प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
सितम्बर 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

विमर्श
संस्कृत एवं हिंदी दिवस की सार्थकता
- नीरज कृष्ण
 
भाषा अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है अर्थात जीवन के जितने भी दैनिक कार्य व्यापार हैं, गतिविधियाँ हैं, उन्हें भाषा के माध्यम से संपन्न किया जा सकता है। भाषा ही व्यक्ति को, समाज और राष्ट्र को एक सूत्र में जोड़ती है। भाषा अनुभूति को अभिव्यक्त करने का माध्यम भर नहीं है। भाषा सभ्यता को संस्कारित करने वाली वीणा एवं संस्कृति को शब्द देने वाली वाणी है। 'किसी भी राष्ट्र की सभ्यता और संस्कृति नष्ट करनी हो तो उसकी भाषा नष्ट कर दीजिए'। इस सूत्र को मैकाले ने भली भॉंति समझ लिया था।
 
प्रतिवर्ष 14 सितंबर को 'हिंदी दिवस' तो मनाया ही जाता है, साथ ही इसे विश्वभाषा के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने के लिए 10 जनवरी को 'विश्व हिंदी दिवस' भी मनाया जाता है। पिछले माह में 18 से 20 अगस्त  2018 को ही मॉरिशस में 11वें विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन किया गया था। कनाडा में 09 जुलाई से 13 जुलाई 2018 को 17वें  विश्व संस्कृत दिवस का आयोजन किया गया था। स्व. प्रधानमंत्री वाजपेयी जी के आग्रह पर सरकार ने 2001 से श्रावन माह के पूर्णमासी के दिन को ही 'संस्कृत दिवस' घोषित करते हुए उसके विकास हेतु प्रतिवर्ष आयोजन करने का निश्चय किया।
 
भाषा चाहे संस्कृत हो, हिंदी हो या अन्य भारतीय भाषाएँ हों या फिर विदेशी भाषाएँ, अपने समाज अथवा देश की अस्मिता की प्रतीक होती हैं। प्रामाणिक तथ्य है कि विश्व में सकल घरेलू उत्पादन में प्रथम पंक्ति के 20 देशों का समग्र कार्य उनकी अपनी मातृभाषा में ही होता है तथा साथ ही सकल घरेलू उत्पाद में सबसे पिछड़े 20 देशों में अध्ययन-अध्यापन एवं शोध कार्य आयातित विदेशी भाषा में होता है। आज हमें इस अभिप्रमाणित तर्क और सत्य को स्वीकार करना चाहिए कि किसी भी राष्ट्र की उन्नति और विकास का स्रोत मात्र पूंजी और तकनीकी नहीं, अपितु उस राष्ट्र की संकल्प शक्ति होती है और संकल्प शक्ति मातृभाषा से आती है किसी आयातीत भाषा के ज्ञान से नहीं। इजरायल के 16 विद्वानों ने नोबल पुरस्कार अपनी मातृभाषा हिब्रू भाषा में ही कार्य के आधार पर प्राप्त किया है। 
 
परन्तु आज स्थितियाँ भिन्न हो गयी हैं। हम हिंदुस्तानियों में अपने बच्चों को आयातित भाषा सिखाने की होड़ लगी हुई है। अँग्रेजी में बात करना शान की बात समझी जाती है। जिन घरों में माता-पिता अपने बच्चों से मातृभाषा में बात करते हैं, उन घरों के बच्चे अपेक्षाकृत अधिक मेधावी होते हैं। ब्रिटेन में हुए एक शोध के अनुसार जो बच्चे घर और स्कूल में एक ही भाषा बोलते हैं, उनका आईक्यू अपेक्षाकृत कम होता है। सुप्रसिद्ध 'यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग' (वर्कशायर, इंग्लैंड) के शोधकर्ता एवं एसोसिएट प्रोफेसर माइकल डालर कहते हैं- "जो बच्चे स्कूल में एक भाषा बोलते हैं, लेकिन घर-परिवार में अपनी मातृभाषा बोलते हैं, वे बुद्धिमता परीक्षा में उन लोगों के मुकाबले बेहतर करते हैं, जो केवल एक गैर मातृभाषा बोलते हैं।" शोधकर्ता के मुताबिक कि कम उम्र में अपनी भाषा में चीजों को समझना आसान होता है। इससे बाद में अन्य भाषा के शब्दों को सीखना भी सहज हो जाता है, क्योंकि उस वस्तु की समझ पहले ही विकसित हो चुकी होती है। इसके उलट अनजाने भाषा से ही शुरुआत करने पर समझने की क्षमता घट जाती है और यह कम आईक्यू होने का कारण बनता है।
 
