प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम
नन्हे फ़रिश्ते की कब्र पर....! 
अकाट्य, अनुत्तरीय व अवश्य मृत्यु कब किसे और कहाँ मिलेगी इस रहस्य को आज तक कोई नहीं जान पाया है, न जान पायेगा। शायद?
उस दिन शायद उन्हें भी ‘वो‘ दिखाई दी थी, जब वे शाम के पाँच बजे ऑफिस से घर के लिए रवाना हुए, तभी तो उन्होंने कार को सड़क से नीचे उतार लिया था और अपने डॉक्टर को फोन किया था। डॉक्टर को किसी की आवाज सुनाई नहीं दी  तथा उसने उस फोन कॉल पर कोई प्रतिक्रिया नहीं की। एक राहगीर की नज़र उस कार पर पड़ी। पहले सोचा कोई सो रहा है। क्या पता कोई शराबी होगा! किन्तु  कौतुहलवश जब कार का दरवाजा खोला तो पाया कि कार चालक का सिर स्टियरिंग व्हील पर पड़ा था, कार की चाबी गोद में व् शरीर निष्प्राण। उसने तुरंत पुलिस को फोन किया। पुलिस ने मोबाइल से नंबर ढूँढकर नाते रिश्तेदार को खबर भेजी। लाख कोशिश के बाद उनका मृत्यु से अपॉइंटमेंट कोई नही टाल पाया। पत्नी थी, एक अदद बेटा राहुल अमेरिका न्यूयोर्क में रहता था। सूचना दी गई। शोकाकुल परिवार आकस्मिक निधन सहन नही कर पा रहा था। राहुल अभी इतना बड़ा भी नही हुया था। विवाहित था, दो बेटे आठ वर्षीय अन्नत और छः वर्षीय असीम दादा से बहुत प्यार करते थे। अभी तो उनसे जी भर कर बातें भी नही कर पाए थे। प्रत्येक वर्ष दिवाली मनाने दिल्ली आते थे। दादा-दादी बच्चों पर ढेरों ममता लुटाते। घर में ख़ूब रौनक होती। बीस दिन की छुट्टियाँ पंख लगा कर उड़ जाती। राहुल की शालीन सभ्य पत्नी साक्षी उससे कहती,“दोस्तों से मिलने आते हो कि पापा मम्मी से? कुछ समय पापा के साथ बिताया करो।”
परन्तु राहुल दिल्ली आकर कभी एक मित्र के पास तो कभी दूसरे मित्र उसके पास। पिता  रिटायर नहीं हुए थे, वे सुबह आठ बजे निकलते और शाम को सात बजे तक घर आते। अक्सर शाम को राहुल व परिवार मित्रों या रिश्तेदारों में व्यस्त रहता था, रोज़ पार्टीज़ होतीं; उस पर त्यौहार की रेलपेल। “पापा के साथ बीस दिनों में बीस घंटे भी नही साथ बैठा।” राहुल विलाप कर रहा था काश कि समय की दिशा का, समय की गतिविधियों का पता पहले चल जाता और वो जी भर कर उनके साथ रहता किन्तु अब सिवाय खाली हाथ मलने के कुछ बाक़ी नही रह गया था। “मैं कभी विदेश नही जाता, पता होता तो मैं यही उनके साथ रहता।” मम्मी ने बताया कि कुछ समय से पापा थके-थके रहते थे, बाद में पता चला उनके हार्ट में ब्लॉक था। “काश कि पापा के हार्ट के ब्लॉक का  पहले पता लग जाता, तुरंत आ जाता उनका अच्छे से अच्छा इलाज करवाता, अपने साथ अमेरिका ले जाता, बाई पास करवा लेते। आजकल तो हार्ट का इतना अच्छा इलाज होता है,पापा जीवित रहते।” रो -रोकर राहुल पश्चाताप के आँसू बहाता रहा किन्तु मृत्यु से उनका अपॉइंटमेंट तो कार में लिखा था! रोग का निदान न होना, रोग का इलाज न हो पाना क्या ये सब मृत्यु की चालबाजियाँ नहीं थीं?
