प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

यात्रा-वृत्तांत / पर्यटन-स्थल
आज हिन्दुस्तान के दिल 'मध्यप्रदेश' की चंद धमनियों/शिराओं के महिमा मंडन प्रवाह और सुंदरता से अवगत करवाती हूँ आप सबको। तो तैयार हो जाइये मेरे साथ ऐंती पर्वत पर बने त्रेतायुगीन शनिधाम से शनिदेव का आशीर्वाद ले कर यात्रा आरंभ करने के लिये.....प्रीत के साथ वाला पिट्ठू बैग ले कर।
 
इतिहास का अचंभित करने वाला अभूतपूर्व,अविस्मरणीय,रोमांचक सफर एक जाने माने सत्य के साथ। बहुत सालों पहले गई थी तब व्यवस्थायें कम थी पर्वत शिलाओं से चढ़ना उतरना पड़ा था अब सड़कें भी हैं और मंदिर प्रांगण भी बहुत आसान,साफ- सुथरा कर दिया गया है ।( बस प्रांगण में जलती समिधा कुंड ले कर बैठे पंडित नुमा लोगों की सुने बिना आगे मंदिर तरफ बढ़ जाइयेगा )
पर्वत से रिसती गुप्त गंगा के स्नान हेतु आज से 15 साल पहले एक साझा कुंड था आज महिला व पुरूषों के घाट व गुसलखानों की पृथक व्यवस्था कर दी गई है।
 
शनिधाम/शनीचरा/षनिष्चरा की महिमा:-
 
जिला मुरैना में ऐंती पहाड़ को अब शनीचरा पहाडी कहा जाने लगा है श्री शनिदेव मंदिर के कारण। यह देश का सबसे प्राचीन त्रेतायुगीन शनि मंदिर है और यहाँ स्थापित श्री शनिदेव की प्रतिमा भी विशिष्ट अद्भुत है कहा जाता है कि यह मूर्ति आसमान से टूटकर गिरे उल्कापिण्ड से निर्मित हुई है प्राचीन कथानुसार हनुमान जी ने अपने चातुर्य से शनिदेव को लंकापति रावण के पैरों के नीचे से मुक्त कराया था। कई वर्षो तक दबे होने के कारण शनिदेव अति दुर्बल हो चुके थे।शनिदेव ने हनुमान जी को बताया कि जब तक वे लंका में रहेंगे तब तक लंका-दहन नहीं हो सकेगा और वे लंकापति के पैरों तले वर्षों से दब कर इतने दुर्बल हो चुके हैं कि उनका चलना मुश्किल है। तब हनुमान जी ने शनिदेव को पूरी ताकत से भारत भूमि पर फैंका और शनिदेव मुरैना जिले के ऐंती ग्राम के पास स्थित एक पर्वत पर उल्कापिंड जैसे जा गिरे जिसे अब शनि पर्वत कहा जाता है। शास्त्र कथाओ में वर्णित है कि शनि पर्वत पर ही शनिदेव ने घोर तपस्या कर शक्ति एवं बल प्राप्त किया। शनिदेव की मूर्ति स्थापना, चक्रवर्ती महाराज विक्रमादित्य ने उल्काशिला को यहाँ लाकर की थी एवं विक्रमादित्य ने ही शनिदेव की प्रतिमा के सामने हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की थी।मंदिर प्रांगण में शिलालेख पर भी यही लिखा हुआ है। पहले हनुमान बाबा का घी का दीप जला कर आगे बढ़ शनि की तैलार्पण व तैलदीप जलाया जाता है। शनीचरा पहाड़ी पर स्थापित होने से विशेष शनि के प्रभाव से यहाँ लौह अयस्क की भरमार है
 
यह भी कहा जाता है कि शनि सिंगनापुर (महाराष्ट्र) में स्थापित शिला को शनीचरा पहाड़ी से ही ले जाकर स्थापित किया गया था। अर्थात् मुरैना का शनीचरा विश्व भर के शनि मंदिरों का राजा है। यहाँ अब शनीचरी अमावस्या को बड़ा मेला लगता है। शनिवार को भक्त भंडारे करते हैं ,तेल चढ़ाते हैं, हवन करते हैं ,गुप्त गंगा स्नान कर के शनि का प्रभाव कम करने को लोग उतरे कपडे़ चप्पल आदि यहीं पहाडी पर फैंक जाते हैं । कहते हैं ये सबसे बड़ा शनि सिद्ध पीठ है यहाँ शनि की तपस्या और स्थापना से अलौकिक शक्तियाँ महसूस की जाती हैं मन को यहाँ आकर एक सुकून सा मिलता है। मानो कोई सिर पर हाथ रख कह रहा हो कि- चिंता ना करो मैं हूँ ना साथ। दर्शन और दिनों आसान हैं अमावस पर भीड़ उमड़ती है। तेल चढाना भी बहुत सरल है बड़ी सी लौह ट्रे में आप अपना तेल डालें वो पाइप के जरिये अलौकिक शनि प्रतिमा के सिर से पैर तक गिरता है ।
मध्यप्रदेश टूरिज्म के संरक्षण में आने पर रंगत बदल गयी है यहाँ की.... हनुमान जी की मूर्ति के अलावा अब यहाँ काली माँ,राधाकृष्ण, विघ्नहर्ता गणपति भी विराजमान हैं।
 
