प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
महान संत श्रीमंत शंकरदेव और असम की सत्र परम्परा
-वीरेन्द्र परमार
 
असमिया साहित्य, संस्कृति, समाज व आध्यात्मिक जीवन में युगांतरकारी महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव का अवदान अविस्मरणीय है। उन्होंने पूर्वोत्तार क्षेत्र में एक मौन अहिंसक क्रांति का सूत्रपात किया। उनके महान कार्यों ने इस क्षेत्र में सामाजिक-सांस्कृंतिक एकता की भावना को सुदृढ़ किया। उन्होंने रामायण और भगवद्गीता का असमिया भाषा में अनुवाद किया। पूर्वोत्तर क्षेत्र में वैष्णव धर्म के प्रसार के लिए आचार्य शंकरदेव ने बरगीत, नृत्य–नाटिका (अंकिया नाट), भाओना आदि की रचना की। उन्होंने गांवों में नामघर स्थापित कर पूर्वोत्तर क्षेत्र के निवासियों को भाईचारे, सामाजिक सद्भाव और एकता का संदेश दियाI
 
श्रीमंत शंकरदेव का जन्म 1449 में वर्तमान नगाँव जिले के बोरदोवा के निकट अलीपुखुरी में हुआ था। बचपन में ही उनकी माता सत्य संध्या का निधन हो गया। उनके पिता का निधन भी बचपन में हो गया था और उनकी दादी ने उनका पालन-पोषण किया। उन्होंने 13 साल की उम्र में अपनी स्कूली शिक्षा शुरू की और 17 वर्ष की आयु तक अपनी शिक्षा पूरी कर ली। उन्होंने बचपन में ही अपनी बुद्धिमत्ता और प्रतिभा से लोगों को चमत्कृत कर दिया था। उनकी शादी जल्द हो गई थी लेकिन शादी के तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी का निधन हो गयाI इसके बाद वे ज्ञान की तलाश में उत्तर भारत की तीर्थ यात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने 32 वर्ष की उम्र में विरक्त होकर प्रथम तीर्थयात्रा आरंभ की और उत्तर भारत के समस्त तीर्थों के दर्शन किए। तीर्थयात्रा से लौटने के पश्चात् शंकरदेव ने 54 वर्ष की उम्र में कालिंदी से विवाह किया। तिरहुतिया ब्राह्मण जगदीश मिश्र ने बरदौवा जाकर शंकरदेव को भागवत सुनाई तथा उन्हें भागवत ग्रंथ भेंट किया। शंकरदेव ने जगदीश मिश्र के स्वागतार्थ 'महानाट' के अभिनय का आयोजन किया। कर्मकांडी विप्रों ने शंकरदेव के भक्ति प्रचार का घोर विरोध किया। दिहिंगिया राजा से ब्राह्मणों ने प्रार्थना की कि शंकर को दण्डित किया जाए क्योंकि वह वेदविरुद्ध मत का प्रचार कर रहा है। कुछ प्रश्न पूछकर उनके उत्तर से संतुष्ट होने के उपरांत राजा ने इन्हें निर्दोष घोषित कर दिया। इन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की। 97 वर्ष की अवस्था में इन्होंने दूसरी बार तीर्थयात्रा आरंभ की। इन्होंने कबीर के मठ के दर्शन किए तथा उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस यात्रा के पश्चात् वे बरपेटा वापस चले आए। कोच राजा नरनारायण ने शंकरदेव को आमंत्रित कियाI 
 