 
जब उस शरीर को लेकर उनका अंतिम संस्कार करने गढ़-गंगा लेकर गया तो उसकी रूह काँप उठी। उसके प्यारे पापा, जिनके शरीर पर एक खरोंच भी आ जाती थी तो आहत हो उठते थे। घर में पहनने की बाटा की चप्पल रोज साबुन से धुलती थी, गरमी हो या सर्दी; सफ़ेद मोज़े पहन कर रहते क्योंकि धूल का कण भी उनके पैरों को जख्मी कर देता था। मिट्टी, गंदगी, बदबू आदि उन्हें बहुत सताते थे और आज जब उन्हें रस्सियों से बाँधा जा रहा था तो राहुल द्रवित होकर बड़े संभाल कर उन्हें बंधवाते हुए बार बार कह रहा था,“धीरे-धीरे पापा को रस्सी चुभेगी, अधिक टाईट मत करो।” जून का महीना और जब उनके शरीर को शव वाहिनी में लादा गया तो राहुल ने रोते -रोते कहा,“बिना ए.सी.वाली गाड़ी? इसमें  पापा कैसे जायेंगे?” “क्या करें ए.सी. गाड़ी मिली नहीं, तुम्हारे इंतज़ार में दो दिन से शरीर रखा था अब और देर नही की जा सकती।”  उसके परम प्रिय भाई समान मित्र यशस्वी चंद्रा ने उसे समझाया।
यशस्वी उसका बचपन का साथी था, वहीं दिल्ली की गलियों में ‘गली क्रिकेट’ खेल कर दोनों बड़े हुए थे। बचपन बीता, जवानी आई, पढ़ने की विधाओं ने उनके मार्ग विपरीत दिशा में तय कर दिए। यशस्वी इंजीनियर बन एम.बी.ए. कर पूना, बंगलौर और फिर अहमदाबाद चला गया। उसने शादी बड़ी देर से की।अभी केवल दो वर्ष पूर्व। उसकी पत्नी  उसके साथ काम  करती थी। इस समय गर्भवती थी। राहुल ने उससे कहा था,“रिया को इस हालत में छोड़ कर तुम्हे नही आना चाहिए था।” “रिया के मम्मी पापा मुंबई से आये हुए है वो अकेली नहीं है और वे क्या तेरे ही पापा थे?” यशस्वी की आँखें बरसात के मेघों-सी लबालब भरी बरस रही थीं। दोनों मित्र गले लिपट-लिपट रो रहे थे। “सॉरी यश।” राहुल ने अपने शब्दों को वापिस लेते हुए यश के आँसू पोंछे। उसके पिता दो वर्ष की उम्र में छोड़ कर न मालूम कहाँ चले गए थे। उसकी माँ ने स्कूल में टीचरी कर उसे पाला पोसा था। उसके अपने पिता तो केवल फॉर्म में ‘पिता का नाम'  वाले कॉलम में भरने के काम आते थे। यश अक्सर झगडा करता था, पिता का नाम क्यों अनिवार्य है? जबकि वे उसके जीवन में कोई रोल अदा नही करते थे। राहुल का घर उसका अपने घर जैसा ही था। उसके पिता को वो अंकल नहीं, पापा कहता था। 
दिल्ली की सड़कों पर पन्द्रह बीस कारों का काफिला निकला था। सुबह नौ बजे और इतना  ट्रैफिक! चारों तरफ गाड़ियाँ ही गाड़ियाँ और उसी समय कोई मंत्री जी किसी अमेरिकन डेलिगेट के साथ निकले उनके काफ़िले को रास्ता दिने के लिए ट्रैफिक रोक दिया गया। आधा घंटे में ट्रैफिक जो पहले ही ठसाठस भरा था, अब एक अराजक भीड़ का हिस्सा बन गया।हॉर्न, मारामारी, टेकिंग ओवर, क्रुद्ध चालक, ट्रक, बस, ट्रेक्टर, ऑटो, स्कूटर, साइकिल, ठेला वाले..एक हुजूम सड़क पर उतर आया था। उनके साथ की गाड़ियाँ तितर-बितर हो गयीं थी। मोबाईल द्वारा एक दूसरे का पता कर रहे थे परन्तु शोर में कुछ सुनाई नहीं आ रहा था। भीषण गरमी, नॉन  ए.सी. गाड़ी में पिता के शव  के साथ बैठे हुए देख कर सब उससे आग्रह कर रहे थे कि वो किसी अच्छी आरामदायक कार में बैठ जाए। उस गाडी में बैठे आठ लोगों में से उन दोनों को छोड़ बाक़ी सब उतर कर दूसरी गाड़ियों में बैठ गए थे। अमेरिका में बरसों से सुख सुविधा की आदत पड़ गयी थी, शारीरिक संताप सहने की शक्ति क्षीण हो गई थी। किन्तु ये क्षण जो वो जी रहा था उसमें उसे अपने सुख सुविधा का तनिक भी भान नहीं था। गाड़ी के हर हिचकोले पर वो पापा को ऐसे संभालता था मानो वो बीमार हों और उन्हें अस्पताल ले जाया जा रहा हो।                      
शाम के चार बजे वे गढ़ गंगा पहुंचे। उनके वहाँ पहुँचते ही कुछ पंडित उन्हें घेर कर खड़े हो गए। जैसे ही दिवंगत का नाम बताया गया, पंडितों की भीड़ को चीरता हुया एक पंडित सामने आया और बोला,“आपके परिवार का पंडा मैं हूँ। आपका नाम राहुल है व् आपके दो बेटे असीम, अन्नत हैं। आपके पिता का नाम देवेन्द्र्ऋषि था, बाबा का नाम परमेन्द्रऋषि तथा परबाबा का....” कहते हुए उसने रजिस्टरनुमा लम्बी  कॉपी उसे थमा दी। राहुल हतप्रभ सा उसका मुँह ताक रहा था। “इसे मेरे बेटों के नाम भी पता हैं!”रजिस्टर हाथ में पकड़ कर उसने पढ़ना चाहा तो कुछ समझ नहीं आया न मालूम क्या भाषा थी? क्या लिपि थी?