 
आसान डगर:-
 
मुरैना से ग्वालियर रोड पर टोल से आगे नूराबाद कस्बे तक बढ़ते हैं... कहते हैं कि नूराबाद पर एक दफा मल्लिका नूरजहाँ ने अपना पढ़ाव डाला था तभी से इस जगह का नाम नूराबाद पड गया यहाँ उस वक्त पुल बनाया गया था आवाजाही के लिये और इस पुल पर आप मुगलकालीन सुंदर नक्काशी देख कर अंदाजा कर सकते हैं।बहरहाल हम नूराबाद के बीचोंबीच से आगे निकले सफर पर शनिधाम की ओर बढ़ते हैं। नूराबाद से लेफ्ट ले कर कस्बे के भीतर से थोडी घुमावदार पर सही सड़क है।कस्बा खत्म होते -होते रेलवे क्रासिंग है मगर अब वहाँ अंडरपास बना दिया गया है हम गाड़ी वहीं से आगे बढाते हैं...अंडर पास की वजह से रेलवे क्रासिंग से बच गये हैं ...कोई ट्रेन जा रही थी।
 
दोनों तरफ गेंहूँ के खेतों के बीच से हम बढ़ते जाते हैं 20-25 मिनिट में पड़ावली गाँव होते हुये आगे बढते हैं....पडावली गाँव के भीतर का बस 8-10मिनिट का रास्ता ढुच्चुक पिच्चुक है...पर तकलीफ़ देय नहीं है...फिर मस्त डंबर रोड है। प्रधानमंत्री सड़क योजना ने सडकों का नक्शा बदल कर रास्ता इत्मीनान वाला कर दिया है !
 
अब हम लगभग 18 -20मिनिट पर भूराडाँडा गाँव पहुँचे हैं,,,,अब रान्स गाँव आने को है हम लगातार ऐंती पर्वत श्रंखला के नजारे लेते हुये बढते जा रहे हैं। कभी रोड घुमाव लेते ऊपर कभी ढलान ले रही है आनंद आ रहा है। मुश्किल से 10 या 15 मिनिट लगे हमें " शनीचरा शनिधाम" पहुँचने में ...ये कह सकती हूँ कि नूराबाद के मध्य से होते हुये ज्यादा से ज्यादा 40-45 मिनिट बस। (ग्वालियर की तरफ से बसों व टैक्सियों से भी शनीचरा पहुँचा जा सकता है। राजमाता विजयाराजे सिंधिया हवाई अड्डे से शनिश्चरा मंदिर सिर्फ 15 किलोमीटर दूर है। जबकि शनि अमावस्या पर यहाँ भीड़ होने के कारण उस दिन कई स्पेशल ट्रेन और बसें मंदिर तक के लिए चलाई जाती हैं।)
 

पौड़े वाले हनुमान जी:-
 
जी हाँ, दोस्तो! इस इलाके में शनीचरा से उल्टे हाथ पर पहाडी पर ऊपर बस 5 से 7 मिनिट के रास्ते पर " पौड़े मतलब लेटे हुये हनुमान जी की भारत तो क्या शायद विश्व की इकलौती मूर्ति है और इस से भी खास बात कि ये मूर्ति आश्चर्यजनक तरीके से स्वयं सिर की तरफ से ऊपर की ओर उठ रही है  चमत्कार ही कहा जायेगा कि
पुरातात्विक व भू-वैज्ञानिक सर्वे टीम बहुत कोशिशें कर चुकीं हैं ये जानने कि ये मूर्ति आखिर स्वयं कैसे उठ रही है ,,पर विज्ञान यहाँ भी अलौकिक चमत्कार के
आगे नतमस्तक हो गया है। बूढ़े पंडित से पूछा मैंने तो कथन सामने आया कि - "जिस रोज ये प्रतिमा पूर्ण रूप से सीधी खड़ी हो जायेगी उस दिन कलयुग की समाप्ति होनी निश्चित है।
 
मैं हनुमान भक्त हूँ तो मेरा तो यहाँ निहाल होना बनता ही था....पस्साद (चंबल की भाषा 'प्रसाद') चढ़ा के बाहर आई ही थी कि सामने नजर गई नये बने मंदिर पर विशाल शिवलिंग मेरे बर्फानी बाबा का और सामने नंदीश्वर व कोटरे के भीतर अर्धनारीश्वर..... मन तो मानो रम ही गया ...घर लौटने को दिल ही नहीं हो रहा था, पर अगले पढ़ाव पर निकलना था।
 
इति नहीं है ये..... क्रमशः
प्रीत के देशी रंग प्रीत के संग।
 
 
 
 

- प्रीति राघव प्रीत