प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2015
अंक -33

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

चर्चित कवयित्री एवं कथाकार सुमन केशरी से संपादक प्रीति अज्ञात की ख़ास मुलाक़ात
 
 
 
एक सरल, सहज और शालीन व्यक्तित्व की धनी सुमन केशरी जी ने हिंदी साहित्य को ’याज्ञवल्क्य से बहस’ व ’मोनालिसा की आंखे’ (राजकमल प्रकाशन) जैसे चर्चित और महत्त्वपूर्ण काव्य संग्रह दिए हैं। इनका तीसरा संकलन 'शब्दऔर सपने’, ई-बुक के तौर पर नोटनल से इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। इन दिनों आप, आर्मेनिया पर लिख रही हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से उच्च-शिक्षा प्राप्त सुमन केशरी जी न सिर्फ भारत सरकार में एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी रही हैं बल्कि इन्हें एक जुझारू सामाजिक कार्यकर्त्ता के रूप में भी जाना जाता है। समाज में व्याप्त अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध ये हमेशा ही पूरी निर्भयता से अपनी आवाज़ उठाती रही हैं। इनके भावुक-संवेदनशील और सच्चे ह्रदय से निकली ईमानदार अभिव्यक्ति इनकी रचनाओं में भी बख़ूबी दिखाई देती है। लेखन के अलावा यात्राएँ करना, नई जगहों को देखना, नए लोगों से मिलना, घूमना-फिरना भी इन्हें बहुत भाता है।
आइये पढ़ते हैं, एक असाधारण प्रतिभा और बहुआयामी व्यक्तित्व की स्वामिनी सुमन केशरी जी से प्रीति 'अज्ञात' की विस्तृत बातचीत - 
 
प्रीति 'अज्ञात' - क्या यह सच है कि बचपन में आप स्वयं की कल्पना एक तपस्वी-साधूके रूप में किया करती थीं ? आजकल जो हमारे समाज में हो रहा है, उसे देखकर अब तो आपको भी अपनी उस सोच पर हँसी आती होगी !
सुमन केशरी –नहीं प्रीति, बहुत रोना आता है। दरअसल कभी इस समाज में साधू-तपस्वियों की बहुत इज्जत थी। साधू माने ज्ञानी और परोपकारी। पर आज सबकुछ व्यवसाय हो गया है ! आज 2015 में जब मैं अपने बचपन को पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है जीवन कहाँ से कहाँ पहुँच गया। हाँ, बहुत बचपन में मैंने अपनी कल्पना एक तपस्वी- साधू के रूप में की थी। यह याद करना अजीब ही लगता है कि उस आयु में मैं खुद को लड़के की तरह देखती थी, शायद मन के किसी कोने में तब भी यह भाव रहा होगा कि तपस्वी की-सी निर्व्यैतिकता- उदासीनता (विराग) के लिए पुरुष होना जरूरी है। स्त्री होकर आप ममत्व से, अतः जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं रह सकते। घर संसार आपको बांधता ही है। यह तब जब कि हमारे घर में लड़कियों के प्रति बहुत प्रेम और इज्जत थी। उन्हें पढ़ने-लिखने की सारी सुविधाएँ हासिल थीं। पर शायद संस्कार के, परंपरा के दबाव ऐसे ही होते हैं, वे मन में कुंडली मारे रहते हैं और हमारे क्रियाकलापों को प्रेरित-निर्देशित करते हैं। साधू बनना, तपस्या करना पुरुषों का क्षेत्र है, मन ने ऐसा मान लिया होगा, उस तीन-चार वर्ष की आयु में ही।
 
प्रीति 'अज्ञात' - कैसा दुर्भाग्य है ये, कि उस समय जो कुरीतियाँ हमारे समाज में व्याप्त थीं ; उनका स्वरुप भले ही थोड़ा-सा बदला हुआ या कम प्रतीत होता है पर स्थिति आज पहले से कहीं ज्यादा भयावह है ! खोखले आत्म-सम्मान के नाम पर परिवार के ही सदस्यों की हत्या या उनका मानसिक शोषण एक प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है ! विकास के नाम पर आज इंसान एक-दूसरे से या तो कट रहा है या उसे काट रहा है !
सुमन केशरी - हाँ, यह देखना बहुत दुःखद है ! इन दिनों जितना जातिवाद देखने को मिल रहा है, उतना हमारे बचपन में कम से कम दिल्ली जैसे शहरों में देखने को न मिलता था। हमारे घर के नीचे ही एक दलित परिवार रहता था, हमें उनसे मेल बढ़ाने, उनके घर खाने-पीने में कोई रोक-टोक नहीं थी। मुहल्ले (सरकारी कॉलोनियों में स्क्वायर) के सभी बच्चे साथ खेलते-कूदते, खाते-पीते थे। कभी किसी के माता-पिता को मना करते, रोकते-टोकते मैंने नहीं सुना। मुझे पहली बार जाति का पता चला लगभग 1968-69 में, जब हमारे स्कूल, केन्द्रीय विद्यालय में इस बारे में जानकारी मांगी गई। तब मुझे याद है कि पापा ने हम बहनों को सामने बिठाकर भारत की जाति-प्रथा के बारे में विस्तार से बताया था, और अपनी जाति के बारे में भी उन्होंने हमें जानकारी दी थी। पर शुरु से ही हमारे घर में भेदभाव का माहौल नहीं था। उल्टे कई कामगर हमारे बहुत नजदीक थे और हमसे निःसंकोच मदद मांग लेते थे। यही नहीं जब 1974 में  हमारे पापा का एक्सीडेंट हुआ तो उन्होंने गर्म तेल आदि से हमारी खूब मदद की। उन सभी के साथ एक गजब रिश्ता मैंने देखा और महसूसा है।
 