“आपका खानदान राजसी राजऋषियों का था, वे पहले बनारस में रहते थे किन्तु बाद में दिल्ली आ गए। यहाँ आकर सब पढ़ने लिखने, नौकरी आदि करने लगे।”
पंडित जो बोल रहा था उसके बीच ‘रॉयल‘ शब्द छिटक कर उसके मस्तिष्क में आ धंसा। उसके पापा में शाही मिजाज तो अवश्य था। यही वजह होगी कि उनके कपड़ों की अलमारी किसी शो रूम की अलमारी जैसी लगती थी। दर्जनों जूते-चप्पलें, सैंडल्स, रुमाल आदि। कभी-कभी मम्मी उलाहना देती थीं, “सुई जितना भी दाग लगा रह जाए तो कपड़ा फेंक देते हैं।”
 
पापा की देह को अग्नि के हवाले करते समय राहुल जार-जार रोया। अभी उनका शरीर आधा भी नही जला था कि बड़े जोर की बारिश आ गई। अफरा-तफरी मच गई। पंडितों ने उनके अधजले शरीर को गंगा के हवाले कर दिया। सब लोग बारिश से अपने को बचाने के लिए दुकानों में घुस गए। वहाँ कोई बचाव करने की व्यवस्था नही थी। जिस स्थान पर अधजला शरीर पड़ा था वहाँ पानी बहुत कम था। राहुल ने भीगी आँखों से देखा, कम से कम आधा दर्जन और भी अन्य अधजले  शरीर वहाँ पड़े थे। ये कैसी दुर्व्यवस्था है? गंगा, जिसे मैया कहते है वो दुर्गन्धित थी। मनो कचरा पड़ा था। कपड़े, नारियल, घी, तेल, प्लास्टिक के डिब्बे,लकड़ियाँ,फूल, मिठाई के डिब्बे ,प्लास्टिक के हजारों थैले और भी कितने ही रीति रिवाजों के अंतर्गत प्रयोग करने वाली वस्तुओं को गंगा में बहा दिया था। फलस्वरूप गंगा में जल कम दिख रहा था अधिकता थी तो उन सब वस्तुओं की जिन्हें अंतिम संस्कार करने में उपयोग किया जाता है। बादलों का तेवर देख कर सब लोग शीघ्रतापूर्वक गाड़ियों में सवार होने लगे और राहुल को भी जबरदस्ती गाड़ी में बिठाया। वो बार बार अपने पापा के शरीर की ओर चला जाता, बड़ी कठिनाई से उसे उस दृश्य से विलग किया गया। घर वापिस लाये। राहुल न खाना खा रहा था, न सो पा रहा था। “पापा को वहाँ गंदगी, बदबू में छोड़ आया हूँ, वे वहाँ पड़े हैं, उन्हें वहाँ से लाना होगा।” उसकी दशा देखकर डॉक्टर साहब को बुलाया गया, उन्होंने उसे शांत करने के लिए नींद की गोली दे कर सुला दिया। अगले दिन सवेरे उठा तो पता चला, यशस्वी कल देर रात की फ्लाईट से अहमदाबाद चला गया था। रिया की हालत ठीक नहीं थी, वो अस्पताल में दाखिल थी। इतना सुन कर राहुल के मन मस्तिष्क पर अपने पापा का ख्याल उस समय पीछे की सीट पर जा बैठा और यश, रिया और उनकी अजन्मी संतान की फ़िक्र में उसका ध्यान बँट गया। फोन किया, पता लगा रिया का हार्ट केवल चालीस प्रतिशत काम कर रहा था। वो उस समय जीवन मृत्यु के बीच लटकी थी, उसका मानव शरीर मशीनी हार्ट द्वारा संचालित था, लंग्स भी कमजोर हो चुके थे। यश ने बताया पिछले दो महीने से उसकी खांसी रुकने का नाम नही ले रही थी। डॉक्टर्स ने उसकी दशा का निदान यह कह कर  टाल दिया था, “गर्भवती महिलाओं को कभी कभार  इस प्रकार के रोग लग जाते हैं, बच्चे के जन्म होते ही स्वतः ही सब ठीक हो जाएगा।”और आज वो बचने, न बचने के कगार पर थी। राहुल का पूरा ध्यान मित्र पर पड़ी गाज पर केंद्रित हो गया। घर में सबने थोड़ी साँस ली। किन्तु विधि की योजना, यदि वो सब कुछ विधि द्वारा प्रेषित हो रहा था, तो कितना क्रूर हास्य था! एक का मन भटकाने के लिए दूसरे के जीवन से खेलना? यह तो ऐसी बात हो गई कि किसी के मन से पानी में डूब जाने का डर मिटाने की खातिर उसके पास वाले को डुबा दिया जाए या फिर आग से डरे मनुष्य को उबारने के लिए किसी और का घर जला दिया जाये!
