प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
मेयार सनेही और उनकी शायरी
- डॉ. लवलेश दत्त
 
विगत दिनों डॉ. जीवन सिंह और डॉ. विनय मिश्र द्वारा संपादित ‘बनारस की हिन्दी ग़ज़ल’ नामक एक महत्त्वपूर्ण ग़ज़ल संग्रह पढ़ने का सौभाग्य मिला। इसी ग़ज़ल संग्रह में मेयार साहब की ग़ज़लों से मेरा परिचय हुआ। उनकी प्रत्येक ग़ज़ल का एक-एक शेर उनके कृतित्व में चार चाँद लगाने में समर्थ है। मेयार साहब की ग़ज़लों में आम आदमी की पीड़ा तो है ही लेकिन उसके साथ अपने समय और समाज का दर्शन भी बख़ूबी होता है।
 
उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के 'राष्ट्रीय सौहार्द सम्मान' के लिए जनाब 'मेयार सनेही' उर्फ़ शब्बीर हुसैन के नाम की घोषणा का समाचार सुनकर ऐसा लगा कि एक सच्चे, सरल और सही मायनों में शायरी को जीने वाले सादगीपसन्द शायर की कलम रंग लाई। व्यक्तित्व और कृतित्व में सादगी का परिचय देती मेयार साहब की ग़ज़लें इस बात का प्रमाण हैं कि बनारस की भूमि निश्चित रूप से प्रतिभाशाली लेखकों, कवियों, कलाकारों और उद्भट विद्वानों की जन्मदात्री है। 7 मार्च 1936 को बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में जन्मे मेयार साहब का पहला ग़ज़ल संग्रह 'ख़याल के फूल' अयन प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित हुआ था। हालाँकि उनकी ग़ज़लें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर प्रकाशित होती रही हैं। उनकी ग़ज़लों में अद्भुत रदीफ़ और क़ाफ़ियों का प्रयोग पाठक और श्रोताओं को चमत्कृत कर देता है। उनकी भाषा में यदि बनारसी मिठास है तो कबीर जैसी स्पष्टवादिता भी है।
 
सनेही जी की ग़ज़लें जहाँ एक ओर अपने कथ्य और शिल्प के लिए जानी जाती हैं, वहीं उनकी ग़ज़लों की सरल भाषा और बोधगम्यता उनकी ग़ज़लों को रोचक बनाती हैं। अपनी ग़ज़ल की भाषा के लिए उन्होंने ख़ुद लिखा है-
 
ग़ज़ल मेयार कहिए खूब लेकिन
ज़बां आसान से आसान रखिए
 
सनेही जी की दृष्टि इस बात पर पड़ी है कि आज के दौर में थोड़ी-सी सफलता प्राप्त करते ही लोग ऐसे अकड़ने लगते हैं, जैसे विश्व विजेता हों-
 
सूरज को भी चराग़ दिखाने लगा है अब
बढ़ता ही जा रहा है मनोबल पलाश का
 
सनेही जी ने शोषण, अत्याचार और अव्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने को अनिवार्य बताया है, वे कहते हैं-
 
अफवाह उड़ाई जाएगी जज़्बात उभारे जाएँगे
हम लोग अगर ख़ामोश रहे हम लोग भी मारे जाएँगे
 
समय इतना विषमता भरा है कि आज छोटी-छोटी बच्चियों के साथ उनके अपनों के द्वारा ही कुकृत्य किए जा रहे हैं। आज रक्षक ही भक्षक बना बैठा है-
 
गुलशन में बहारों की डोली महफ़ूज़ न रहने पाएगी
जब तक न यहाँ रखवालों के किरदार सँवारे जाएँगे
 
आज हर ओर जातिगत भेदभाव दिखाई दे रहा है। लोग एक-दूसरे से लड़ रहे हैं किन्तु सच्चाई यह है कि जातिगत भेदभाव की इस लड़ाई में किसी की जीत या हार नहीं होने वाली, केवल विनाश ही होगा-
 
जीतोगे न तुम हारेंगे न हम, इस जंग में बस इतना होगा
कुछ लोग तुम्हारे जाएँगे, कुछ लोग हमारे जाएँगे
 
यह सर्वमान्य है कि देश में हर विभाग में भ्रष्टाचार अपनी जड़ें जमाए हुए है। इसी पर तंज कसते हुए वे कहते हैं-
 
साव जी पानी के बदले तेल जब पीने लगे
बस समझ लेना बही खातों में सरसों पक गई
 
सच्चा साहित्यकार किसी के दबाव में नहीं आता। सनेही जी की स्पष्टवादिता उनको विशिष्टता प्रदान करती है। उनका मानना है कि ग़ज़ल कहने वाले सच्चे और स्पष्टवादी होते हैं-
 
न छिपते हैं न छिपकर बोलते हैं
हम आईना हैं मुँह पर बोलते हैं
ग़ज़ल के पाँव धोकर पीने वाले
ज़माने भर से बेहतर बोलते हैं
 
मनुष्य अपने गुनाह चाहे कितने भी छुपा ले लेकिन यह सच है कि वह एक न एक दिन बेनकाब हो ही जाता है-
 
गुनाहों को छुपाओगे कहाँ तक
ये अक्सर सर पे चढ़कर बोलते हैं
 
कुछ लोगों पर आधुनिकता इतनी हावी है कि उन्हें सही-ग़लत का भी अन्दाज़ा नहीं है, इस बात को सनेही जी कहते हैं-
 
तुम्हें कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे
जो नंगेपन को ज़ेवर बोलते हैं
 