इसके अलावा, अपने परिवार, खासकर- मम्मी-पापा के बारे में एक अन्य बात मैं जोर देकर बताना चाहूँगी। हम पाँच बहने हैं, हमारा कोई भाई नहीं है। कोई कह सकता है कि हम पाँच इसलिए हैं, कि मम्मी-पापा के मन में पुत्र-लालसा रही होगी। हाँ रही होगी। पर हमने कभी कोसने नहीं सुने या उनके मुँह से यह नहीं सुना कि पाँच पाँच लड़कियाँ हैं, या कि लड़की हो तो ऐसा करो ऐसा मत करो, या दूसरे के घर जाओगी तो ऐसा होगा, ऐसा नहीं...आदि, जैसी  कि भाषा आमतौर से सुनने-जानने को मिलती है। यदि कभी कोई बाहर वाला कह दे कि पाँच लड़कियाँ हैं...तो मुझे याद है कि मैंने माँ को यह कहते सुना है  कि मेरे तो पाँच रतन हैं। ये लड़का-लड़की क्या होता है। हमारे पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने, घूमने-फिरने, लड़कों के साथ उठने-बैठने, किसी में न तो कोई कोताही बरती गई और न ही किसी तरह की मनाही हुई। हम दो बहनें- राधिका शर्मा और मैं  जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से पी एचडी हैं। हम सभी ने उच्च शिक्षा ली और अच्छे पदों पर नौकरी भी की।
यही नहीं मेरे पिता ने हममें से किसी की जन्मपत्री नहीं बनवाई। बड़ी बहन का नाक गाँव में दादी ने छिदवा दिया तो वे बहुत नाराज हुए। हम बाकी बहनों के सिर्फ कान ही छिदवाए गए। वे कहते थे कि नाक में नकेल डाल कर मुझे अपनी लड़कियों को राह नहीं दिखाना। पढ़-लिख गईं तो खुद ही राह तलाश लेंगी। अंधेरे से, बाहर जाने से, कुत्ते-बिल्ली से,सांप-बिच्छू से,  भूत-प्रेत से  किसी से भी डरना हमें नहीं सिखाया गया। हम कितनी भी रात को अकेले बाहर जाने से नहीं डरती थीं। तो इस तरह से हमारे घर में न जात-पाँत का भेदभाव था न कर्मकांड का। दीया-बत्ती होती थी, आज भी होती है। सालों-साल मेरे पूजाघर की सफाई, मुस्लिम और दलित स्त्रियों ने निःसंकोच की है, खाना बनाया है। मुझे अपने घर की इस रवायत पर फ़ख्र है।
 
इसके अलावा पापा ने कभी ‘लड़कियाँ हैं’ कह कर दहेज के नाम पर धन जोड़ने की कोशिश नहीं की। वे समझबूझ कर दहेज-प्रथा के खिलाफ थे और  उनमें यह साफगोई थी कि वे सीधे-सीधे इसे कह सकें,भले ही उनकी बेटियों की शादी हो, न हो। हम चार बहनों ने बिना दहेज प्रेम विवाह किया है। पाँचवी का विवाह भी दहेज और लेनेदेन के बिना ही हुआ है।  मेरे एक जीजा पंजाबी हैं और एक बहनोई बंगाली है। पूरा अखिल भारतीय परिवार है हमारा। पुरुषोत्तम से मेरा विवाह प्रेम का ही नतीजा है।
पुरुषोत्तम भी कथनी-करनी में फर्क नहीं रखते। घर में सही अर्थों में लोकतान्त्रिक माहौल है। हमारे दो बच्चे हैं- ऋत्विक और ऋतंभरा। दोनों ने अपनी इच्छा से पढ़ाई के विषय चुने हैं। ऋत्विक दर्शन शास्त्र पढ़ रहे हैं और ऋतंभरा ने मास मीडिया की पढ़ाई की है। वे फिल्में आदि लिखना- निर्देशन करना चाहती हैं। वे फोटोग्राफी का शौक रखती हैं। हम चाहते हैं कि अपनी जिंदगी का फैसला वे स्वयं करें। हमने उन्हें मूल स्कूली शिक्षा दिलवा दी है। बाकी का काम उनका। नौकरी से लेकर जीवनसाथी ढूंढने तक। 
 