 
एक तरफ अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रहा था। पापा के फूल चुनने गया। पंडितों ने शरीर के फूल चुन कर रख दिए थे और  एक तरफ रिया के लिए प्रार्थना कर रहा था। बदस्तूर श्रीमद भगवत गीता का पाठ करने उसके पिता के मित्र पधारे थे, जो गीता के अनन्य भक्त व ज्ञानी थे। उन्होंने गीता पर टीका भी लिखी  थी। वे राहुल को संबोधित कर बोले, “आज तुम्हारी दशा भी अर्जुन जैसी है, तुम भी संताप कर रहे हो।  तुम्हारा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है, तुम विचलित व् डिप्रेस्ड हो।”
राहुल की आँखों से झरझर आँसू बह निकले सिसकी गले में अटक गई बोली होठों पर भटक गई। “बताओ क्या कारण है?” पितृ तुल्य नित्यानंद शास्त्री ने उससे प्रश्न किया। उत्तर न मिलने पर उन्होंने कहा,“तुम जिस की मृत्यु पर शोकसंतप्त हो वो वास्तव में मरा नही है।"अचंभित हैरान आँखे झट से ऊपर उठी और उनकी वाणी से निकले शब्दों की ओर सम्मोहित सी ताकने लगीं। “ये आप क्या कह रहे हैं? मैं अपने इन्हीं हाथों से उनका दाह- कर्म कर के आया हूँ और आप कहते हैं वे मरे नहीं, मरे नहीं तो ला दीजिए उनको।” राहुल हक्का-बक्का सा पगलाया हुया हाथ पसारे भीख मांग रहा था। दरवाजे के सामने जा कर खडा हो गया एक अनहोनी की प्रतीक्षा में। उसे सम्भाला और स्थान ग्रहण करने को कहा। उसकी मानसिक दशा अवलोकित करते हुए शास्त्री जी ने उससे कहना प्रारम्भ किया, “आर्थिक उन्नति हेतु ,विदेशी मुद्रा अर्जित करने डॉलर कमाने व्यक्ति अमेरिका, यूरोप,चीन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड कहाँ कहाँ भटकता फिर रहा है और  वे सब हमारे यहाँ वृन्दावन की गलियों में राधे- राधे का जाप कर रहे हैं। जानते हो, क्यूँ इस देश में आते हैं? ”“नही” राहुल का एक शब्दीय उत्तर सुन वे बोले, “उन्हें देखकर लगता है जैसे उनका कुछ खो गया है जिसे ढूँढ रहे हैं। मैंने एक अमरीकन से पूछा ‘ भाई हम दरिद्र देश -वासी तुम्हे क्या दे सकते है? तुम यहाँ अपना सब कुछ छोड़ धोती - कुर्ता पहनकर, भाल पर तिलक लगाए ढोलक पर कीर्तन करते गलियों में फिरते रहते हो? मुसकुरा कर उसने कमर मटकाई, हाथों को नृत्य की मग्न मुद्रा में ऊपर की ओर उठाकर नचाया और “राधे राधे“ करता मुस्कुराता चला गया। मानो कह रहा हो, ‘बड़े मूर्ख हो' उसके चेहरे पर एक आश्चर्यजनक दीप्ति थी।” श्रोतागण उन्हें मन्त्र मुग्ध हो कर सुन रहे थे। किसी एक ने कहा, “हाँ अक्सर मंदिरों में विदेशी पूजा पाठ करते पाए जाते हैं, हरे रामा हरे  कृष्णा का अपना एक अलग संसार है और हज़ारों की संख्या में विदेशी भारत आते हैं।” “ समूचे विश्व में कोई ऐसा स्थान नहीं है जो आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को दे सकता हो। जीवन ,मृत्यु को समझना तथा अदृश्य को दृष्टिगोचर करवा सकें, ऐसा ज्ञान केवल भारत में तथा भगवतगीता में निहित है। अज्ञानी मृत्यु पर शोक करता है किन्तु जिसने गीता पाठ किया हो वो जानता है कि मृत्यु केवल शरीर से आत्मा का वियोग मात्र है। आत्मा कभी मरती नहीं, वह अजेय,अमर  तथा अविनाशी है। “नैनंछिदंति शस्त्राणिनैनं दहति पावकः ,न चैनं केल्द्यन्त्यापो न शोषयति मारुतः” “इसका अर्थ?” राहुल ने प्रश्न किया। 
“अच्छा सोच कर बताओ, समझो कि तुमसे एक पहेली बूझ रहा हूँ। कोई ऐसा है जिसे हथियार तलवार चाक़ू द्वारा काटा न जा सके चाहे उसे तोपों से या बंदूकों  से उड़ा दो फिर भी न मरे, जिसे आग के शोलों में ढकेल दो और जले नहीं, अथाह समुद्र  में डुबाने पर भी गले नहीं तथा आंधी तूफ़ान वेगवती हवायें जिसका बाल भी बांका न कर सके?” “जानते हो वो क्या है?” शास्त्री जी ने  राहुल को तीक्ष्ण दृष्टि से  देखते हुए प्रश्न किया। कुछ देर सोचता रहा फिर बोला,“नहीं।”
“आत्मा का रूप नही होता, शरीर का होता है। शरीर आत्मा से है और आत्मा कभी मरती नहीं।" वे आगे बोले, “जिस प्रकार मनुष्य एक वस्त्र त्याग कर दूसरा पहन लेता है इसी प्रकार आत्मा एक शरीर त्याग कर दूसरा चोला धारण कर लेती है।” "आप के कहने का अर्थ है पापा की आत्मा किसी और शरीर में प्रवेश कर गई है। किसके?” राहुल व्याकुल आतुर हो कर बोला। “पूर्व जन्मों के संचित कर्मो के आधार पर नया चोला मिलता है। संसार में उलझ कर मनुष्य अनेकों कर्म करता है और उन्हीं कर्मो के आधार पर उसे नया चोला मिलता है। वास्तव में आज तुम्हें  इतना ही कहना चाहता हूँ कि “जो बीत गया उसका पश्चाताप मत करो तथा क्या होने वाला है भविष्य की चिंता भी मत करो। बस सिर्फ और सिर्फ वर्तमान में रहो एवं अखंड पुरुषार्थ करो।”
 