दो या इससे अधिक भाषा बोलने वालों के मेधावी होने का कारण दिमाग में बढ़ी गतिविधि है। द्विभाषी लोगों के दिमाग के डोरसोलेटरल प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (डीएलपीएफसी)की सक्रियता बढ़ जाती है। यह हिस्सा संज्ञात्मक गुण जैसे चौकन्नापन या प्रतिक्रिया की क्षमता के लिए जिम्मेदार होता है। संज्ञात्मक ज्ञान को नियंत्रित करने वाला लेफ्ट इनफ्रीयर फ्रंटल गाइरस (लेफ्ट-आईएफजी) में मजबूत होता है। एक अन्य शोध में, जनरल ऑफ न्यूरोलॉजी (2012) में एक प्रकाशित लेख के अनुसार दो या इससे अधिक भाषा बोलने वालों में 77 साल की उम्र में अल्जाइमर के लक्षण दिखे। जबकि केवल एक भाषा बोलने वाले औसतन 71 साल की उम्र में ही इस बीमारी के शिकार हो गए। यह अध्ययन 200 अल्जाइमर्स मरीजों पर आधारित है।
 
किसी भी भाषा को वैश्विक स्वरूप उस समय प्राप्त होता है, जब वह अन्तराष्ट्रीय मंच पर प्रयोग में लाई जाती है। इसी के साथ उसका संसार के कुछ देशों में वहाँ के सरकारी कामकाज में भी प्रयोग किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ में संसार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और स्वीकृत अंतर्राष्ट्रीय मंच है। किन्तु हिंदी आज भी यहाँ की मान्यता प्राप्त अधिकारिक भाषा नहीं है। भारत के अतिरिक्त संसार के अनेक देशों में, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य भी हैं; वहाँ भारतवंशियों तथा हिंदी भाषियों की बड़ी संख्या है, वहाँ भी सरकारी कामकाज की हिंदी नहीं है। मॉरिशस, फीजी, त्रिनिदाद एवं टुबैगो, सूरीनाम जैसे देशों में जहाँ भारतवंशियों का लगभग बहुमत है, वहाँ भी सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग नहीं होता है। इस समय संयुक्त राष्ट्र संघ में 6 भाषाओं को अधिकारिक भाषा का स्थान प्राप्त है। वे भाषाएं- अंग्रेजी, फ्रांसीसी, स्पेनिश, रुसी, चीनी, और अरबी हैं।
 
11 विश्व हिंदी सम्मेलन संपन्न हो चुके हैं। इन सभी सम्मेलनों में संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने का संकल्प लगातार दोहराया गया है किंतु अभी तक कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला। संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा की मान्यता प्राप्त करने के लिए भारत को संघ के कुल 192 देशों में से आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन चाहिए। संसार में लगभग 190 से देश है, जहाँ भारतवंशी बसे हुए हैं। यह भी सही है कि लगभग 150 विश्वविद्यालयों में हिंदी किसी न किसी रूप में पढ़ाई जाती है। वैश्विक संदर्भ में इतने देशों में भारतवंशियों के बसे होने और इतने विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाने के बावजूद हिंदी की स्थिति संतोषजनक नहीं है। उसका एक बड़ा कारण यह है कि इस संबंध में भारत में पूरा मतैक्य नहीं है। देश में अनेक हिंदी भाषी राज्य ऐसे हैं, जिनकी इस संबंध में रूचि है न इच्छा।
 
भारत के संदर्भ में जब विचार करते हैं, तब हमें अत्यधिक दुःख और निराशा का सामना करना पड़ता है क्योंकि विश्व में सर्वाधिक आबादी वाले देश चीन से लेकर, अपेक्षाकृत अत्यन्त कम आबादी वाले देशों ने भी मातृभाषा के साथ-साथ राष्ट्रभाषा को न सिर्फ सुरक्षित, संरक्षित और सम्मानजनक स्थिति तक पहुंचाया है, अपितु वहाँ के नागरिकों में भी आत्मसम्मान की वृद्धि हुई है। इन राष्ट्रों के निवासी भाषा, विकास और विश्वास को लेकर किसी असमंजस्य में नहीं हैं। परन्तु 125 करोड़ से अधिक आबादी वाला देश भारत मातृभाषा में अध्ययन-अध्यापन और शोध की दृष्टि से विश्व में सर्वाधिक गरीब और कमजोर है।
कमोबेश यही स्थिति संस्कृत भाषा के साथ भी है। संस्कृत भाषा का अपना अपूर्व वैशिष्ट्य है कि इसका किसी के साथ कोई विरोध नहीं है। रामायण काल या इसके पूर्व वैदिक काल अथवा महाभारत काल या प्रागैतिहासिक काल से प्राप्त अनेक दस्तावेजों से बात के प्रमाण है कि जिन दिनों संस्कृत भाषा अधिकाधिक लोगों द्वारा समझी एवं बोली जाती थी, उन दिनों भारत कितना आगे बढ़ा हुआ था। नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय हमारी प्राचीन संस्कृति की धरोहर रहे हैं, जहाँ न केवल भारत अपितु अरब, चीन अन्य पाश्चात्य देशों के विद्वान आकर अपनी शिक्षा को प्रगाढ़ बनाते थे। इसलिए पाश्चात्य विद्वान कोल्ब्रुक ने भारतीयों को गुरु के रुप में स्वीकार किया है। (‘The Hindus where teachers but not learners.’)
संस्कृत सिर्फ हमारी अपनी ही भाषा नहीं थी बल्कि इसका पूर्ण प्रभाव दुनिया भर के तमाम भाषाओं के क्रमिक विकास पर भी रही है। संस्कृत का प्रभाव अंग्रेजी, रुसी, चीनी, मंगोल, पश्तो समेत इंडोनेशिया एवं यूरोपीय भाषा पर स्पष्ट रूप से दिखता है। संस्कृत भाषा भारत एवं दक्षिण-पूर्व एशिया में ही नहीं बल्कि यूरोप में भी विद्वानों का कंठहार बनी।
 