प्रीति 'अज्ञात' - आपकी इन बातों ने मेरे बचपन की स्मृतियाँ भी ताजा कर दीं ! सच तो यह है कि अधिकांशत: घरों में समाज की आड़ में अपनी मानसिकता थोपी जाती है कि ये न करो, वो न करो, लोग क्या कहेंगे ! जबकि कोई कुछ नहीं कहता, इतना समय किसके पास है ? संवेदनशील और भावुक इंसान, ही अक़्सर दुखी दिखाई देते हैं ! आप अपने बचपन के बारे में कुछ और बतलाएँ।
सुमन केशरी - बिल्कुल ! ठीक कह रही हैं आप। मुझे लगता है ‘दूसरे क्या कहेंगे’, इस आड़ में हम अपने मन की बात ही मनवाना चाहते हैं! हममे यह कहने की हिम्मत नहीं होती कि ‘मुझे यह ठीक नहीं लग रहा’। यह एक तरह से आत्मविश्वासहीनता का भी द्योतक है कि आप अपने मन का  काम दूसरों की आड़ में करवाना चाहें। दरअसल आमतौर से मनुष्य सोचना भी नहीं चाहता, वह बस लकीर पीटते रहना चाहता है।
 
एक दूसरी बात भी कहना चाहती हूँ। मुझे लगता है कि अब सामाजिक-राजनैतिक संवेदनशीलता और बंधुत्व की भावना पहले की अपेक्षा  कम है ! बचपन की एक बात बताती हूँ, उन दिनों चीन से युद्ध चल रहा था और परिवारों को वहाँ से निकल जाने का आदेश था, मेरी माँ ने कहा कि वे नहीं जाएँगी। हम लोग काफी अरसे वहीं थे। उन्हीं दिनों मैंने जवाहरलाल नेहरू, महात्मा गांधी का नाम सुना। मन में इन लोगों के प्रति गजब का आकर्षण पैदा हो गया। एक नाता-सा बन गया इनसे। मुझे याद है कि उस कम उम्र में भी मैंने अपने चचेरे भाई को इसलिए डांट दिया था कि उसने गांधी जी को बड़ी बेअदबी  से ‘गंधिया’ कह दिया था।वहाँ से हम दिल्ली आए। दिल्ली में ही मेरी पढ़ाई की शुरुआत हुई।  हम जब दिल्ली आ चुके थे, तब नेहरू जी का स्वर्गवास हुआ था। उन दिनों मैं दूसरी कक्षा में पढ़ती थी। हमारे घर में भी मातम मनाया गया। घर ही नहीं मुहल्ले भर में। घर में उस दिन और जिस दिन उनको दाग लगना था, चूल्हा नहीं जला। कुछ फल थे, उसी को हम बच्चों को खाने के लिए दे दिया गया था। मम्मी और पापा तो निराहार रहे। हम नेहरू जी के आखिरी दर्शन के लिए भी गए थे। एक रोड के किनारे बड़ी देर तक मई महीने की धधकती धूप  में खड़े रहे कि नेहरू जी का पार्थिव शरीर वहाँ से निकलेगा। मेरे घर में देश के प्रति बहुत प्रेम और सम्मान का माहौल था। लाल बहादुर शास्त्री ने जब ‘जय जवान जय किसान का नारा’ दिया और अन्न आदि की बचत की बात की तो सोमवार के दिन हमारे घर में खाना नहीं बनता था। फलों से काम चलाया जाता था। ऐसा सालों चला। उनके जाने के बाद भी। तो घर में देश-समाज सदा मौजूद रहा।
 