“ठीक है शरीर नश्वर है, लेकिन क्या उस नश्वर शरीर का निरादर होना चाहिए? क्या उन्हें कूड़े कचरे के जैसे फेंक देना उचित है?” अधजली लाशें राहुल के स्मरण पटल पर बैठी उसका संतुलन डिगा रहीं थी, उसे उत्तर चाहिए था। 'नहीं ” “फिर गढ़ गंगा पर इतनी गंदगी क्यों थी? वहाँ यथोचित व्यवस्था क्यों नही की गई थी?” शास्त्री जी निरुतर हो गए | इतना ही बोले, “यह एक सामाजिक प्रश्न है। आजकल विद्युतीकरण द्वारा मृतकों के शरीर जलाने का प्रावधान है किन्तु तुम्हारे पिता बिजली से डरते थे अतः एक बार मुझे कहा था। “क्या मृत्यु उपरान्त मृतक शरीर को सम्मान नही मिलना चाहिए?” “अवश्य” सूक्ष्म  उतर देने की बारी अब उनकी थी | “देखो बेटा मनुष्य को दुःख व् सुख दोनों को एक समान रहना चाहिए।” राहुल को शांत करने की गरज से बोले। किन्तु राहुल सुनकर भी नहीं सुन रहा था। “मुझे तो ऐसा लगता है कि हम आध्यात्म में एस्केप कर रहे है।” रोष पूर्वक राहुल ने कहा, हम असफल सामाजिक प्रणाली पर इसका आवरण चढ़ा रहे है या फिर मृतकों की अवहेलना इस कारण है कि..... उसका वाक्य अधूरा छूट गया क्योकिं तभी  राहुल के मोबाइल की रिंग बजी। यश का फोन था। माफी मांगते हुए उठा और फोन सुनने लगा। 
“हेलो, राहुल अभी कुछ देर पहले  मेरी बेटी पैदा हुई है, ‘बिटिया रूही’ को सीज़र द्वारा रिया के गर्भ से निकाला है। मैं बाप बन गया। गुडिया है बिलकुल  रिया जैसी है।” “बधाई हो मेरे दोस्त।” राहुल का चेहरा मित्र की खुशी साझा करते हुए चमक उठा। “और रिया कैसी है?”
“अभी ठीक नही है।”
“सब ठीक हो जाएगा, मैं कल हरिद्वार जा रहा हूँ फिर अहमदाबाद आता हूँ।” राहुल ने यश को आश्वासन दिया। शास्त्री जी उसकी ओर देख कर बोले, “लो कर लिया नया चोला धारण।”
उसके पिता की आत्मा! यश के घर में? अवाक राहुल! जन्म पुनर्जन्म  के सिद्धांत पर विश्वास करने तथा  इस फिलोसफी को स्वीकार करने का मन होने लगा। उसके मलिन मुख पर स्मित की रेखाएं चिन्हित हो उठी  ‘उसके पिता जीवित है’, इस ख्याल ने उसका मन आनंद से भर दिया। 
अगले दिन प्रातः  पिता की अस्थियां प्रवाहित करने हरिद्वार रवाना हुया गया। असीम व् अन्नत को भी साथ ले गया। वो उन्हें अपने देश की गरिमा गंगा के दर्शन करवाना चाहता था किन्तु वहाँ भी वो ही गंदगी का आलम! गंगा में नहा कर गंदे हो गए होटल के बाथरूम में नहा कर स्वच्छ हुए। दिल्ली से कुछ दूर थे कि यश का एस.एम.एस.आया। लिखा था, ‘रूही इज नो मोर। क्रिमेशन इज एट नाइन (९) ए.एम .टुमारो.’ “ओह! नो!” साक्षी से फोन कर राहुल ने सब बताया और बोला उसकी टिकिट करवा दे तथा बैग पैक करदे वो अहमदाबाद जा रहा है | रात काफी हो चुकी थी अतः सुबह सवेरे की पहली फ्लाईट पकड़ वो अहमदाबाद चला गया। एयरपोर्ट पर उतर कर घडी देखी, आठ बज कर तीस मिनिट हो गए थे। टैक्सी  में बैठ कर उसने उसे पता बताया जो यश ने भेजा था। ‘मोक्ष धाम‘ काफी देर बाद एक नदी के पुल पर टैक्सी रुक गई, टैक्सी ड्राइवर ने इशारा किया, देखा ‘मोक्ष धाम का बोर्ड लगा था। अंदर गया तो उसने अपने को शमशान घर में पाया। वहाँ उसे यश दिखाई नही पड़ा, कुछ लोग खड़े थे और अभी-अभी एम्बुलेंस से मृत शरीर को निकाला जा रहा था, राहुल ने पास जाकर देखा तो वो किसी वृद्धा का शव था। तभी किसी ने उससे पूछा “क्या आप किसी बच्चे के संस्कार पर आये है?” राहुल की  हामी भरने वाली मुद्रा देख कर उसने उसे इशारे से अपने पीछे चलने को कहा। राहुल उस व्यक्ति के पीछे -पीछे चलने लगा। मुख्य स्थान के पिछवाड़े की ओर जहां वो उसे ले जा रहा था वो जगह इतनी गंदगी से भरी थी कि राहुल को चक्कर आने लगे वो बोला, “अरे भाई ये तुम मुझे कहाँ ले जा रहे हो?” राहुल को डर लगा। वो रुक गया। उसे शंका हुई। अजनबी देश में लूटपाट करेगा या अच्छे कपड़ों में देख कर उसका पर्स छीनेगा?
