प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
मैं तुम्हारी महफ़िलों में बस हवा बनकर रहा
रात-भर का साथ था बस, मैं दिया बनकर रहा
 
जिसको केवल दर्द में तुमने पुकारा है सनम
मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में वो ख़ुदा बनकर रहा
 
सबने मुझ पर दाँव खेले अपनी चाहत के लिए
सच कहूँ तो ज़िन्दगी-भर मैं जुआ बनकर रहा
 
कुछ छुपाकर रख न पाया पास अपने मैं कभी
चेहरा मेरा मेरे दिल का आईना बनकर रहा
 
हर कोई मुझसे गुज़रकर चल दिया है छोड़कर
उम्र-भर मैं हर किसी का रास्ता बनकर रहा
 
******************************
 
 
ग़ज़ल-
 
जो जुदा मुझसे न हो ऐसी निशानी दे गया
प्यार मुझको दर्द की कैसी कहानी दे गया
 
कर रहा हूँ आज भी मैं तो उसी की बन्दगी
आग दिल में और आँखों में जो पानी दे गया
 
एक मुट्ठी अन्न की ख़ातिर है अब वो जी रहा
नौजवां बेटों को जो अपनी जवानी दे गया
 
नाम से बस ज़िन्दा है, होकर सुपुर्दे-ख़ाक वो
जो यहाँ औरों की ख़ातिर ज़िन्दगानी दे गया
 
चाह थी, कुछ रोटियाँ दे जाएगा हिस्से में वो
भाषणों में ख़्वाब जो बस आसमानी दे गया
 
लौट आईं गाँव की वो सर्दियाँ फिर याद में
ओढ़ने को जब वो इक चद्दर पुरानी दे गया
 
शायरी की कश्तियों का बन गया पतवार वो
दर्द की लहरों से ग़ज़लों को रवानी दे गया
 
******************************
 
 
ग़ज़ल-
 
कभी सीने जो लगते थे गुले-गुलज़ार बन-बन के
मेरे सीने में जलते हैं वही अंगार बन-बन के
 
मेरी गर्दन को ख़ंजर से झुका पाए न जो कल तक
वही जद्दो-जहद में हैं गले का हार बन-बन के
 
सजाये थे कभी उल्फ़त में जितने ख्वाब सेजों पर
बिछे हैं आज बिस्तर पर वही सब ख़ार बन-बन के
 
भले ही नाम मेरा अब न आये तेरे होठों पर
मगर ज़िन्दा रहूँगा दिल में तेरे प्यार बन-बन के
 
वो जब-जब आईने में अक्स को अपने निहारेगा
उसे मिलता रहूँगा आँसुओं की धार बन-बन के
 
अगर मेरी शराफ़त ही मुझे मत रोक देती तो
बहुत कुछ काम आ जाता मेरा हथियार बन-बन के
 
दिये हैं ज़ख्म जो तूने वो मेरे दिल में बसते हैं
वही रहते हैं ग़ज़लों में मेरी अशआर बन-बन के
 
******************************
 
 
ग़ज़ल-
 
बता तो ये ज़मीं कैसे तुझे आज़ाद लगती है
जहाँ हक़ माँगना मज़लूम की फ़रियाद लगती है
 
वो जिनको है चुना हमने हमारी सरपरस्ती को
हमें उनकी ही नीयत अब बहुत नाशाद लगती है
 
है जिसकी आँखों पर पट्टी, है जो इन्साफ़ की देवी
वही देवी मुझे धृतराष्ट्र की औलाद लगती है
 
परिंदा खौफ़ के मारे कभी कुछ कह नहीं पाता
ये जनता जुल्म सहने में बड़ी उस्ताद लगती है
 
सिखाओ तुम मुहब्बत ही, सिखाओ मत कोई मज़हब
मुहब्बत के बिना हर शय ही बेबुनियाद लगती है
 
****************************
 
 
ग़ज़ल-
 
आदमी का जब सफ़र तनहा हुआ है
रास्ता उसके लिए लम्बा हुआ है
 
खेलता है वो मेरे जज़्बात से अब
दिल मेरा उसके लिए 'कोठा' हुआ है
 
यह ज़रूरी तो नहीं मैला ही होगा
कीच के जो गर्भ से पैदा हुआ है
 
अब कहाँ सरकार आएगी दुबारा
क्रोध जन का फूटकर लावा हुआ है
 
वो वसूलेगा फिरौती मौत से भी
याद में औरों की जो ज़िन्दा हुआ है

- राहुल शिवाय
 
रचनाकार परिचय
राहुल शिवाय

पत्रिका में आपका योगदान . . .
ग़ज़ल-गाँव (1)गीत-गंगा (1)