प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख
प्रगतिशील कविता और त्रिलोचन
- रणजीत कुमार सिन्हा
 
त्रिलोचन नागार्जुन और केदारनाथ के समकालीन सहयोगी हैं। त्रिलोचन की कविताओं का केंद्र लोक है। हिन्दी भाषी अंचल की जातिय चेतना के कवि हैं त्रिलोचन। उनकी कविताओं का विशेष गुण है- सादगी, किसानों-सा बातूनीपन, लोकजीवन से गहरी सम्पृत्ति, भावों पर कड़ा नियंत्रण, कम शब्दों में अनेक बातों को कह देना, त्रिलोचन हिंदी भाषी क्षेत्र में बोल-व्यवहार में वे काव्य रचना करते हैं– "मैं तुमसे/ तुम्हीं से बात किया करता हूँ/ यह बात मेरी कविता है।"1
त्रिलोचन की कविताएँ नेहरु और उनके लोकतंत्र के दौर में साँस लेती दिखाई देती है। लोकतंत्र एक ख़ुशफ़हम था उस समय जनता को स्वाधीन भारत में बहुत कुछ आशा-आकांक्षाएं थीं। उस वक़्त बहुत सारे प्रगतिशील, मार्क्सीय चेतना वाले कवि प्रगतिशीलता की सीमा तोड़कर अभिनन्दन ग्रन्थ की रचना कर रहे थे। संसद की सदस्यता से अलंकृत हो रहे थे। दूसरी ओर त्रिलोचन सामान्य आदमी के जीवन और संघर्ष तथा समाज की असंगतियों और विडम्बनाओं को अत्यंत सादगी से काव्य बद्ध कर रहे थे। गाँव के किसान का चित्र देखिए– "वे सींच रहे जग-जीवन/ जन हित में उनका तन-मन/ वे फिर भी निर्बल, निर्धन/ विश्वास न उनको अपना/ वे अपनेपन से उन्मन।"2 यहाँ पर किसान और उसकी पत्नी अपने खेतों को नहीं बल्कि जनजीवन को सींच कर हरा-भरा बनाने में प्रयत्नशील है।
 
त्रिलोचन की कविता आम जन की कविता है। आम जन से जुड़कर त्रिलोचन 'नगई महरा' शीर्षक कविता की रचना भी करते हैं, जहाँ आदमी की सच्ची पहचान हमें दिखाई पड़ती है–
 
आदमी बात से व्यवहार से
पहचाना जाता है
समाज ही आदमी को आदमी से जोड़ती है3
 
त्रिलोचन अपनी कविताओं के माध्यम से सामजिक असमानता की ,अंधविश्वासों,रुढियों एवं धर्माचार की ,राजनितिक शोषण एवं आर्थिक विषमता की दीवारों को ढाहने के लिए संघर्ष करने के लिए एक जुटता का संदेश देते हैं- “ दीवारें चरों ओर खड़ी हैं /तुम चुपचाप खड़े हो /धक्के मारों /और ढहां दे ,उद्दयम करते कभी न हारे /ऐसे –वैसे आघातों से /स्तब्ध पड़े हो /किस दुबिधा में /हिचक छोड़ दो जरा कड़े हो |”4
त्रिलोचन समाज को नवीन एवं स्वास्थ्य स्वरुप प्रदान करने के लिए उसके विविध पक्षों पर व्यंग्य करते हैं | ‘गुलाब और बुलबुल’ काव्य संग्रह में हम उनके व्यंग्य को देख सकते हैं | राजकीय सम्मान प्राप्त व्यक्तियों पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं – “ पद्मविभूषण जो हँसे हँसते रहे / हम जो लहरों में फँसे-फँसते रहे / बाघ बूढा और कड़ा सोने का /लोग दलदल में फँसते रहे |”5
 