 
“शमशान तो सामने था।” “छोटे बच्चो को जलाया नही जाता, साब।”  खोखलापन लिए ख़ुश्क स्वर में वो बोला। “फिर क्या किया जाता है?” प्रश्न पूछ कर राहुल सिहर उठा था। 
“बारह साल से कम के बच्चो को जमीन में दफ़नाया जाता है।” राहुल के मस्तिष्क में अनेकों  प्रश्न एक  साथ उठ रहे थे ‘हिंदू धर्म में दफनाने की बात उसने आज से पहले कभी नही सुनी थी मुस्लिम धर्म में, ईसाई धर्म में जमीन में दफनाया जाता है, पारसी धर्म के बारे में स्कूल में टीचर ने बताया था, “पारसी धर्मानुसार वे अपने मृतकों को पक्षियों को खिला देते है, टावर ऑफ साइलैंस पर शरीर ड़ाल दिया जाता है।” उसे याद था कि लगभग पचास स्टूडेंटस की क्लास में एक भी पारसी स्टूडेंट नही था अतः बच्चो ने उनके इस विचित्र रिवाज पर प्रश्न पूछा था। 
“ऐसा वो क्यों करते है सर?” कोमल हृदय लड़कियाँ तो उबकाई करने जैसी हो गई थी।  “इसमें बुरा मानने की  कोई बात नही है। अपने-अपने धर्म की नीतियां हैं उनका मानना है कि हमारा शरीर व्यर्थ क्यों जाए अतः वे अंत समय तक अपने शरीर का सदुपयोग करने में आस्था रखते है, पक्षियों का भोजन बन कर।” आज राहुल को ऐसे विचित्र, मन द्रवित करने वाले ही ख्याल आ रहे थे। अच्छे विचारों ने तो जैसे अपना नाता ही उससे तोड़ लिया था। इस बार क्या -क्या देखना पड़ रहा था। पहले पापा और आज यह समय! दिल को थरथरा देने वाला क्षण! कच्ची बिना सड़क के रास्ते पर जंगली झाड़ के सिवा कुछ न था, टेढ़े -मेढे रास्ते पर चलते हुए वे एक स्थान पर रुक गए। थोड़ी दूर पर बीस -तीस लोगों का ग्रुप खडा था और उस ग्रुप में सबसे  लम्बा यश उसे दूर से  दिखाई पड़ा। बलिष्ट शरीर,उसके झुके हुए चौड़े कंधे, सिर  नीचे किये अपने मुड़े हाथ को देख रहा था। राहुल उसके पास आ खडा हुआ। यश की आधी मुडी हथेली में  एक सफ़ेद गुलाब का फूल सा चेहरा पड़ा था उसके छोड़े छोड़े पंखुरियों से कोमल भिंचे होठ, बंद आँखों की कोर पर बंद प्यारी पलकावली, भ्रमर के नन्हे बच्चे सी, उसका समूचा अस्तित्व इतना फ्रैजाइल, उसका चेहरा इतना छोटा जैसे कोई बड़ा मोती हो और यश की सीपीनुमा हथेली में सोया पड़ा हो। सफ़ेद शाल में लिपटा एक नन्हा सा शरीर, कोमल नाजुक परी को देख राहुल का कलेजा मुँह को आ गया। यश ने रीती आँखों से राहुल को देखा। तीस वर्ष का हृष्ट –पुष्ट नौजवान जिसे सिर्फ दो दिन पहले  मिला था वो एकदम साठ साल का कैसे हो गया? ये छह -फुट तीन इंच का व्यक्ति अचानक बौना कैसे बन गया?  वो उसका मित्र नही हो सकता, कोई और था शायद? अपने दोनों हाथ बढाए ‘रूही’ को गोद में उठाने के लिए, यदि ज़रा भी चूक हो जाती तो वो बेवजन उसकी हथेली से फिसल जाती जिसे उसने अपनी गोद में लेने की चेष्ठा की थी,उसका साइज़ इतना छोटा होगा कि यदि शाल में न लिपटा होता तो वो उसके हाथ के अग्रिम भाग के आधे हिस्से तक ही पहुँच पाता और वजन एक मुट्ठी परिंदों के पंखों  से भी कम!|
