प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

फिल्म समीक्षा
एक शुक्रवार तीन उम्मीदें
 
अगस्त का महीना ऊपर से सावन, आ हा ! और ऐसे में एक साथ एक ही दिन तीन-तीन फ़िल्में रिलीज हों और तीनों ही कहानी, अभिनय आदि के मामले में एकदम भिन्न और आला दर्जे की तो ऐसे में वीकेंड शानदार गुजरेगा ही। हालांकि अभिनय और कहानी के मामले में मुल्क बाकी दोनों फिल्मों कारवाँ और फन्ने खां से 21 ठहरती है। फन्ने खां में निर्देशन के मामले में कुछ जगह भारी चुक हुई है तो वहीं कारवाँ को इमरान खान के कैंसर की बीमारी ने सहारा दिया है तो मुल्क हिन्दू और मुस्लिम के बीच प्रेम सद्भाव को बढाने के साथ-साथ कट्टरपंथियों में अलगाव भी पैदा करती है। 
 
 
अगस्त महीने की पहली रिलीज है इश्का फिल्म्स के बैनर तले बनी कारवाँ जिसे डायरेक्ट किया है आकर्ष खुराना ने और इस फिल्म के लेखक हैं - बिजॉय नाम्बियार, आकर्ष खुराना और हुसैन दलाल। कारवाँ फिल्म में अभिनय करने वाले कलाकार हैं -  इरफान खान, दुलकर सलमान, मिथिला पालकर और कृति खरबंदा। इस फिल्म के  निर्माता हैं - रॉनी स्क्रूवाला और इसमें संगीत दिया है - प्रतीक कक्कड़, अनुराग सेकिया, स्लोचीता, श्वेतांग शंकर, इमाद शाह ने।
 
यह फिल्म तीन ऐसे लोगों की कहानी हैं जो एक दूसरे से पूरी तरह से अनजान हैं । जब ये अकेले, अनजान लोग एक ऐसे मोड़ पर आपस में मिलते हैं तो शुरू होता है फिल्म का कारवाँ । कारवाँ एक उर्दू शब्द है जिसका अर्थ होता है सिलसिला या यात्रा। यह फिल्म इन तीन लोगों की यात्रा ही है । फिल्म में अविनाश राजपुरोहित (दुलकर सलमान) एक आईटी कंपनी में काम करता है, जहाँ उसका काम में मन नहीं लगता फिर एक दिन उसके पास फोन आता है कि उसके पिता एक एक्सीडेंट में मारे गए हैं। जब वो अपने पिता की बॉडी लेने जाता है तो उसे गलती से किसी और की बॉडी मिल जाती है। अब वो सही बॉडी लेने और गलत बॉडी देने अपने दोस्त शौकत (इरफान खान) के साथ बैंगलुरू से कोच्चि जाता है। बस यहीं से असल कहानी शुरू होती है और पूरी फिल्म कुछ दिन पहले आलिया भट्ट अभिनीत फिल्म हाईवे की याद दिलाती है। हालांकि इस सफर में हाईवे के साथ-साथ बहुत कुछ सुहाना दर्शकों को देखने को मिलता है और बहुत सारे सबक भी। फिल्म में कुछ एक जगह को छोड़ दें तो इरफान खान की बेहतरीन कॉमेडी के साथ-साथ दुलकर सलमान और मिथिला पालकर की भी बेहतरी एक्टिंग देखने को मिलेगी।
 
इस फिल्म में हँसाने गुदगुदाने के अलावा ऐसा बहुत कुछ है जिसे आप और हम शायद ही कभी असल दुनिया में कर पाएं मसलन डेडबॉडी के पास बैठकर सिगरेट पीना या फिर अंतिम संस्कार होते ही मटन-कोरमा की पार्टी करना। इन्हीं सब एक्स्ट्रा के चलते फिल्म कारवां बिखरती भी है, बनती भी है, बिगडती भी है। स्क्रिप्ट के साथ-साथ निर्देशन में थोड़ी सी और कसावट फिल्म को लम्बे समय के लिए यादगार बना सकती थी। सिनेमेटोग्राफर अविनाश अरुण ने कैमरे का बेहद उम्दा फ्रेम भी फिल्म में बनाया है  निर्देशक आकर्ष खुराना ने इसमें कुछ दिलचस्प मोड़ देकर इतने सारे घटनाक्रम एक साथ जोड़े हैं कि उन्हें घटते देखकर मजा आता है। मलयालम फिल्मों के सलमान खान कहे जाने वाले इस चॉकलेटी हीरो दुलकर सलमान को हिंदी फिल्मों में पहली बार देखकर सहज अंदाजा लगाना मुश्किल है कि वे पहली बार काम कर रहे हैं और उनकी हिंदी भी काफ़ी काबिलेतारीफ कही जा सकती है।
 