पूंजीवादी व्यवस्था में अर्थ को सबसे अधिक प्रमुखता देते हुए मानवीय मूल्यों को जिस तरह से अवमूल्यन किया है | उस पर त्रिलोचन जोरदार प्रहार करते हैं : गरीबी और अमीर के बीच विषमता की खाई कितनी अधिक बढ़ी है वह आज हमारे सामने हैं | अर्थ को प्रधानता मिलने के कारण लोक संस्कृति आज अर्थ संस्कृति में बदलता नज़र आ रहा है | पैसा के सामने लोगों का नैतिक पतन इस कदर हुआ है कि लोग पैसा के लिए अपना सब कुछ बेचने को तैयार है –“ कल जो कहता था ईमान नहीं बेचूँगा / वह चुपके ईमान बेचकर घर आया है / क्या करता परिजन है संतति है ,जाया है / मन को समझा दिया |”6
नवऔपनिशवाद व्यवस्था में मानव किस तरह मूल्यहीनता को स्वीकार करने हेतु विवश है | इसका भी चित्रण त्रिलोचन के काव्य में देखने को मिलता है –“ अब मनुष्य का /सिन्धु में बिंदु का जो स्थान है /वह भी स्थान नहीं |”7
धन के प्रभाव में आकर चिंतक और समीक्षक किस तरह से जिम्मेदारी से विमुख होकर दरबारी राग गाते हैं | ऐसे महानुभावों पर तीखा व्यंग्य त्रिलोचन करते हैं –“ यहाँ तो जिसने जिसका /खाया ,उसने उसका गाया / दूध दुहेगा, जिसने अच्छी तरह चराया |”8
पूंजीवादी सभ्यता की धज्जियाँ उड़ाते हुए कवि त्रिलोचन लिखते हैं –“ पूंजीवाद जिस डाल पर बैठता है /वही डाल काटता है /सर्वनाश करता है स्वमेव /सांप के समान कुछ पूंजीपति /अपने बिप-बल का आंतक फैलाए शेष रह जायेंगे|”9
 
त्रिलोचन काव्य व्यापार में शब्द की सत्ता पर विशेष बल दिया है | बड़ी-बड़ी बातों को उलक्षे शब्द में कहना उनके स्वभाव के प्रतिकूल है | जो भाषा परिव्यक्त है वहीँ जन –सामान्य के निकट है | भाषा के शब्द बिना आवरण के अपनी सार्थकता सिद्ध करते हैं | शोषित समाज को स्वप्न लोक निर्मित करने वाले शब्दों की आवश्यकता नहीं होती है | त्रिलोचन प्रचलित शब्दों को मानवीय जीवन के संवाद का माध्यम बताते हैं | 
“त्रिलोचन ठेठ अवध के कवि है और फलत: अवधी बोली की सर्जनात्मक क्षमता से खड़ी बोली को अधिक आत्मीय और व्यंजनात्मक बनाने के आग्रही भी | इनके भाषाई आदर्श तुलसीदास है |”10
त्रिलोचन इसी समाज में घुंसकर ,डूबकर मानव पीड़ा के बीच जीवन की सार्थकता अन्वेषित करते हैं | दुःख जीवन का कटु सत्य है | एक पैना यथार्थ है जिसकी पहुँच से कोई बाहर नहीं है | जब सम्मुख अन्धकारमय अपरिचित विश्व हो ,सुख की कल्पना अयथार्थ प्रतीत होती है|
“दुःख के वाणों से विद्या हृदय जिसका हो / वह सुख को क्या समझेगा / उसका सुख तो एक कल्पना सारहीन है /दृग सम्मुख तो एक अपरिचित विश्व पड़ा है /वह किसका हो |”11
 
प्राकृतिक आपदाओं को भारतवर्ष में उत्सव के रूप में देखना प्रशासन और अधिकारियों की लत है | एक ओर दुर्भिक्ष एवं अकाल से विशाल जनसमुदाय त्रस्त होता दिखता है | तो दूसरी ओर धनलोभी ,अर्थ पिपासु अपनी स्वार्थ साधन करते दिखते हैं | इन स्वार्थी समाज के लोगों के आचरण पर व्यंग्य करते हुए त्रिलोचन लिखे हैं- “झूरी बोला कि बाढ़ क्या आई /लीलने अन्न को सुरसा आई / अब की श्रीनाथ तिवारी का घर / पक्का बनने की सुविधा आई|”12
यह हालात आजादी के साथ दसक बाद भी है | आज बल्कि व्यापक पैमाने पर है | त्रिलोचन अपने काव्य में मजदूर और श्रमिक वर्ग मार्मिक अपराजेय जीवन को अभिव्यक्त प्रदान करते हैं – “भाव उन्हीं का सब का है जो ये अभावमय / पर अभाव से दबे नहीं जागे स्वभावमय|”13
त्रिलोचन मनुष्य को परिस्थितियों से लड़ने के लिए प्रेरणा देना चाहते हैं | परिस्थितियों से घिर कर भी पंजे लड़ाने का संकल्प वितरित करना चाहते हैं –“ लड़ता हुआ समाज नई आशा अभिलाषा / नई चित्र के साथ नई देता हूँ भाषा |”14 `
 