शंकरदेव के वैष्णव संप्रदाय का मत एकशरण है। इस धर्म में मूर्तिपूजा की प्रधानता नहीं है। धार्मिक उत्सवों के समय केवल एक पवित्र ग्रंथ चौकी पर रख दिया जाता है, इसे ही नैवेद्य तथा भक्ति निवेदित की जाती है। इस संप्रदाय में दीक्षा की व्यवस्था नहीं है। अपनी तीर्थ यात्रा में वे उत्तर भारत के प्रसिद्ध संत कबीर के साथ-साथ कई ऋषियों और महापुरुषों से मिले। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद श्रीमंत शंकरदेव माजुली द्वीप में बस गए और वैष्णव धर्म का प्रचार करना शुरू कर दिया। वे कर्मकांड, अर्थहीन संस्कारों और अनुष्ठानों के खिलाफ थे तथा लोगों को धर्म के सरल मार्ग का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करते थेI उनका मानना था कि सभी मनुष्यों में एक ही सर्वोच्च आत्मा विद्यमान है। उन्होंने सभी प्रकार के वर्गभेद और मानव निर्मित सामाजिक बाधाओं का पुरजोर विरोध किया। उन्होंने संगीत और भजन गायन के महत्व को प्रमुखता से रेखांकित कियाI अलीपुखुरी असम के लोगों के लिए एक पुण्यभूमि हैI बोरदोवा सत्र का असम में विशेष महत्व हैI यहाँ एक कीर्तन घर है, जिसके निकट पत्थर का एक टुकड़ा रखा हैI इस पत्थर को पादशिला के नाम से जानते हैंI ऐसा विश्वास है कि इस पर श्रीमंत शंकरदेव के पद चिह्न अंकित हैंI यहाँ पर होली का त्योहार और वैष्णव संतों की जयंती व पुण्यतिथि धूमधाम से आयोजित की जाती हैI श्रीमंत शंकरदेव बहुमुखी प्रतिभा के धनी थेI वे असम के महान समाज सुधारक, नाटककार, अभिनेता, संगीत मर्मज्ञ और लेखक थे। शंकरदेव गृहस्थ परंपरा के संत थे। उन्होंने विवाह किया और गृहस्थ आश्रम में रहते हुए संत के रूप में अपना जीवन व्यतीत किया। अपने शिष्यों के लिए भी उन्होंने ऐसा ही संदेश दिया। इसलिए शंकरदेव के अनुयायी विवाह करते हैं, संतान उत्पन्न करते हैं और संत जैसा जीवन व्यतीत करते हैं। उनके अनुयायी रासलीला, नृत्य संगीत और नाटक भी करते हैं। माजुली द्वीप से शंकरदेव का अन्योन्याश्रय संबंध है। सन् 1568 ई. में उनका देहान्त हो गया।
 
शंकरदेव की प्रमुख रचनाएँ हैं- हरिश्चंद्र उपाख्यान, भक्तिप्रदीप, रुक्मिणीहरण, कीर्तनघोषा, अजामिलोपाख्यान, अमृतमंथन, आदिदशम, कुरुक्षेत्र, गुणमाला, भक्तिरत्नाक, विप्रपत्नीप्रसाद, कालिदमनयात्रा, केलिगोपाल, रुक्मिणीहरण नाटक, पारिजात हरण, रामविजय आदि। शंकरदेव के वैष्णव संप्रदाय का मत एकशरण है। इस धर्म में मूर्तिपूजा को महत्व नहीं दिया गया है। इसे केवलीया या महापुरुषीया धर्म भी कहते हैं। उन्होंने मूर्तिपूजा के बदले भगवान के नाम को अधिक महत्व दिया है। इसलिए नामघरों में मूर्तिपूजा नहीं होती। श्रीमंत शंकरदेव ने असम के लोगों को अशिक्षा और अंधविश्वास से दूर रहने की शिक्षा दी और ज्ञान का सच्चा स्वरूप दिखाया। आज भी असम के नामघरों में मणिकूट (गुरू आसन) पर शंकरदेव रचित कीर्तन घोषा श्रीमद्‌भागवत की प्रति रखी जाती है और उसकी पूजा की जाती है। यह पद्धति सिख मत के समान है, जहाँ गुरुग्रंथ साहिब को श्रेष्ठ माना जाता है। शंकरदेव ने भाओना अर्थात पौराणिक नाटकों के अभिनय और नृत्य-संगीत के द्वारा धर्म प्रचार किया। इसलिए उनके अनुयायी उनके पथ पर चलते हुए भाव नृत्य और धार्मिक नाटक करते हैं।
 
