प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
बादल
 
एक
मैं सफ़र पर हूँ बादलों के
जो खुले हैं और फैले हुए भी
 
यह सफ़र ज़रा तवील है 
तब भी चलते जाना है 
महापक्षियों के काफ़िले
जिस तरह चलते जाते हैं
 
बादल भी यही तो करते हैं
साँकल खटखटाकर बढ़ जाते हैं
नए सफ़र पर हमेशा की तरह
धूसरित पत्तों को नहलाकर
 
दो 
मेरा घर कहीं गुम जाता है
गुम जाते हैं घर की तरफ़ जाते रास्ते
 
बादलों को पकड़े-पकड़े
कई पुराने शहर खोज निकालता हूँ
कई पुराने रास्ते तलाश लेता हूँ
 
बादल हैं कि मेरा घर नहीं लौटाते
न मेरे घर की तरफ़ जाते हुए रास्ते
 
तीन 
मैं जो ख़ानाबदोश हूँ साल-दर-साल से
और ज़िंदगी मेरी ख़ानाबदोशी से भरी हुई
 
मेरे बारे में तुम कुछ सुनो न सुनो
बादल सुन लेते हैं मेरे सारे क़िस्से
हज़ार जुगतबंदी अपनाकर
 
चार 
रात ढलती है बादलों की सियाही में
दिन ढलता है बादलों की सफ़ेदी में
 
सन्नाटे तक को बादल अकेला नहीं छोड़ते
 
आसमान भी अकेला कहाँ होता है
जैसे मैं अकेला होता हूँ तुम्हारे बग़ैर
 
पाँच 
शहर की भीड़ डराती है मुझको अब
यहाँ सभी मसीहा थे आदमी कोई न था
 
उदास थे बादल भी शहर के बदले हुए हालात पर
 
शहर में बस दुकानें थीं सामाँ बेचतीं
अनगिन सवाल बेचतीं
अनगिन झूठ और फ़रेब बेचतीं
 
मैं मुसाफ़िर साया करने वाला इस कड़ी धूप का
 
यही सच है, बादल हैं अपने दलबल के साथ
शहर की आबरू को बचाते मेरी कविताओं में।
 
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छाता
 
एक 
मेरे पास घर नहीं है छाता है
तुम्हारे पास घर है छाता नहीं है
 
तुम दुबके रहते हो अपने घर में
मैं लड़ता रहता हूँ सिरफिरी हवाओं से
अपने छाता को लड़ने का सामाँ बनाकर
 
मैं जिस्म तो छाता साया मेरा
निकला हुआ हूँ तवील सफ़र पर
 
दो 
घूमता हूँ बारिश के काफ़िले का हिस्सा बनकर
तुम मेहमाँ ठहरे चिलचिलाती धूप में मेरे यहाँ आए
 
मेरा छाता अब तुम्हीं का हुआ मुसाफ़िर
और बदले में धूप मेरी हुई सदियाँ तक के लिए
 
तीन 
जिस तरह चाँद नहीं थकते
जिस तरह सितारे नहीं थकते
 
छाता भी कहाँ थकता है
जिस तरह नहीं थकते कामगार पिता
 
चार 
मेरा बदन मिट्टी का हमेशा से
तुमने बतलाया तुम्हारा बदन लोहे का
 
मेरे बदन को कहाँ गलने दिया मेरे छाते ने
तुम ज़ंग खाए लोहे के जैसे हुए कबके
 
पाँच 
क्या छाता रच सकता है कोई भाषा
 
तुम जब युद्ध रच सकते हो
तुम जब मार-काट रच सकते हो
रच सकते हो बलात्कार और हत्याएँ
 
कोई छाता कोई भाषा काहे नहीं रच सकता
छाता जबकि मेरा छाता है हमेशा भाषा में जीता हुआ।
 
 
 
 
 
 
 
 
 

- शहंशाह आलम
 
रचनाकार परिचय
शहंशाह आलम

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