1789 में एक अंग्रेज जज विलियम जोंस ने महाकवि कालिदास कृत अभिज्ञान शाकुंतलम् का अंग्रेजी अनुवाद किया, जिसे यूरोपीय देशों में भेजा गया। इसे पढ़कर सारा यूरोप संस्कृत के आगे नतमस्तक हो गया और फिर धीरे-धीरे यूरोपीय ज्ञान इसी संस्कृत भाषा के दम पर विस्तार को प्राप्त होने लगा। इसी का परिणाम है कि 2 वर्ष बाद सन 1791 ई. में जर्मन विद्वान जार्ज फास्टन ने इस नाटक का जर्मन भाषा में अनुवाद किया, जिसे पढ़कर जर्मनी के राष्ट्रकवि गेट नाच उठा और भारत दर्शन के लिए छटपटाने लगा। गेटे ने अभिज्ञान शाकुंतलम की प्रशंसा में लिखा- "हे मित्र! यदि तुम वासंती युवावस्था में मनोरम पुष्प और ग्रीष्म तुल्य प्रोढ़ावस्था के उत्तमोत्तम फूल और ऐसी ही आत्मा को प्रभावित करने वाली सामग्रियाँ एक ही स्थल पर ढूंढना चाहते हो तो अभिज्ञान शाकुंतलम् पढ़ो, उसमें पहुंचकर न केवल तुम्हारी आत्मा संतुष्ट और शांत होगी, प्रत्युत तुम्हें स्वर्ग और मर्त्यलोक की सकल समृधियाँ भी वहाँ एक ही जगह मिल जाएँगी।"
मैक्स मूलर ने संस्कृत पर जितना अधिक कार्य किया, उतना शायद ही किसी विदेशी विद्वान ने किया हो। रूसी विद्वान प्रोफेसर बोन गार्द लेविन को सबसे अधिक दुख इस बात का हुआ कि 'भारत के लोग गीता, महाभारत तथा योग आदि का अध्ययन अंग्रेजी के माध्यम से करते हैं। भारतीय स्वयं संस्कृत पढ़कर अपने देश और इतिहास को समझने के बजाय विदेशियों का मुँह ताकते हैं कि वे अंग्रेजी में गीता, रामायण आदि पढाएं, इस स्थिति को बदला जाना चाहिए।' विद्वान विल्ड्युराने ने  ‘our Oriental heritage’ में लिखा  है- 'भारत हमारी जाति का मातृ देश रहा है और संस्कृत समस्त यूरोपीय भाषाओं की जननी। भारत माता अनेक प्रकार से हम सब की माँ है।' (India was the mother of our race and Sanskrit the mother of European languages., she was the mother of our philosophy. Mother India in many ways is the mother of us all.)
 
आज हम जिस अंग्रेजी की वकालत में हिंदी और संस्कृत को भूल जाते हैं, उसी अंग्रेजी को देने वाला इंग्लैंड संस्कृत और हिंदी को बढ़ावा देता है। इंग्लैंड में संस्कृत का पठन-पाठन ऑक्सफोर्ड, कैंब्रिज, लंदन तथा एडिनबरा में प्रारंभ हुआ और आज भी सफलतापूर्वक चल रहा है। निःसंदेह न सिर्फ भारत और उप-महाद्वीप में अपितु संपूर्ण विश्व में भारत के गौरव एवं ज्ञान संपदा और ज्ञान परम्परा को संप्रेषित करने तथा संवर्धित करने की क्षमता हिंदी और संस्कृत भाषा में है। तभी तो विश्व के 170 देशों में किसी न किसी रूप में हिंदी भाषा पढ़ाई जाती है। आज विश्व के 32 से अधिक विश्वविद्यालयों में संस्कृत भाषा का अध्ययन हो रहा है। आज एक मैकाले तो संसार से चला गया, किंतु अनगिनत स्वदेशी मैकाले भारत को खोखला करने पर तुले हुए हैं। अतः आज आवश्यक है कि हम आदर तो विश्व की सभी भाषाओं का करें, सभी को पढ़ें, सभी को सीखें, सभी से लाभ लें, अपने देववाणी एवं मातृभाषा के प्रति वफादारी को कदापि न भूलें। यही स्वाभिमान है, यही राष्ट्रभक्ति है और यही राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत का चरमोत्कर्ष है। तब ही हिंदी दिवस या संस्कृत दिवस के आयोजन की सार्थकता सिद्ध होगी।

 


- नीरज कृष्ण