प्रीति 'अज्ञात' - आपके संस्मरण, हमारे पाठकों के लिए प्रेरणा-स्त्रोत का काम करेंगे ! हर दिन भी हमारे लिए एक नैतिक प्रेरणा लेकर आता है, फिर भी क्या मैं जान सकती हूँ, कि आप सर्वाधिक किस व्यक्तित्व से प्रभावित हुईं ? कोई रचनाकार या उसकी कोई रचना, जो आज भी आप पढ़ना पसंद करती हैं ?
सुमन केशरी - मनुष्य उठते-बैठते चर-अचर सब जगत से प्रेरणा लेता चलता है। सीखता चलता है। कभी मूक अनुगमन की चाह भी रखता है तो कभी प्रेरित करते गुणों को अपने हिसाब से जोड़-घटा लेता है। मैं संभवतः सबसे पहली बार जिस व्यक्ति से प्रभावित हुई वे शंकराचार्य थे। लगभग अबोधावस्था में ही जाने किसके मुँह से मैंने ब्रह्म की चर्चा सुनी थी, कोई साधू आए थे और उन्होंने बड़े प्रेम से मेरे माथे पर हाथ भी फेरा था। पोपला-सा मुख था। तब मेरी अवस्था साढ़े तीन-चार रही होगी। मैं उन्हें ढूंढने भी गई थी मंदिर में। शायद मिले शायद नहीं मिले...पर आज भी मुझे उनका चेहरा और चेहरे पर फैली बच्चे-सी हँसी याद है। सूरदास के भ्रमरगीत पर  पी एचडी के रिसर्च के समय शांकर अद्वैत पढ़ते हुए मुझे बहुत विचित्र अनुभूतियाँ हुईँ। आज भी शंकराचार्य मुझे बेहद आकर्षित करते हैं।
छठी कक्षा में मैंने महात्मा गांधी के ‘सत्य के प्रयोग’ का संक्षिप्त रूप ‘बा और बापू’ पढ़ा।  मैं गांधी जी के सच बोलने के फलसफे से बहुत प्रभावित हुई। आज भी मेरी कोशिश रहती है कि हर हाल में सच बोलूँ, चाहे उससे मुझे व्यक्तिगत रूप से कितनी भी पीड़ा क्यों न हो। इससे मुझे दो लाभ तो सद्य होते दिखाई देते हैं। एक तो यह कि मनुष्य बहुत कुछ फालतू में याद रखने से बच जाता है और इस तरह से दिमाग का बोझ हल्का रहता है, चिंता नहीं रहती और दूसरा यह कि कहने का ढंग आ जाता है। सच बोलने पर भी किसी को आहत न किया जाए और आहत हो जाने पर संबंधों को किस तरह से बचाया जाए, यह बहुत बड़ी चुनौती है। कई संबंध मेरी इस आदत की भेंट चढ़ गए हैं, दुख तो होता है पर मैं खुद को समझा लेती हूँ कि जो संबंध पाखंड, झूठ और मुँह देखी पर टिके हैं, वे आज नहीं तो कल खत्म हो ही जाएँगे।
दूसरी, जिस कविता से मुझे बेहद प्रेरणा मिली वह पाब्लो नेरुदा की एक कविता थी जिसमें उन्होंने मकड़ी की तन्मयता का चित्रण किया था कि वह कितनी बार भी क्यों न गिरे, वह बार बार अपने लिए जाल बुनने के काम में जुटी रहती है। प्रेम कविता पढ़ते हुए मुझे नाज़िम हिकमत की कविता बहुत प्रेरक लगी-“ उसने कहा मर जाओ और मैं मर गया!” विवेक के बिना प्रेम, वास्तव में प्रेम नहीं बल्कि या तो कोरा आकर्षण है अथवा दासता। नाज़िम की कविता में मरना किसी बड़े काम के लिए प्राणों की बाजी लगाना है। प्रेम जब तक दूसरे (प्रेमपात्र ) को ऊँचे शिखर पर चढ़ने का हौसला न जगाए, तब तक प्रेम कैसा? यही बात मीरा की कविता में है। “चाहे कोई बिंदौ चाहे कोई निंदौ चलूंगी चाल अनूठी..”यह तेवर सच्चे प्रेम से ही पैदा होता है। मीरा इसीलिए मुझे बेहद प्रेरक व्यक्तित्व लगती हैं।
कविता में शब्द की जितनी साधना, उसका जितना सावधान और सटीक प्रयोग तुलसीदास ने किया है, वह भी मुझे बड़े गहरे में प्रभावित करता है। तुलसी हमारे सबसे बड़े कवि हैं, सांस्कृतिक रूप से भी और साहित्यिक दृष्टि से भी। उनकी कविता मुझे कई स्तर पर उद्बुद्ध करती है। वे मेरे सही मायनो में गुरु हैं। उनसे रचनाकर्म सीखना, एक चुनौती है मेरे लिए।
मेरे पिता अपने शब्दों और कर्मों के बीच दूरी घटाने में आजन्म लगे रहे, वे भी मुझे राह दिखाते चलते हैं। और माँ की तो यह प्रार्थना ही थी कि पहले ‘उनको’ यानी दूसरों को सुख दो, बाद में मुझे...सोचती हूँ इतना निःस्वार्थ भाव क्या कभी मुझमें आ सकेगा?
तो बहुत सारी बातें, लोग, स्थितियाँ मुझे बनाती रही हैं और अब भी मैं निर्माणाधीन हूँ...शायद अंतिम क्षण तक रची जाती रहूँगी।
मुझे तुलसी दास, सूरदास, भवभूति, महाभारत, तोल्सतोय, रवींद्रनाथ टैगोर, दोस्तोयवस्की, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी,  मनोहरश्याम जोशी, पुरुषोत्तम अग्रवाल,अनुपम मिश्र, अशोक वाजपेयी, कुंवर नारायण, विनोद कुमार शुक्ल, निर्मल वर्मा,  मृदुला गर्ग,कृष्णा सोबती, सुधा अरोड़ा, मैत्रेयी पुष्पा, ज्योत्स्ना मिलन आदि को पढ़ना बहुत अच्छा लगता है। इन सबको पढ़ने से मेरे भावबोध और रचना-संस्कार में विस्तार होता है। शब्द प्रयोग, शैली आदि की जानकारी होती है, ज्ञान तो बढ़ता ही है।
 
