प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

संस्मरण
अद्वितीय नवल डागा
(संस्मरणात्मक व्यक्तित्व परिचय)
 
 
शाम होने से पहले पहले हम लोग मालवीय नगर स्थित उनके घर पहुंचे तो आदरणीय नवल डागा जी और उनकी जीवनसंगिनी स्नेहमूर्ति शारदा डागा जी घर के आगे खड़े हमारी प्रतीक्षा करते मिले।
(हम, अर्थात मेरा मेरे पुत्र वैभव के साथ डागाजी के यहाँ जाना पूर्वयोजित था। निमित्त बने जयपुर के सरल हृदय कविवर किशोर पारीक जी। और संयोगवश कवयित्री कविता किरण जी भी, जो दो दिन से जयपुर में किशोर जी के यहाँ मेहमान थीं। लौटना था उन्हें फालना शाम को ही, लेकिन जिनकी गाड़ी 5-7 घंटे लेट होने के कारण वे भी हमारे साथ चलीं डागा जी के यहाँ।)
 
क्या-क्या, कैसे, कौन हैं श्री नवल डागा!
 
  • डागा जी, जो पिछले इकतालीस वर्ष से कहीं किसी के यहाँ नहीं गए।
  • डागा जी, जो किसी भी मांगलिक अथवा शोक अवसर पर भी कहीं नहीं जाते, लेकिन बावजूद इसके रखते हैं अपने दादाजी के अंश के वर्तमान में जीवित 373 रिश्तेदारों से जीवंत जुड़ाव।
  • डागा जी, जिनके यहाँ होता है छह हज़ार आठ सौ बाईस (6822) प्रकार के घरेलू उपयोग के आइटम का उत्पादन और इनमें से एक हज़ार दो सौ उनहत्तर (1269) प्रकार के आइटम केवल निःशुल्क वितरण के लिए ही हैं।
  • कोई भी अपनी लड़की के विवाहोपलक्ष्य में बारातियों को बांटने के लिए, अपने बच्चों के जन्मदिवस पर स्कूल में, घर-परिवार में बांटने के लिए, रक्तदान शिविरों के लिए आवश्यक उपकरण, वृक्षारोपण हेतु आवश्यक सामान, पक्षियों के घौंसलों एवं चुग्गा-पानी में सहायक सामग्री आदि-आदि विभिन्न प्रकार के आइटम चाहे जितनी संख्या में आपसे सप्रेम निसंकोच निःशुल्क प्राप्त कर सकता है, कोई भी। न कोई अभिमान, न ही उपकार भाव, न दानशीलता का दंभ अहंकार!
  • डागा जी, जो सूचना मात्र से जयपुर में होने वाले काव्य कार्यक्रमों में कवियों के मान-सम्मान उपहार और नाश्ते पानी भोजन की व्यवस्था विनम्रतापूर्वक सहजता से कर देते हैं...घर बैठे ही। (स्वयं कहीं जाते ही नहीं)
  • डागा जी, जिनके मन-मस्तिष्क में प्रकृति और पर्यावरण के लिए एक अद्वितीय अविश्वसनीय जुनून की हद तक समर्पण भाव है।
  • डागा जी, जिनकी अब तक 557 दोहा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं है, किसी पुस्तक का मूल्य नौ रुपये से अधिक नहीं। यद्यपि पुस्तकें ये सभी को निःशुल्क ही देते हैं।
  • डागा जी, जो साहित्य सृजन की कोई दावेदारी न करने के उपरांत जन चेतना एवं मानवीय मूल्यों की स्थापना संबंधी लगभग बीस हज़ार दोहों का सृजन कर चुके हैं और दोहे भी लय-शिल्प के दृष्टिकोण से सर्वथा शुद्ध, त्रुटिहीन एवं परिपक्व! और दोहों के विषय-
  • प्रकृति पर्यावरण सुरक्षा, वृक्षारोपण, वृक्ष और वनों का पालन संरक्षण, जीव दया, गौसेवा, गौहत्या पर प्रतिबंध एवं गौवंश की रक्षा, जनसंख्या नियंत्रण, रक्तदान, बालिका-शिक्षा, नारी समानता, बालिका एवं नारी सुरक्षा, सामाजिक कुरीतियों का निवारण, दहेज उन्मूलन, मृत्युभोज का बहिष्कार, जन्म विवाह एवं अन्य मांगलिक अवसरों पर फ़िज़ूलख़र्ची और आडंबर रोकना आदि-आदि।
 