एक बार फिर राहुल ने अपने पिता को खो दिया! नम आँखों का समुद्र लिए,“रूही “ के नाना नानी, काकी, दादी, अपनी दीर्घ आयु से वितृष्णा कर रहे थे। डेढ़ दो फुट गहरे गड्ढे में नन्हीं सी जान को सदैव के लिए सुला दिया। ऊपर मिट्टी डाली और उस छोटी सी कच्ची कब्र को ईंटों  से ढक दिया। फूलों की माला से उसे सजाने असफल चेष्ठा की गई। मैला - कुचैला, सडा -गन्दा स्थान जहां रत्ती भर जमीन का टुकड़ा साफ़ नही था, जहां छोटे छोटे मिट्टी के टीले जिनके किनारे पर किसी बच्चे की फेडेड तस्वीर एलान करती हुई कि उस टीले के नीचे कोई दफ़न था। उसके पैर किसी वस्तु पर पड़ते पड़ते बच गए और ‘वह वस्तु ?’ ओह माँ! हे ईश्वर !  यदि अधिक ठहरा तो पागल हो जाएगा। आवारा कुत्ते उस ग्राउंड पर  और धरती आसमान के बीच काफी नीचे मंडराती चील, वे वहाँ क्यों थे? क्या उसको स्पष्ट रूप से कहना जरूरी था? राहुल ने कसकर यश को थामा, उसे सम्भालते हुए कार में बिठाया। जैसे ही दोनों मित्र कार में बैठे, यश के सब्र का बाँध टूट गया। रुंधी धीमी  भारी आवाज़ में फुसफुसाया,“रिया से क्या कहूँगा? उसकी बेटी को... वो अभी खुद आई.सी.यू . में है। उसकी दशा क्रिटिकल चल रही है परन्तु उसे ‘रूही’ के जन्म का पता है। इशारे से  \मुझसे उसके बारे में पूछती है। वो होश में है और कांच की खिडकी से मुझे देख कर अपना हाथ ऊपर करके सन्देश देती है कि वो ठीक है और फिर अपने पेट की ओर  इशारा कर, ‘रूही’ के बारे में पूछती है। मैं अपना अंगूठा ऊपर की ओर कर के ‘थम्स अप‘ कर देता हूँ। इतनी पीड़ा में भी मुस्कुरा पड़ती है। अब उसे क्या जवाब दूंगा?” यश के कंधे  कांप रहे थे। राहुल दोनों हाथो से उसके हिलते कंधे कस के पकडे बैठा था। 
इस समय यश की स्थिति ऐसी थी जैसे उसका अपना  मकान उसकी  आँखों के सामने किसी धमाके से तहस नहस हो गया हो। उसके चिथड़े उड़ गए हो और वो बेबस खडा - खडा अपनी बर्बादी का तमाशा देख रहा हो।
 
उनकी कार अस्पताल की ओर जा रही थी। ”एक बार रिया को मिल लूं।” राहुल ने इच्छा जाहिर की। “कोई फायदा नही अंदर किसी को नही जाने दे रहे हैं सिर्फ मैं जाता हूँ वो भी जब वे बुलाते है।”
“तुम दिल्ली चले जाओ मम्मी के पास। तुम्हे वहाँ संभालना है। दोनों दोस्त गले मिलकर रोये, उनके आँसू उन दोनों को भिगो रहे थे । अपने को यश से जुदा कर राहुल एअरपोर्ट की ओर चल दिया , परन्तु फिर न जाने उस पर क्या फितूर सवार हुया की उसने टैक्सी से ‘मोक्ष  धाम चलो” आदेश  दिया। वहाँ जा कर उसने उस दुर्दशा की तस्वीरे खींची और उसके रखवाले से बातचीत की। वहाँ कोई रखरखाव नहीं था।वहाँ न तो कोई चारदीवारी थी न कोई दरवाजा। सड़क के एक किनारे उथली नदी जिसके किनारे पर काफी दूर तक रेतीली खाई थी और दूसरी तरफ खुला  कच्चा मैदान जो कब्रगाह नही एक सार्वजनिक ‘शिट ग्राऊंड’ था। राहुल के मस्तिष्क पर जैसे कोई हथौड़े मार रहा हो। “ऐसे दफनाते है हम अपने नन्हे फरिश्तों को?”
