प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कथा-कुसुम

कहानी - तोता उड़

 

तोता उड़
चिड़िया उड़
मोर उड़
गाय उड़

अरे नासपीटी, इतनी बड़ी हो गयी है, और अभी तक गाय, गधे, तोते उड़ा रही है! 
चलो, तो फिर अम्मा उड़।
रतन ने अपने माथे पर हाथ मारा। उसके नैन सजल हो उठे। कैसे सम्भालेगी अपनी इस अर्ध -विक्षिप्त सोन परी को। दिमाग छ: आना कम, रूप द्विगुणित। जैसे बिना दाग का चँदा-गोल, सुन्दर ,शफ्फाक। इतना रूप कि आँखें चौंधिया जायें। जब दिमाग ऐसा दिया तो दाता चेहरा भी ऐसा ही दे देते।रंग ही काला होता या भैंगी ही होती...या...या...ये या खतम होने का नाम ही नहीं ले रहा। ऊपर से खुदा की मार! दो साल पहले बाप भी मर गया।गरीबी इतनी कि एक समय खाओ तो दूसरी जून का पता नहीं। वाह रे दाता! तेरी लीला अपरम्पार, जिसे देता है छप्पर फाड़ के देता है।
किस सोच में पड़ गयी अम्मा, चल ना खेलते हैं। 
जिद न कर मैना , मेरी तबियत ठीक ना है। 
क्या हुआ, क्या हुआ कहकर पगलिया जमीन पर दुहरी हो गयी।
अरे! उठ बिटिया, कुछ नहीं हुआ है, बस थोड़ा माथा दु:ख रहा था।
तू मर तो नहीं जायेगी अम्मा? ला तेरा माथा दबा दूँ । कहकर पगली ने उसका माथा इतनी जोर से दबाया कि रतन को लगा, उसकी दोनों आँखें टप्प से निकल कर बाहर आ जायेंगी।

अरी छोड़, मैं खुद ना मरूँगी पर तू मुझे मार ड़ालेगी । जा तेरे गाय और तोते को उड़ा रानी। अम्मा को सोने दे । पन्द्रह साल की रानी बिटिया फिर तोते उड़ाने में लग गयी ।रतन हाथ -पैर ढ़ीले छोड़ कर भूमि पर ही पसर गयी। आँखों के कोरों से दो बूँदें निकल कर जमीन को सिक्त कर गयीं।

 

आज हलवाई के यहाँ बरतन माँजने भी नहीं जा पायेगी। नहीं जायेगी तो चूल्हा कैसे जलेगा। हलवाई उसे महीने के नहीं दिहाड़ी के पैसे देता है। काम करे और पैसे ले जाये। ये बड़ी बड़ी कड़ाही, कलछुल, परात माँज - माँज कर रतन के हाथों में छाले पड़ जाते हैं। हलवाई कभी कभी पैसों के साथ उसके हाथ में बर्फी या इमरती रख देता है। छालों पर नजर पड़ते ही बोल उठता है- तू कब तक पिसेगी रतन, अपनी बिटिया को भेज दिया कर। इतनी बेवकूफ ना है रतन। मक्कार की मक्कारी पहचानती है। मैना को दुनिया की बुरी नजरों से बचाकर रखा है उसने। काम पर जाती है तो ताले में बन्द कर के जाती है। घिसते-घिसते मिट्टी में मिल जायेगी पर अपने कलेजे के टुकड़े को मैला नहीं होने देगी।


"अम्मा भूख लगी है"

"डिब्बे में से निकाल कर खा ले"

इस मामले में निपुण है छोरी, डिब्बा खोल कर रोटी निकाल ली। एक कटोरी में नमक मिर्च में पानी मिलाकर चटनी जैसी बना ली। पानी के घूँट के साथ रोटी गटकती इतने सलीके से खा रही थी कि कोई अन्जान देखे तो कह ही नहीं सकता कि उसमें बुद्धि की थोड़ी कमी है। रतन का मन भर आया। ऐसे चाँद के टुकड़े का जनम तो महलों में होना चाहिए था। ऐसा रूप और ऐसे दरिद्र घर मे अवतार ऊपर से कुछ पागल। न जाने किन कर्मों का फल भुगतने आयी है छोरी।