प्रीति 'अज्ञात' - आपकी साहित्यिक यात्रा का प्रारम्भ कैसे हुआ ? उन दिनों हर घर में बच्चों की पत्रिकाएं और अच्छे साहित्य के पठन-पाठन का रिवाज़-सा था ! आपका माहौल भी निस्संदेह ऐसा ही रहा होगा !
सुमन केशरी - साहित्यिक यात्रा की शुरुआत तो सुनने-पढ़ने से हुई। पाठक और भावक हुए बिना कोई रचना कैसे कर सकता है भला? मेरे लिए रचना आज और अभी की बात नहीं है। रचना का अर्थ मेरे लिए विश्वभर के रचना-संसार से जुड़ना भी है। कोई भी शब्द अपने भीतर अनेकानेक अर्थ समेटे रहता है।  शब्द रचनाकार के मन में आते ही, विभिन्न संदर्भों के साथ गुंजायमान होने लगते हैं। धरती कहते ही क्या सीता का भूमिसात होना याद नहीं आता ,क्या महाभारत का युद्ध याद नहीं आता,  याद नहीं आता क्या कालीदास का मेघदूत अथवा गोदान का होरी? यदि ऐसा नहीं होता तो इसका अर्थ यह है कि लेखक या रचनाकार अपनी परंपरा से, स्मृतियों से विच्छिन्न हो गया है। तो मैंने अपने दादा के मुख से लोक कथाएं सुनीं, गाँव में गीत सुने। बचपन में ही पिता से महाभारत और रामायण की कथाएँ सुनीं। फिर सालों पराग, चंदामामा, चंपक, एनिड ब्लिटन और जाने क्या क्या पढ़ा और दसवीं तक आते आते मैं लगभग पूरा प्रेमचंद, वृंदावनलाल वर्मा और अमृतलाल नागर का ‘बूंद और समुद्र’, यशपाल की ‘दिव्या’ और राजगोपालाचारी का ‘महाभारत’ आदि पढ़ चुकी थी। लिखना मैंने शुरु किया कहानी लिखने से। 13-14 साल की उम्र रही होगी जब मैंने अपनी पहली कहानी लिखी। संबंधों पर थी यह कहानी और मेरे पहले श्रोता थे मेरे पिता, जो उसे सुनकर स्तब्ध रह गए थे। देर तक ताकते रहे मुझे। कविताएं मैंने 16-17 साल के उम्र में लिखनी शुरु कर दी थीं। स्कूल की मैगजीन ‘कौस्तुभ’ की मैं स्टूडेंट एडिटर थी और लेडी श्री राम कॉलेज के मैगजीन में भी मैंने लिखा। एम ए पढ़ने के दौरान फिल्में देखने का शौक चढ़ा, अनेक फिल्मों की समीक्षाएँ भी लिखीं जो कथादेश, हंस आदि अनेक पत्रिकाओं में छपीं।  
पहली रचना स्कूल मैगजीन में ही छपी। मम्मी-पापा बहुत खुश थे। सहपाठियों ने भी खूब तारीफ की। अब वे रचनाएँ, मेरे चित्र आदि मेरे पास नहीं हैं। मैंने जाने किस भावना से प्रेरित हो उन्हें नष्ट कर दिया। यादें ही बची हैं।
 
