प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्याँकन
जीवन की पगडंडी से भटकते मानव को आवाज़ देता संग्रह: उठने लगे सवाल
- सुनीता काम्बोज
 
 
बहुआयामी प्रतिभा के धनी राजपाल सिंह गुलिया साहित्य की विविध विधाओं में अनवरत लिख रहे हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं और समाचार पत्रों के माध्यम से उनके छंदों, बालगीतों एवं ग़ज़लों ने जनमानस के पटल पर एक प्रभावी स्थान बनाया है।  हिंदी के साथ-साथ हरयाणवी भाषा के प्रति  उनका  प्रेम एवं समर्पण सराहनीय है। राजपाल सिंह गुलिया की साहित्यिक यात्रा का पहला स्तम्भ उनका पहला दोहा संग्रह 'उठने लगे सवाल' अपने शीर्षक को सार्थक करता है। पुस्तक पढ़कर गुलिया जी का समस्त व्यक्तित्व हमारे सामने उभर जाता है। यह दोहा-संग्रह कवि के गहन चिंतन और अनुभूतियों  का धाराप्रवाह प्रकटन है। एक सुयोग्य शिक्षक की भूमिका में गुलिया जी राष्ट्रीय निर्माण के साथ-साथ साहित्य के उन्नयन में भी अहम भूमिका अदा कर रहे हैं। साहित्य के अमृत से अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सींचकर कवि ने अपनी धरोहर और मर्यादाओं का संरक्षण किया है। कवि ने मन में उठते सवालों को शब्द देकर, जो दोहे रचे; वह पाठक के अन्तरतल पर अपनी मधुर सुगन्ध छोड़ जाते हैं। साहित्यिक सागर में भावपक्ष अगर नौका है तो शिल्प पक्ष पतवार की तरह है, एक के बिना भी यात्री पार जाने में अक्षम है। यह दोहा-संग्रह शिल्प और भावपक्ष के सारभूत और व्यापक दृष्टिकोण के कारण कवि राजपाल सिंह  गुलिया को उच्च श्रेणी के दोहाकारों की श्रेणी में लाकर खड़ा करता है। राजपाल सिंह गुलिया का खेतों और गाँव से लगाव, देश के प्रति निष्ठा और प्रेम, सियासतदानों  के प्रति आक्रोश, बदलते परिवेश के प्रति चिंता, संकीर्ण सोच, आज का मानवता का गिरता स्तर, प्रकृति दोहन, दार्शनिक दृष्टि, बढ़ते हथियार ,अवसरवाद, असमानता, सामाजिक विसंगतियों आदि पहलुओं को छूकर लेखनी चलाई है।
 
आज का अतृप्त  मानव अपने सुखों को देखने की बजाय दूसरों की गागर का अनुमान लगाने में उलझा रहता है, समाज में दिखावे के बढ़ते संक्रमण के कारण मानव स्वयं के दोषों को अनदेखा कर औरों के अवगुण गिनने में लगा है। कवि ने मानव के बदलते मिजाज़ और दिखावे के अंदाज़ को बयां किया है। मानव की इस सोच पर व्यंग्य करते हुए यह दोहे सब कुछ कह जाते हैं-
 
धीरज उसमें धर सखे, जो है तेरे पास।
देख गगरिया गैर की, बढ़ा रहा क्यों प्यास।।
 
सूप पड़ा चुपचाप अब, समझ न आया भेद।
छलनी बढ़-चढ़ बोलती, जिसमें अनगिन छेद।।
 
गुलिया जी के सन्देशप्रद दोहे, जीवन की पगडंडी से भटकते मानव को आवाज़ दे रहे हैं। जिस प्रकार कबीर, रहीम और बिहारी के दोहों ने सामजिक, धार्मिक, राजनैतिक आडम्बरों पर चोट की है, उसी प्रकार गुलिया जी ने अनेक ज्वलंत मुद्दों को बड़ी निर्भीकता से ललकारा है। कुछ दोहे ख़ुद में कई गूढ़ अर्थ समेटे हुए चमत्कृत कर उठते हैं। बानगी के तौर पर कुछ दोहे-
 
लोग रहे सब तापते, जब तक जला अलाव।
फिर उस ठंडी राख से, रखता कौन लगाव।।
 
खुरपे की जबसे सखे, कुंद हुई है धार।
बगिया में बढ़ने लगा, तब से खरपतवार।।
 
कवि मन जनमानस की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझता है। जब कवि का कोमल हृदय किसी असहज घटना से आहत हो जाता है, तब अनायास ही उसके भाव कविता, छंद या ग़ज़ल का रूप ले मुखर हो उठते हैं। भ्रूण-हत्या और बेटियों के प्रति असमानता का व्यवहार, दहेज और शिक्षा का अभाव जैसे सवाल उठाकर कवि उनके उत्तर तलाशने का प्रयास कर रहा है। कवि शहीदों के सपनों के भारत की कल्पना को साकार होते देखने की चाहत मन में रखकर सृजन कार्य में रत है। कृषक परिवार में जन्मे गुलिया जी किसानों के हर दर्द को बाख़ूबी समझते हैं। किसानों की चिंताएँ उन्होंने बहुत क़रीब से देखी हैं, यही कारण है कि धरती माँ  के प्रति उनकी पुत्रवत आस्था देख मन भाव-विभोर हो जाता है।
 