दिन बीतते गये। रतन हलवाई के घर बरतन घिसती रही। मैना बंद दरवाजे में तोते उड़ाती रही। करती भी क्या, उसे तो बस एक यही खेल आता था।छोटी थी तब पास - पड़ोस के बच्चों के साथ खेलते हुए सीख गयी थी। बड़ी हुई तो जैसी उसकी अवस्था थी, रतन ने उसे कभी बाहर नहीं जाने दिया।
दिन बदले, मौसम बदले, पत्तों का रंग हरा होने लगा, पलाश दहका उसके साथ ही मैना के गालों का रंग भी गुलाबी हो गया। अब तोते उड़ाने में उसे कुछ संकोच होने लगा। मैना खोई- खोई सी रहने लगी। रतन काम के बोझ तले कुछ समझ ना सकी। अर्ध-विक्षिप्त थी पर कामनाएं तो पागल ना थीं।वह तो मन में वैसे ही हिलोरें ले रहीं थीं जैसे किसी भी दूसरी लड़की के मन में लेती हैं।


पहले उसने कभी कमरे की खिड़की नहीं खोली थी, अब रतन के जाते ही मैना बाहर कुछ ढूँढने का प्रयास करती है। दूर एक छोटी सी चाय की रेकड़ी है। इतनी प्रसिद्ध कि बड़े- बड़े धनवान घरों के लड़के- लड़कियाँ भी वहाँ चाय पीने आते हैं और छोटे-छोटे स्टूल पर बैठे घंटों बतियाते रहते हैं। मैना कितनी ही देर तक उन्हें अपलक देखती रहती। किन्ही अबूझे पलों को वह ढूँढ रही थी। उसे तो वह न मिला पर किसी की नजरों में वह अप्रतिम सौंदर्य बस गया। अब वह खिड़की खुलने का इन्तजार करता और उसे निहारता रहता। न जाने उसके कितने चित्रों में वह जीवन्त हो उठी।
रतन के घर से जाते ही कब उसके ताले की डुप्लीकेट चाभी बनी, कब मैना की देह को अनबूझे, अदभुत रहस्य का पता लगा, रतन इस विषय में कुछ न जान सकी। बस इतना देखती थी कि अब उसकी सोनपरी तोते और गाय उड़ाने की जगह आईने में अपना अक्स देखकर लजाती रहती। 


"अरे ओ लाजवन्ती, क्या निहार रही है? ‘ तुझे शीशा देखने की जरूरत ना है।" 
"हैं? क्यों ना है, वो कहता है - तू आईना मत देखना , किरचें पड़ जायेंगी।" 
"कौन? कौन कहता है?" 
रतन की पूरी देह सावधान की मुद्रा में खड़ी हो गयी। 
"और ये कौन सी भाषा है?" पगलिया ने जीभ दाँतों तले दबा ली। आखिर इतनी पगली भी न थी। 
गाय उड़
चिड़िया उड़
शीशा उड़
"किसकी बात कर ही थी, इधर देख मैना, बोल ना"
तोता, और कौन! रोज उड़ाती हूँ तो एक दिन बोल रहा था, शीशा न देख। मन ही मन हँसी रतन। अपनी इस भोली- भाली के बारे में क्या- क्या सोच बैठी। तोते उड़ाते-उड़ाते मन में एक जीती जागती छवि उगा ली है पगली ने।


दिन आते रहे, दिन जाते रहे। पगली अब पगली ना रही। रतन को एक आस बँधी। अचानक चाय की रेकड़ी बन्द हो गयी। साथ ही डुप्लीकेट चाभी भी किसी से खो गयी। खिड़की बंद हुई, आईना धुँधला होकर किरचें-किरचें बिखर गया। बहुत दिनों से मैना की तबियत ठीक नहीं है। ना ढंग से खाती है, ना बोलती है ना खेलती है। 
रतन को भय सता रहा है, भय की उस स्थिति में उसने मैना का हाथ पकड़ा और बड़बड़ायी, "ठीक हो जा मेरी बिटिया। तुझे क्या हो गया है। मैं आज हूँ कल नहीं। मैं ना रहूँगी तो तुझे कौन सम्भालेगा?" अर्धविक्षिप्त अवस्था में पगली ने कहा "चन्दर, और कौन! चन्दर रखेगा मेरा ध्यान और तेरा भी।" 
ये तो पागल नहीं थी। रतन की आँखों में भय थरथरा रहा था। शाम गहरी और काली हो चली थी। खाली आँखों से रतन ने मैना को देखा। वह कुछ बोल रही थी। 
तोता उड़ 
चिड़िया उड़
गाय उड़
अम्मा उड़
चन्दर उड़

मैना उड़

.....और उसी के साथ मैना अपने पंख पसार खुले विस्तृत आकाश में हमेशा के लिए उड़ गयी!


- निशा चंद्रा
 
रचनाकार परिचय
निशा चंद्रा

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कथा-कुसुम (1)