आपकी कथनी और करनी में कहीं अंतर नहीं। आपने केवल उपदेश न देकर अपने कार्यों द्वारा निजी जीवन में ढालकर सदैव जीवंत संदेश दिया है! 
श्रीमती और श्री डागा ने अपनी पहली संतान, पुत्री होने के उपरांत स्वयं ही आपसी सामंजस्य से, पहल करके वैवाहिक जीवन शुरू होने के मात्र डेढ़ दो वर्ष बाद ही परिवार नियोजन अपना कर गहरी समझ, दृढ़ संकल्प और अनूठे त्याग का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। आपने अपनी माताजी का स्वर्गवास होने पर नेत्रदान और देहदान करके भी उच्च आदर्श स्थापित किया था।
 
मालवीय नगर में इनके निवास के नज़दीक पहुंचते-पहुंचते हमें स्वतः इनके घर के पास होने का आभास हो जाता है। खंभे-खंभे पर, पेड़ों के तनों पर, कचरा पात्रों पर, गली में बने गाय-सांडों के ठाण कुंडों पर, जगह-जगह आकर्षक रंगों में विविध शिक्षाप्रद दोहे पढ़ते-पढ़ते इनके घर का पता मिल जाता है।
घर के मुख्य द्वार में प्रविष्ट होने से पहले पच्चीस-तीस मिनट तो गैलरी में ही लग जाएंगे। पेड़, नीचे भू तल से आसमान तक पहुंचती बेलें लताएं, पक्षियों के गत्ते के बनाए घौंसलों में से चहचहाते नन्हे पक्षी, ऊपरी मंजिल तक छोटा मोटा सामान खींचकर ले लेने के लिए रस्सी से लटकाई गई टोकरी, गाय का ठाण और दीवारों सहित इन सब पर छपे हुए दोहे ही दोहे!
 
जूते उतार कर मुख्य द्वार में प्रविष्ट होते ही सर्वत्र दरवाज़ों, खिड़कियों, सीढ़ियों, दीवारों, जालियों, टेबल, कुर्सियों, छत पंखों, फ़र्श पर बिछाने की दरियों-चटाइयों, पलंग की निवार, खाने की प्लेटों, चाय के कप, छाते छतरी, हवा खाने का बींजणा, पंखी, झाड़ू का हत्था, पर्स, बटुए, बैग, बड़े थैले जाने कहाँ-कहाँ बल्कि यूं कहें कि हर कहीं प्रकृति पर्यावरण सहित विविध विषयों पर दोहे ही दोहे दृष्टिगोचर होते हैं।
सुंदर अक्षरों में उकेरे गए, छापे गए, एंबोस किए गए, पत्थर पर खुदाई किए गए, धातु पर पेंट किए गए, कपड़े पर कशीदा किए हुए इनके दोहों की छटा देखते ही बनती है। कपड़े की बनी बड़े आकार की आपकी अनेक पुस्तकों पर कशीदाकारी द्वारा लिखे दोहे पढ़कर हर किसी का अभिभूत हो जाना संभव है।
 
पाँच मंजिल का मकान, हर मंजिल पर विविध प्रकार का सामान ही सामान, फ़र्श दीवारों छतों पर, आलमारियों पर, आलमारियों के अंदर की दीवारों और अंदर रखे सामान पर, दराज़ों पर, हर वस्तु पर दोहे दोहे और दोहे!
इनका पाँच मंजिला मकान बाहर जहाँ बेलों लताओं से लकदक और आवृत है, वहीं छत पर पैंतालीस पचास प्रकार की प्राकृतिक रूप से उगाई हुई स्वास्थ्य से भरपूर शुद्ध सब्जियाँ हैं।
 