कर्जे से दबे किसान, बढ़ता अतिक्रमण, फसल योग्य भूमि पर बनते कारखाने, फसल पर मौसम का क़हर आदि आपदाओं का वर्णन कर, कवि ने सरकारों के प्रति मन की कुंठा को काव्य के रूप में प्रकट किया है। कवि की मनोभूमि में जब पीड़ा के अंकुर फूटते हैं तब कवि अनायास ही बोल पड़ता है कि-
 
लोक-लाज ने खा लिए, जननी के जज़्बात।
कचरे के डिब्बे पड़ा, सोच रहा नवजात।।
 
घटाटोप को देखकर, सोचे खड़ा किसान।
देखूँ सूखा खेत या, दरका हुआ मकान।।
 
इस बंगले को देखकर, मत हो तू हैरान।
इसकी खातिर खेत ने, खो दी है पहचान।।
 
कवि ने देश मे बढ़ते भ्रष्टाचार और गिरगिट की तरह रंग बदलते सियासतदानों को बड़ी बेबाकी और साहस से आँख में आँख डालकर चेताया है तो दूसरी ओर धर्म के नाम पर होती राजनीति का पर्दाफ़ाश किया है। मतदान के प्रति जनमानस को जागृत करने का सफल प्रयास करके कवि भारत के नवनिर्माण की ओर इशारा करता हुआ कहता है-
 
महल विधायक देखकर, आया यही ख़याल।
शक्ति बहुत है वोट में, सोच समझ कर डाल।।
 
जनसेवक है खेलता, आज अनोखा खेल।
एक पैर संसद भवन, रहे दूसरा जेल।।
 
प्रकृति के प्रति समाज की उदासीनता देख कवि मन द्रवित हो उठता है। जिस प्रकृति ने मानव को अपना दुलार देकर बड़ा किया, मनुष्य का उसके प्रति यह दुर्व्यवहार कवि को अखरता है। आशावादी कवि बदलाव के इस तूफान से लड़कर फिर से परम्पराओं के सुमन खिलाने की चाहना रखता है। बड़े गम्भीर अंदाज़ में आज की व्यवस्था पर कटाक्ष कर, कवि सुधार की नींव के लिए मजबूत स्तम्भ तलाश रहा है।
 
मैली गंगा देखकर, उभरा यही सवाल।
आज भगीरथ देखते, होता बहुत मलाल।।
 
वृक्ष काट हम ले रहे, कितनी महंगी पीर।
कम बरसें अब मेघ भी, गया रसातल नीर।।
 
जब-जब रिश्वत को मिला, अपना सही मुकाम।
झटपट ख़ारिज हो गए, जितने थे इल्ज़ाम।।
 
अखर गया कुतवाल को, उसका एक सवाल।
केस बनाकर लूट का, किया बरामद माल।।
 
सुंदर शब्द संयोजन, सरल भाषा-शैली, सहज भाव अनुभूति इस संग्रह की श्रेष्ठता अनुप्रमाणित करती है। उर्दू शब्दों का ख़ूबसूरत प्रयोग छंद की ख़ूबसूरती बढ़ा रहा है।
 
मन के भावों को शब्दों में ढालकर, शिल्प का माधुर्य भर, पाठक वर्ग तक लाना एक लम्बी यात्रा है। मुझे पूर्णतः विश्वास है कि यह संग्रह पाठक के अंतर्मन को ज़रूर छुएगा। उनकी यह साहित्यिक यात्रा अनवरत चलती रहे और भविष्य में उनकी अविस्मरणीय कृतियाँ पढ़कर मन भाव-विभोर होता रहे। इन्हीं मंगलकामनाओं के साथ मैं राजपाल सिंह गुलिया को आत्मिक बधाई प्रेषित करती हूँ।
 
 
 
समीक्ष्य कृति– उठने लगे सवाल
रचनाकार– राजपाल सिंह गुलिया
विधा– दोहा छन्द
मूल्य- 200.00 रुपये
पृष्ठ संख्या- 96
संस्करण- प्रथम, 2018
प्रकाशक– अयन प्रकाशन, 1/2 महरौली, नई दिल्ली– 110030
दूरभाष– 9818988613

- सुनीता काम्बोज
 
रचनाकार परिचय
सुनीता काम्बोज

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ग़ज़ल-गाँव (1)गीत-गंगा (1)मूल्यांकन (1)