असम में स्थापित सत्र को सामान्य भाषा में वैष्णव मठ कहा जा सकता हैI पूर्वोत्तर भारत में वैष्णव धर्म के प्रसार और हिंदू धर्म व संस्कृति के संरक्षण में इन सत्रों का उल्लेखनीय अवदान हैI इन सत्रों के माध्यम से श्रीमंत शंकरदेव ने सामाजिक सद्भाव, एकता और भाईचारे की भावना को सुदृढ़ कियाI भागवतपुराण में 'सत्र' शब्द का अनेक बार उल्लेख किया गया हैI भागवतपुराण में 'सत्र' शब्द का प्रयोग भक्तों की सभा के अर्थ में किया गया है, लेकिन असम के नव वैष्णव धर्मं में इस शब्द का भिन्न अर्थ में प्रयोग किया जाता है। महापुरुष शंकरदेव धर्म प्रचार के लिए असम के विभिन्न अंचलों में गए। इस दौरान वे जहाँ-जहाँ रहे उन स्थानों को बाद में सत्र के रूप में पहचान मिली। शंकरदेव के जीवनकाल में भक्त पेड़ के नीचे या खुले में इकट्ठे होते थे। शंकरदेव के जीवनकाल में भक्तों के स्थायी परिसर में रहने का चलन शुरू नहीं हुआ था, हालांकि कई स्थानों पर अस्थायी प्रार्थना घर जरूर बनाये गए थे। शंकरदेव ने सर्वप्रथम बरदोवा नामक स्थान पर सत्र की स्थापना की। इस सत्र में एक प्रार्थना घर अथवा नामघर बनाया गया, जहाँ नाम स्मरण (कीर्तन) किया जाता थाI भगवान के नाम स्मरण के साथ ही वहाँ पर धार्मिक व्याख्यान होता था। बाद में शंकरदेव के शिष्य माधवदेव ने बरपेटा सत्र की स्थापना की और दैनिक प्रार्थना सेवा और धार्मिक चर्चा की परंपरा आरंभ की। सामान्यतः सत्र चारदिवारी से घिरे चार प्रवेश द्वार वाला क्षेत्र है। इस चारदिवारी के बीच में आयताकार प्रार्थना कक्ष (नामघर या कीर्तनघर) होता है। इसके पूर्वी भाग में एक अतिरिक्त स्वतंत्र कक्ष होता है, जिसे मणिकूट (गहना-घर) कहा जाता है। इसके पवित्र गर्भगृह में एक लकड़ी का चतुष्कोणीय आसन होता है, जिसमें चार शेरों की नक्काशीदार आकृतियाँ बनी होती हैंI इस आसन पर पांडुलिपि में लिखी भागवत पुराण की प्रतिलिपि या एक मूर्ति रखी जाती है। आरंभ में सत्र लकड़ी या बाँस के बने होते थे लेकिन बाद में ईंट और सीमेंट का प्रयोग होने लगाI नामघर के चारों तरफ झोपड़ियाँ होती हैं, जिन्हें 'हाटी' कहा जाता है। यहाँ भकत (भक्त) रहते हैंI
 
सत्र के पूर्वी ओर की हाटी में 'अधिकार' और अन्य उच्च अधिकारी रहते हैंI सत्र गाँवों में स्थापित नामघर के माध्यम से वैष्णव धर्म का विस्तार करते हैं। सत्र केवल धार्मिक संस्था नहीं है अपितु पूर्वोत्तर में सांस्कृतिक और सामाजिक उन्नयन एवं जनजागरूकता उत्पन्न करने में भी सत्रों ने महती भूमिका का निर्वाह किया है। सत्रों में नृत्य की एक विधा विकसित हुई है, जिसे सत्रीय नृत्य कहा जाता हैI असम सत्र महासभा सभी सत्रों का पितृ संगठन हैI वर्तमान में राज्य सरकार उनके माध्यम से उनकी गतिविधियों का समन्वय करती है। सत्र के कामकाज की देखभाल और निगरानी के लिए एक सत्राधिकार और उनके अनेक सहयोगी होते हैंI इन पदों पर बैठे व्यक्ति की एक निश्चित जिम्मेदारी होती हैI सत्रों के संचालन के लिए अनेक अधिकारी होते हैं, जिन्हें विभिन नामों से संबोधित किया जाता है:-
 
(I) अधिकार- अधिकार सत्र के धार्मिक और अध्यात्मिक गुरु और प्रमुख होते हैंI उनके नेतृत्व में ही पूजा-अर्चना और समस्त अनुष्ठान संपन्न होते हैंI उनको 'सत्रीय' अथवा 'महंत' नाम से भी जाना जाता हैI
(II) डेका अधिकार- डेका अधिकार सत्र के धार्मिक और अध्यात्मिक गुरु के सहयोगी और सह-प्रमुख होते हैंI 'अधिकार' के बाद सत्र में उनका स्थान दूसरा होता हैI अधिकार के निधन होने अथवा उनकी अनुपस्थिति में डेका अधिकार ही सत्र का संचालन करते हैंI
(III) भकत- यूँ तो सत्र में शिक्षा ग्रहण करने वाले किसी भी शिष्य को भकत अर्थात भक्त कहा जा सकता है परन्तु सही अर्थों में भकत वही होता है, जो सत्र की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करता है अथवा सत्र में रहकर उसके परिचालन में मदद करता हैI सत्र के अन्दर केवल अविवाहित भकत ही रह सकते हैंI
(IV) शिष्य- सत्र के अन्य भक्तों को शिष्य कहा जाता हैI असम अथवा देश के अन्य राज्यों के अनेक वैष्णव परिवार सत्र के प्रति अनुराग रखते हैं और आर्थिक मदद करते हैंI उन्हें भी शिष्य माना जाता है, भले ही उन्होंने कोई सत्र शिक्षा ग्रहण नहीं की होI बड़े सत्र में सैकड़ों ब्रह्मचारी और गैर ब्रह्मचारी भक्त निवास करते हैंI

- वीरेन्द्र परमार
 
रचनाकार परिचय
वीरेन्द्र परमार

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