उसी समय उसे न्यूयोर्क के पास बना एक खूबसूरत चर्च और उसके पीछे बनी सिमेट्री याद आई | एक-एक  दृश्य उसकी आँखों के सामने जीवित हो उठा। बेहद खूबसूरत बगीचा, पेड़, पौधे व् खास किस्म के फूलो से सजा कब्रिस्तान, ईसाईयों का कब्रगाह। कोमल छोटे हरे पीले पत्तों की झाड़ियाँ जिन्हें तरह तरह की शेप में काटा गया था। सबसे दर्शनीय थी वहाँ पर बनी कब्रें। वो भी नन्हे बच्चों को समर्पित विशिष्ट सिमेट्री थी। सब कब्रों पर पत्थर से शिल्पकारी की गई थ, कोई गुलाबी , कोई नीला कोई सफ़ेद। प्रत्येक की रोज सफाई होती थी। ताज़े फूलों से उन्हें सजाया जाता था और तो और उन कब्रों के नीचे दफ़न बच्चो के प्रिय खिलौने भी वहीं उनके पास रखे थे, टेडीबियर, किसी की गुडिया किसी की कार ,मानो वे रात को कब्र से उठ कर उनसे खेलते हो। जितने नाजुक वे जीते जी थे उतनी ही नजाकत से उन्हें वहाँ सुलाया हुया था।राहुल को याद आई उस एक खास कब्र की जिसके शीश पर एक परी की मूर्ति बनी थी जिसके हाथ में पुस्तक थी और वह कबूतर का पंख लिए कुछ लिख रही थी, उसमे लिखा था, “ A fairy wrote the story of your birth ,but she closed the book saying ‘you are too good for this earth”. ‘एक परी ने अपने हाथों तुम्हारे जन्म की कथा लिखनी प्रारम्भ की और यह कहते हुए पुस्तक बंद कर दी,“यह धरती तुम्हारे लायक नहीं!” गहरी सोच में उतरते चढ़ते कब वो एअरपोर्ट आ गया, उसे पता नही चला। टैक्सी ड्राइवर  ने उसकी तंद्रा भंग की। एअरपोर्ट में दाखिल हुया , टिकिट खरीदा,बैठ गया। 
 
टी.वी. स्क्रीन पर नई सरकार के बड़े -बड़े मंसूबे दिखाए जा रहे थे। देश वासियों की आँखों में सपने सजाये जा रहे थे। कह रहे थे कि विश्वस्तरीय सौ ऐसे नए शहर बसाए जायेगें जिनकी सानी जाने माने देशों से हो सके। तब क्या कई सौ किलोमीटर के घेरे में बनने  वाले इन शहरों में भूमि का कोई ऐसा टुकड़ा होगा जहां उन शानदार मकानों में रहने वाले जब मौत से साक्षात्कार करे तो उनकी अंतिम यात्रा भी उतनी ही सुखद हो, उतनी ही नजाकत से हो जितनी नजाकत से वे जियें है?  जीवित रहते जो कोमल फूलों पर चला हो, वातानुकूलित कमरों में जिसकी सुख सुविधा का पुरजोर इंतजाम किया जाता हो उसके  प्राणांत उसे उसकी देह को भी एक सुव्यवस्थित, दुर्गन्धरहित, स्वच्छ जल तरंग में प्रवाहित करने का इंतजाम नही होना चाहिए? आस्था का पालन करना यदि आवश्यक है तो ! मरणोपरांत ढेरों  विधियाँ की जाती है। उनकी पवित्र स्मृति चिन्ह अस्थियों को प्रवाहित करने के स्थानों पर व्यवसाय मात्र होता है जहाँ  जाकर श्रद्धा की जगह अश्रद्धा होती है। आस्था की धज्जियां उड़ जाती हैं! नदी के नाम पर कीचड गंदगी बदबू और मंडराते चील कौवे?
वो इस देश के  प्रधान मंत्री को पत्र लिखेगा। अवश्य पत्र लिखेगा उनसे पूछेगा कि क्या उनकी विकास योजना में "शमशान घाटों व् कब्रिस्तानों के लिए कोई स्थान है? ”
अमेरिका जैसा नही तो कम से कम एक चारदीवारी हो ,जहां आवारा कुत्ते सुरंग बना कर हमारे जिगर के टुकड़े को खोद कर न खा रहें हो। जहां एक फूलों का बागीचा हो जहां कदम कदम पर दिल दहलाने वाला एहसास न हो कि हम किसी की कब्र पर चल रहे है, जहां का रखवाला जो केवल नाम मात्र का रखवाला खुद अपनी गरीबी का रोना न रो रहा हो और लाचारी जताता हुया न कहे, “मेरे पास न तो रहने कि जगह है न रुपया पैसा, इन्हीं  लाशो के कपड़ों से तन ढक लेता हूँ साहब, रात को यहाँ शराबी, जुआरी, नशेड़ी तथा तांत्रिक आते है। रात को ये किस किस दुष्कर्म का अड्डा नही बनता?” क्या हम अपने मृतको को सम्मान जनक अंतिम प्रणाम नही कर सकते। “डिग्निटी -इन –डैथ", भी कुछ होती है! उसकी फ्लाईट में अभी दो घंटे का समय था। उसने अपना लैप टॉप खोला और लिखना आरम्भ किया;“ नन्हे फ़रिश्ते की कब्र पर....! 

- मधु
 
रचनाकार परिचय
मधु

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