प्रीति 'अज्ञात' -  ’याज्ञवल्क्य से बहस’ व ’मोनालिसा की आंखे’, इन दोनों ही पुस्तकों की परिकल्पना व इनके प्रकाशन से जुड़े अनुभवों के बारे में विस्तार से कहें!
सुमन केशरी - 'याज्ञवल्क्य से बहस’ में कई सालों में लिखी गईं कविताएँ शामिल हैं, इसीलिए उस संकलन में अनेक तरह की- मिथक से लेकर प्रकृति तक की, प्रेम से लेकर फौजी तक को समेटती कविताएँ हैं। एक तरह से किसी कवि का पहला ही संकलन ‘प्रतिनिधि कविता’ का संकलन हो गया है, जिसके कारण कवि की पक्षधरता से लेकर उसकी चिंता तक पर एक जगह उंगली रख पाना कठिन हो गया है। इस तरह से यह रचना बहुत सफल रचना नहीं कही जाएगी, बावजूद इसके कि इस पर अनेक लेख लिखे गए। दरअसल इतना माल इकठ्ठा हो गया था कि जब रवींद्र त्रिपाठी और मैंने मिलकर संकलन बनाना चाहा तो अधिकांश को समेट लिया गया और अनेक सबचेप्टर बना कर उन सबको एक ही किताब का हिस्सा बना दिया गया। इसके अलावा फ़ॉर्म की दृष्टि से भी इसमें बहुत भिन्नता है। इस संकलन में चार पंक्ति की कविता ‘कल’ भी है और ‘राक्षस पदतल पृथ्वी टलमल’, ‘फौजी’, ‘बीजल से एक सवाल’, ‘आह राम’ जैसी लंबी कविताएं भी हैं।
 
दूसरा संकलन ‘मोनालिसा की आँखें’ एक तरह से ठीक से तैयार किया गया संकलन है। उसमें भावभूमि की स्पष्टता है और सारी कविताएं छोटे कलेवर की हैं। इसमें संकलित ‘औरत’ और ‘मोनालिसा’ तो लोगों के मुँह पर चढ़ गई हैं। ‘उसके मन में उतरना’ ने भी खूब प्रशंसा हासिल की है।
ये दोनों संकलन राजकमल प्रकाशन से छपे हैं और ये दोनों ही संकलन खासे चर्चित भी रहे हैं।
 
मेरा तीसरा संकलन- ‘शब्द और सपने’ ठीक मेरे चुनौती लेने वाले स्वभाव के अनुरूप ई-बुक के तौर पर नोटनल से इसी साल छपा है। यह किताब, कागज में छपी किताबों की तरह चर्चित तो नहीं हुआ पर कई लोगों ने इसे खरीदा है। किंतु लगता है कि अभी हमारा हिंदी समाज ई-बुक के लिए तैयार नहीं है। पर चुनौती तो यही है न?
फिर एक बात और। मुझे लगता है कि हिंदी समाज में खरीद कर पुस्तकें पढ़ने का चलन कम है। लोगों की इच्छा रहती है कि लेखक अपनी किताबें भेंट में दे दे। यह एक प्रवृत्ति है, जिससे हमारा समाज जितनी जल्दी मुक्त हो उतना ही साहित्य का भला होगा !
 
प्रीति 'अज्ञात' - जी, आपकी बात से अक्षरश: सहमत हूँ। तब और भी आश्चर्य  होता है जब मुफ़्त में पाने के बाद भी लोग उसे पढ़ना या उस पर प्रतिक्रिया देने में कतराते हैं ! यहाँ तक कि पुस्तक प्राप्ति की सूचना भी नहीं देते ! ख़ैर .. ऑनलाइन पत्रिकाओं के माध्यम से आज पाठकों का साहित्य के प्रति रुझान बढ़ा है, क्या ये प्रिंट पुस्तकों से ज्यादा प्रभावशाली हैं ?
सुमन केशरी - हाँ, निःसंदेह ऑनलाइन के चलते लोगों में साहित्य पढ़ने के प्रति रुचि बढ़ी है, पर अभी यह निष्कर्ष निकालना उचित न होगा कि यह माध्यम प्रिंट पुस्तकों से ज्यादा प्रभावी हो गया है। खुद मेरी ई-बुक, मेरे प्रिंटेड किताबों की तुलना में कम बिकी है।
 