त्रिलोचन स्वंय को उस जनपद का कवि मानते हैं जहाँ भूख ही सबसे बड़ा सत्य हो ,जहाँ व्यक्ति की यथार्थता अपनी नग्रता में उपस्थित होती हों –“ उस जनपद का कवि हूँ / जो भूखा है / नंगा है अंजान है /कला नहीं जानता /कैसी होती है क्यों है / वह नहीं मानता / कविता कुछ भी दे सकती है / कब सूखा है /उसके जीवन का सोता |”15
सन1953 ई. में प्रगतिशील संघ विघटित हो गया | त्रिलोचन बहुत दुखित और हताश हुए | कुछ सच्चे प्रगतिशील ,प्रगतिशील ही नहीं रहे | इससे दुखी होकर त्रिलोचन ने लिखा था- “ प्रगतिशील कवियों की नई लिस्ट निकली है / उसमें कहीं त्रिलोचन का तो नाम नहीं था / आँखे फाड़-फाड़ कर देखा ,दोष नहीं था पर आँखों का /सब कहते हैं प्रेस छली है /शुद्धि पत्र देखा उसमें नामों की माला छोटी न थी / यहाँ भी देखा कहीं त्रिलोचन नहीं |”16
सच्चे प्रगतिशील जनवाद के पैरोकार होने के नाते इनको भी वागी और दल विरोधी करार देता है तत्कालीन प्रगतिशील जमात |
निष्कर्षत: हम त्रिलोचन के काव्य में प्रगतिवादी द्रष्टिकोण को सभी स्थान पर पाते हैं | समाज में व्याप्त हक़दार और हकमार की व्यवस्था से अवगत कराती है | अपने हक़ के लिए समाज को अवगत करता है | आजादी के सात दसक के बाद भी आज भारतीय समाज की वर्तमान हालात से अवगत कराता है | त्रिलोचन का काव्य प्रगतिशील कवियों में नया आत्मविश्वास एवं धरती के जन-जीवन से जुड़ने की प्रेरणा देती हैं |
 
 
सन्दर्भ सूची :-
1.त्रिलोचन ,प्रतिनिधि कविताएँ ,संपादक-केदारनाथ सिंह ,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली ,1985 ,पृष्ठ- 28
2.प्रगतिशील कविता कल और आज ,डॉ रतन कुमार पांडेय ,विश्वविद्यालय प्रकाशन ,1987,पृष्ठ-23
3.त्रिलोचन ,नगर महरा 
4.त्रिलोचन ,प्रतिनिधि कविताएँ ,संपादक केदारनाथ सिंह ,राजकमल प्रकाशन ,1985 ,पृष्ठ-70
5.गुलाब और बुलबुल ,त्रिलोचन ,वाणी प्रकाशन ,नई दिल्ली ,1985 ,पृष्ठ-16
6. फूल नाम है ,त्रिलोचन ,राजकमल प्रकाशन ,1985 ,पृष्ठ-46
7.धरती,त्रिलोचन, प्रदीप प्रेस ,मुरादाबाद ,1945,नीलाभ प्रकाशन ,पृष्ठ-84
8.ताप के ताए हुए दिन ,त्रिलोचन,राजकमल प्रकाशन ,पृष्ठ- 50
9.धरती,त्रिलोचन.नीलाभ प्रकाशन ,इलाहाबाद ,1977
10.सन्मार्ग ,कोलकाता -2018 ,फ़रवरी अंक,रविवार 
11. नये कवि और उनकी कृतियाँ ,डॉ दीनदयाल शुक्ल ,के.के.पब्लिकेशन ,2001,पृष्ठ-42
12. मेरा घर ,त्रिलोचन ,राजकमल प्रकाशन ,2002,पृष्ठ-57
13.दिंगत ,त्रिलोचन ,राजकमल प्रकाशन ,नई दिल्ली ,1957 ,पृष्ठ-67
14. वही पृष्ठ-24
15. उस जनपद का कवि हूँ ,त्रिलोचन ,राधा कृष्ण प्रकाशन ,नई दिल्ली ,1981,पृष्ठ-17
16.त्रिलोचन,प्रतिनिधि कविताएँ ,संपादक ,केदारनाथ सिंह ,राजकमल प्रकाशन ,1985,पृष्ठ-105

- रणजीत कुमार सिन्हा
 
रचनाकार परिचय
रणजीत कुमार सिन्हा

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