ऐसी साफ़गोई और निश्छलता मेयार सनेही की ग़ज़लों का आभूषण है। इससे उनके निश्छल व्यक्तित्व का दर्शन भी होता है। वे तो आम जनता से भी साफ-साफ कहते हैं कि उन्हें अपना नेता चुनना चाहिए, जिनमें छल-कपट न हो-
 
जिता सकें तो उन्हें जिताएँ
न हों जो पुतले कपट के, छल के
 
मनुष्य की इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है। सही मायनों में वह अपनी इच्छाओं के जंगल में अकेला घूमता रहता है। सनेही जी लिखते हैं-
 
तमन्नाओं का वन है और मैं हूँ
भटकता-सा ये मन है और मैं हूँ
 
विचित्र बात यह है कि सब अपने-अपने उसूलों को महानता का जामा पहनाकर राजनीति के दाँव खेलते हैं और सत्ता मिलने के बाद उन्हीं उसूलों की हत्या अपने ही हाथों कर देते हैं-
 
उसूलों में सियासत हो रही है
उसूलों का मरन है और मैं हूँ
 
अव्यवस्था और भ्रष्टाचार इस तरह अपना जाल फैलाये हैं कि ज़रूरतमंदों तक मदद पहुँचती ही नहीं है, सनेही कहते हैं-
 
उधर रुख़ ही नहीं करते हैं बादल
जिधर फैली अगन है और मैं हूँ
 
यह अव्यवस्था ऐसी है कि कहीं तो फाकाकशी है तो कहीं हर रोज़ त्योहार मनाया जा रहा है-
 
इस तरफ भूखे हैं बच्चे, उस तरफ त्योहार है
ये भी इक संसार है और वो भी इक संसार है
 
सनेही जी किसी भी प्रकार के भेद-भाव, अलगाव, वैषम्य में विश्वास नहीं करते। वह प्रेम, समानता और समता की बात करते हैं-
 
समता को अपनाना होगा
वर्ना फिर हंगामा होगा
मज़हब की दीवार गिरा दी
इश्क़ यहाँ तक लाया होगा
 
प्रेम की महत्ता स्वीकारते हुए वे कहते हैं-
 
भीलनी के बेर जूठे थे ये कैसे देखते
राम तो हैरत में थे जंगल में इतना प्यार है
 
समाज में भले ही विभिन्न मतावलंबी रहते हों, लेकिन सबका लक्ष्य एक ही परमात्मा है, कबीर जैसी भावभूमि पर सनेही जी जीवन के सत्य को उजागर करते हुए कहते हैं-
 
पहुँचना है उसी मंज़िल पे सबको
कोई जाए इधर से या उधर से
 
ग़ज़ल के महत्त्व और उसके प्रभाव की सानी आज कोई अन्य काव्य विधा नहीं है। ग़ज़ल महफिलों की शान है, हर स्थान पर उसे सम्मान मिलता है-
 
अदब की बज़्म हो या कोई महफ़िल
ग़ज़ल पहुँची जहाँ भी, फूल बरसे
 
उनका यह भी मानना है शायरी का प्रभाव बहुत होता है। यह सीधे दिल तक पहुँचती है-
 
शायरी से आग लग सकती है मेरे दोस्तो
क्या समझते हो ये लफ़्ज़ी खेल खरपतवार है
 
अपनी एक ग़ज़ल में दुनियावी सीख देते हुए सनेही जी कहते हैं-
 
मुहब्बत सबसे भाईजान रखिए
खरे-खोटे की भी पहचान रखिए
उसे महसूस भी होने न पाए
किसी पर जब कोई एह्सान रखिए
अदावत का सबब कुछ भी हो लेकिन
जो उसकी हद है उसका ध्यान रखिए
 
सनेही जी को 'सौहार्द सम्मान' की घोषणा एक सच्ची प्रतिभा के सम्मान का परिचायक है। जनाब मेयार सनेही जी की ग़ज़लों की तासीर और उनके व्यक्तित्व के विषय में डॉ. विनय मिश्र का यह कथन सर्वथा उपयुक्त है कि कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनसे सम्मान स्वयं सम्मानित होता है। उन जैसे व्यक्तित्व के लिए तो सौहार्द सम्मान शतप्रतिशत उपयुक्त है क्योंकि वे ग़ज़ल की उस परम्परा से जुड़े हैं, जिसे डॉ. जीवन सिंह ने हिन्दु-मुस्लिम एकता को मजबूत करने वाली परम्परा बताया है। वे न हिन्दी के हैं, न उर्दू के वे तो उस ज़बान के शायर हैं जिसे हिन्दुस्तानी कहा जाता है और जिसे समझने-समझाने के लिए मोटे-मोटे शब्दकोश नहीं खँगालने पड़ते। सनेही जी की ग़ज़लों में यदि कबीर-सी साफगोई और व्यंग्योक्ति है तो अर्थ की गंभीरता उन्हें एक दार्शनिक की संज्ञा भी देती है। उनका ग़ज़ल के प्रति समर्पण और निष्ठा का ही यह सुन्दर परिणाम है कि उन्हें इस प्रतिष्ठित सम्मान के लिए चुना गया। 'सौहार्द सम्मान' के लिए मेयार सनेही जी को हृदयतल से बधाई एवं उनके दीर्घायु होने की कामना के साथ उनके लेखनी के निरन्तर गतिमान रहने की शुभकामनाएँ।

- डॉ. लवलेश दत्त
 
रचनाकार परिचय
डॉ. लवलेश दत्त

पत्रिका में आपका योगदान . . .
गीत-गंगा (1)कथा-कुसुम (6)आलेख/विमर्श (2)