम पढ़े लिखे या भावुक लोगों के साथ जिस तरह बड़े लोग या कुछ ज्यादा होशियार लोग होश्यारी दिखाते हैं उनका भी फिल्म में बराबर सहयोग रहा है और फिल्म में एक सीन है फैशन शो का जिसे देखकर आपको फैशन जैसी फ़िल्म भी सहज रूप से याद आ सकती है। शॉर्ट एंड स्वीट इस फिल्म की कहानी को भी शॉर्ट एंड स्वीट तरीके से निभाया गया है यही वजह है कि फिल्म के लगभग सभी गाने आपको एक तो बोर नहीं होने देते दूसरा आपको पैर थिरकाने का भी मौका अवश्य प्रदान करते हैं। यह सुई धागा वही है जिसकी हर घर में हर रोज लगभग जरूरत होती है। सिर्फ फटे हुए कपड़ों को सिलने के लिए ही नहीं बल्कि फटे हुए रिश्तों को भी रफ़ू करने के लिए और उनमें एक मजबूत टांका फिर से भिड़ाने के लिए भी।

- तेजस पूनिया