प्रीति 'अज्ञात' - बहुत-सी पत्रिकाएँ, रचनाओं के प्रकाशन के बाद लेखक को पारिश्रमिक देने से बचती हैं ? क्या सिर्फ प्रकाशित हो जाना ही लेखन का एकमात्र उद्देश्य है ? वह मानदेय का हक़दार नहीं ?
*(यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना चाहूँगी कि 'हस्ताक्षर' एक वेब पत्रिका हैं जहाँ आय बिलकुल नहीं , सिर्फ व्यय ही व्यय है। लेकिन हमारा उद्देश्य ईमानदारी और लगन से बिना किसी जोड़तोड़ के पाठकों तक अच्छा साहित्य और एक सकारात्मक सोच पहुँचाना है। जब हमें विज्ञापन मिलेंगे या प्रिंट में जायेंगे तो रचनाकारों को मानदेय अवश्य ही मिलेगा) 
सुमन केशरी - निःसंदेह लेखक मानदेय का हकदार है।उसे अपने लिखे का पैसा मिलना ही चाहिए।  इस समाज में स्पेश्लिस्टों को मुँहमांगा पैसा मिलता है, टी वी- फिल्म लेखन में भी पैसा है।  पर लेखक को, साहित्य लिखने वाले को यह समाज स्पेश्लिस्ट मानने को तैयार नहीं, खासतौर से हिंदी  में लिखने वाले को। उससे समाज कल्याण, राष्ट्रहित, भाषा की सेवा आदि  की उम्मीद की जाती है। यह अजीब बात है। यदि कोई चाहे कि वह लेखन के बूते घर-गृहस्थी चला ले, यह संभव ही नहीं।
दरअसल यह बात आई है साहित्य के उद्देश्य के प्रति अनेक भ्रमों के कारण। हम लेखकों ने साहित्य को  स्वायत्त मानने की बजाय उसके उद्देश्य को चेतना में बदलाव, सामाजिक-राजनैतिक क्रांति आदि से जोड़ दिया है। और दूसरी ओर हम सब बाजारवाद के प्रति सख्त रवैया अख्तियार करते हैं। व्यापार के प्रति आम हिंदी लेखक-पाठक के मन में धिक्कार का भाव है। अब यदि आपका उद्देश्य इतना बड़ा हो कि आप समाज व व्यक्ति चेतना में परिवर्तन के बारे में सोच रहे हैं और साथ ही व्यापार को बुरी चीज मानते हैं तो  पैसा मांगना बुरा लगता है...यही वह दुश्चक्र है जिसमें लेखक फंसता-कसमसाता है। पर मैं बिल्कुल स्पष्ट हूँ कि लिखने का पैसा- कविता-रचना पाठ करने, भाषण-वक्तव्य देने का पैसा बुद्धिजीवी को अवश्य मिलना चाहिए। वह अपना समय, साधन और ऊर्जा तीनों को ही लगा कर रचना करता है।  
 
प्रीति 'अज्ञात' - इन दिनों आप क्या लिख रहीं हैं ? कविता  के अलावा और किस विधा में लिखना पसंद करती हैं ?
सुमन केशरी - मेरी रचनाएँ दरअसल अनेक विषयों को समेटती हैं। मिथकीय चरित्रों व विषयों पर सोचना लिखना मुझे बहुत प्रिय है। सीता हो या सावित्री, द्रौपदी हो या कुंती अथवा गांधारी अथवा कर्ण या विदुरसभी मुझे अपने-से लगते हैं। एक नाता-सा जुड़ जाता है उनसे। यही नहीं कस्तूरबा की व्यथा मुझे बहुत कातर करती है। कविताओं में मैंने इन सबको समेटा है। कविताओं के अलावा मुझे कहानियाँ लिखना और यात्रा वृतांत्त लिखना बेहद प्रिय है। मैंने बनारस, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप के वृतांत्त लिखे हैं, जिन्हें काफी सराहा गया है। इन दिनों मैं आर्मेनिया के बारे में लिख रही हूँ।
 
प्रीति 'अज्ञात' - साहित्य में आलोचना को आप कितना आवश्यक मानती हैं ? फेसबुक पर उपस्थित कुछ आलोचक 'काव्य' के बजाय 'कवि' पर कटाक्ष करने में अधिक रूचि लेते हैं, इन तथाकथित आलोचकों के कारण बहुधा नवोदित लेखक हतोत्साहित भी हो जाया करते हैं ! मेरा मानना है कि इस निराश नवोदित लेखक से भी अधिक आवश्यक उस आलोचक को कुंठा से बाहर निकालना है ! क्योंकि इन्हें ब्लॉक करने से मात्र एक ही इंसान स्वयं को तनाव से दूर रख सकता है ! आपका इस बारे में क्या कहना है ?
सुमन केशरी - साहित्य में आलोचना की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण है। हमारे यहाँ तो नाट्यशास्त्र- काव्यशास्त्र की बहुत सुदृढ़ परंपरा रही है। काव्य के आस्वाद को समझने और उसका रसास्वादन के लिए आलोचना महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वही हमें एक श्रेष्ठ रचना और एक कमजोर रचना का भेद भी बताती है और रचना कैसी हो इसकी आधारभूमि भी तैयार करती है। पर अच्छी आलोचना के लिए बहुत तैयारी- सांगोपांग तैयारी की जरूरत है
 
इन दिनों मुंह देखी की बातें हो रही हैं। आलोचना का अर्थ संबंध-निर्वाह हो गया है। फिर आलोचना लिखने के लिए जिस तरह के सांगोपांग अध्ययन, चिंतन और धीरज की जरूरत है, उसका नितांत अभाव इन दिनों दिखाई पड़ता है। कुछ मुहावरे गढ़ लिए गए हैं और उसी को सभी रचनाओं के बारे में अमूमन दुहरा दिया जाता है। यह रचना और रचनाकारों के लिए  ठीक नहीं है। इन दिनों दोयम दर्जे के लेखन का बोलबाला  है। फेसबुक से यह बात और अधिक सामने आई है। रातों-रात लोग शोहरत की उम्मीदें करने लगे हैं। नवोदित लेखक इसके ज्यादा शिकार हुए हैं। रचना साधना की चीज है, यह हम भूलते जा रहे हैं। आपने बिल्कुल ठीक कहा है कि फेसबुक पर तो बहुत बार कविता की बजाय कवि के प्रोफाइल (फोटो नहीं, विस्तृत अर्थ में) पर ध्यान दिया जाता है और उसी से बातें तय भी होती हैं। जबकि मेरा मानना है कि कविता प्राइमरी है और होनी चाहिए।
 