डागा जी अपने विशिष्ट क्रिया-कलापों के लिए राजस्थान सरकार सहित विभिन्न संगठनों/ संस्थाओं से पुरस्कृत हो चुके हैं लेकिन इन्हें अपने प्रचार से बिलकुल परहेज़ ही है। वर्षों पहले दूरदर्शन के राष्ट्रीय चैनल पर सिद्धार्थ काक एवं रेणुका शहाणे द्वारा प्रस्तुत ज्ञानवर्द्धक एवं मनोरंजक लोकप्रिय कार्यक्रम 'सुरभि' की टीम ने भी इनके घर आकर इन पर कार्यक्रम तैयार किया था!
बीकानेर का होने के नाते मुझे और भी प्रसन्नता एवं गर्व है कि आदरणीय नवल जी डागा हमारे अपने बीकानेर के ही जाये-जन्मे हैं। आज भी इनके अधिकतर रिश्तेदार बीकानेर ही रहते हैं। 1969 में जयपुर बसने से पहले श्री नवल डागा ने डागा चौक स्थित 'बी के स्कूल' में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की थी। डागा जी के मन में 'बी के स्कूल' और वहाँ के अपने गुरुजन के प्रति गहरी श्रद्धा और अगाध निष्ठा है। वे अपने हर क्रिया-कलाप में जो भी श्रेष्ठ है, उसका श्रेय अपने पिता और गुरुजन को देते हैं। लेकिन, यहाँ मैं इनकी धर्मपत्नी श्रीमती शारदा डागा को सच्चा श्रेय एवं साधुवाद देना चाहूंगा। निश्चित रूप से जिनके त्याग, समर्पण, सहयोग, स्नेहिल व्यवहार से ही सबकुछ संभव हुआ होगा। धन्य है यह युगल! प्रणम्य है यह युगल!!
 
जितना देखेंगे, मन में निरंतर विचार आता रहेगा कि डागा जी हर हाल में पुरस्कृत होने की पात्रता रखते हैं। लोग साधारण कृतित्व और निरर्थक ऊटपटांग क्रिया कलापों के बलबूते पर भी 'लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' तथा 'गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में नाम दर्ज़ करवाने के लिए भरपूर प्रयत्न-प्रयास करते हुए पाए जाते हैं और कुछेक इसमें सफल भी हो जाते हैं। लेकिन श्री नवल डागा असाधारण समाजोपयोगी सार्थक कार्य करने के उपरांत भी केवल अपने काम में ही मगन और संतुष्ट रहते हैं। कोई उनसे मिलकर स्वयं समझ सकता है कि उन्हें एक नहीं, अनेक कार्यों के लिए कई-कई बार 'गिनीज़ बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड पुरस्कार सम्मान' से नवाज़ा जा सकता है।
हरि अनंत हरि कथा अनंता...
 
इनके यहाँ पहुंचने से लेकर घर वापसी हेतु बस पकड़ने के लिए विदा लेने तक, हज़ारों कृतियों-कलाकृतियों, घरेलू उपयोग के उपकरणों का अवलोकन करने के बीच भाभीजी द्वारा इतने अनुग्रह एवं स्नेह मनुहार के साथ खिलाए गए काजू बादाम की गोंदपाक और अनेक पौष्टिक शाक और पत्तियाँ डालकर बनाए गए उपमा का स्वाद आजीवन याद रहेगा।...और तत्पश्चात जीवंती की बेल से ताज़ा तोड़े गए पत्तों में सौंफ मुलहटी सहित सुगंधित मिश्रण वाला पान का बीड़ा! अहाहा!
और, हमारे विदा लेते-लेते डागा दंपति द्वारा याद कर-कर के हमें विभिन्न उपहार देते जाना। सुंदर स्नेहिल स्मृतियों से सराबोर कर गई शाम सात अगस्त की!
और, जितना आंखों ने देखा, उससे हज़ारों-हज़ार गुना देखा नहीं जा सका। किसी के लिए भी कभी संभव नहीं होगा श्री नवल डागा के संपूर्ण सृजन और कृतित्व को देखना परखना!
 
बस में बैठने से लेकर घर पहुंचने के तीन-चार दिन बाद भी हृदय डागा दंपति के लिए निरंतर परमात्मा से प्रार्थना कर रहा है-
इनकी ऊर्जा हे प्रभो, कभी न करना क्षीण!

- राजेन्द्र स्वर्णकार
 
रचनाकार परिचय
राजेन्द्र स्वर्णकार

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