प्रीति 'अज्ञात' - क्या कुछ ऐसा कहीं शेष है जिसे आप पाना चाहती हैं या जिसके न हो पाने का मलाल आज भी आपको सालता है ?
सुमन केशरी - चाहती हूँ कि मेरे चित्त में वैसी शांति हो जो बुद्ध की मूर्तियों के चेहरे पर होती है। मेरी इच्छा है कि मेरे पास मनुष्य के बच्चे से लेकर पशु-पक्षी कोई भी आकर उसी तरह बैठ जाए जैसे मेरे अपने बच्चे आ बैठते हैं..निःशंक...निश्चिंत..!
हाँ अफसोस है कि जितना पढ़ना चाहिए था उतना पढ़ न पाई। दर्शन का विधिवत् अध्ययन न कर पाई। मेरा बेटा ऋत्विक दर्शन का गंभीर विद्यार्थी-शोधार्थी है, उम्मीद है कि उससे एक दिन जरूर कुछ पढ़ सकूंगी।
 
प्रीति 'अज्ञात' - सामाजिक मुद्दों पर भी आप आवाज़ बुलंद करती रहीं हैं। इस बारे में अपने अनुभव साझा करें !
सुमन केशरी - मैं आमतौर से सभी महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी आवाज लिख कर भी और आंदोलनों- प्रदर्शनों में भाग लेकर भी उठाती रही हूँ, चाहे वह साम्प्रदायिकता का सवाल हो या सती होने का अथवा बलात्कार का या फिर अभिव्यक्ति के खिलाफ़ हो रहे हमलों का। मैंने साम्प्रदायिकता विरोधी आंदोलन में जमकर हिस्सा लिया है। उन दिनों में भी मैं प्रदर्शनों में गईं हूँ जबकि स्त्रियाँ घर बैठ जाती हैं, मसलन गर्भवती होने पर भी और गोद में बच्चे लेकर भी। 1988 में ‘तमस’ के प्रसारण के खिलाफ़ हो रहे हमलों के दौरान जब एक बार स्वयं भीष्म साहनी, शीला जी के संग रामजस कॉलेज आए थे तब मैं दिलीप सिमियन और पुरुषोत्तम अग्रवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हुई थी। उस समय मुझे पाँच माह का गर्भ था और मैं हाई ब्लड प्रेशर से भी जूझ रही थी। पर मैंने कॉलेज की कुछ लड़कियों के साथ भीष्म जी-शीला जी के इर्द-गिर्द इस आशय से घेरा बना लिया था कि पहला वार हम पर हो, फिर कोई उन तक पहुँचे। इसी तरह निर्भया कांड के दौरान न केवल मैंने कविताएँ रचीं, बल्कि मुहल्ले भर को इकठ्ठा कर मैंने इंडिया गेट वाले प्रदर्शन में हिस्सा लिया था। मेरा पूरा परिवार ही सामाजिक-राजनैतिक तौर पर बहुत जागरूक और कर्मशील परिवार है। मुझे इस पर वाजिब गर्व भी है। अभी कल ही कलबुर्गी की हत्या के खिलाफ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  के पक्ष में हुए विरोध प्रदर्शन में मैंने और मेरी बेटी ऋतंभरा ने भाग लिया। मेरे हिसाब से लेखक को न केवल जागरूक होना चाहिए बल्कि उसे सामने आकर वार झेलने के लिए तैयार भी रहना चाहिए।
 
प्रीति 'अज्ञात' - 'हस्ताक्षर' के लिए कोई सन्देश !
सुमन केशरी – ‘हस्ताक्षर’ निष्पक्ष-निर्भीक ढंग से अपना काम करे, संभावनाओं का आकाश खुला हुआ है

- प्रीति अज्ञात
 
रचनाकार परिचय
प्रीति अज्ञात

पत्रिका में आपका योगदान . . .
हस्ताक्षर (33)कविता-कानन (1)ख़ास-मुलाक़ात (9)मूल्यांकन (1)ग़ज़ल पर बात (1)ख़बरनामा (12)व्यंग्य (1)संदेश-पत्र (1)विशेष (2)'अच्छा' भी होता है! (2)फिल्म समीक्षा (1)