जैसा कि पहले कहा कारवाँ का अर्थ है- यात्रा । तो यात्राओं पर निकलने से यात्रा का सुख ही नहीं बौद्धिकता के स्तर पर भी बहुत कुछ पाया जा सकता है। एक यात्रा आपको बहुत कुछ सीखा कर जाती है तो उम्मीद है यह यात्रा भी दर्शकों को बहुत कुछ सीखा कर जाएगी। बॉक्स ऑफिस की बात करें तो फिल्म का बजट लगभग 20 करोड़ है और इसे लगभग 1000 स्क्रीन्स में रिलीज किया गया है तथा फिल्म के निर्देशक थिएटर से भी ताल्लुकात रखते हैं और हाल ही में उन्होंने 'हाई जैक' फिल्म भी  बनाई थी, जिसे बॉक्स ऑफिस पर खास तवजो नहीं मिल पाई थी लेकिन अबकी बार जब उनकी फिल्म कारवां का ट्रेलर रिलीज किया गया तभी से फिल्म को देखने के लिए दर्शकों में खासा उत्साह था। इस फिल्म ने पहले दो दिनों में तकरीबन 1,8 करोड़ की कमाई की है। सिनेमा विशेषज्ञों और ट्रेड एनालिस्टों के मुताबिक़ यह फिल्म लाइफ टाइम 20-25 करोड़ का कारोबार कर सकती है।
 
 
 
अगस्त महीने के पहले ही शुक्रवार को रिलीज हुई दूसरी फिल्म है निर्माता निर्देशक भूषण कुमार, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, अनिल कपूर की फन्ने खां। जिसके निर्देशक हैं अतुल मांजरेकर और इस फिल्म में अभिनय करने वाले कलाकार हैं अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय बच्चन, राजकुमार राव, दिव्या दत्ता, पिहू सैंड और गिरीश कुलकर्णी। फिल्म में संगीत दिया है अमित त्रिवेदी और तनिष्क बागची ने।
 
अगस्त के पहले ही शुक्रवार को तीन फिल्में रिलीज हों तो थोड़ा सोचना पड़ता है आप किसे महत्व देते हैं, कहानी को, अदाकारों को जिन्होंने उस फिल्म में भूमिका निभाई है या निर्माता, निर्देशक। कई बार आशिकी 3 जैसी फिल्मों के लिए भी सिनेमा का रुख किया जाता है जिनकों देखने के बाद पता चलता है गाने के अलावा इसमें कुछ है ही नहीं। कुछ ऐसी ही है इस हफ्ते की पहली रिलीज फन्ने खां। फन्ने खां का गाना ‘अच्छे दिन’ वर्तमान सरकार पर तंज कसता हुआ सा लगे तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। 
खैर! फिल्म की बात करें तो यह एक अंग्रेजी फिल्म ‘एवरीबडीज फेमस’ का ऑफिशियल हिंदी रीमेक बताया गया है।  जो  साल 2000 के अकैडमी अवार्डस की बेस्ट फॉरेन फिल्म कैटेगरी के लिए नामित की गई थी। उस फिल्म को तो मैंने देखा नहीं लेकिन फन्ने खां को देखकर लगता नहीं यह उसका ऑफिशियल रीमेक होगा। कहीं न कहीं यह कुछ दिन पहले रिलीज धड़क की तरह धोखा भी हो सकती है। फिल्म में बतौर निर्देशन भी बहुत सि कमियाँ हैं। सबसे बड़ी कमी इसकी स्क्रिप्ट है और उसके अलावा फ़िल्म में जब लता गाना गा रही होती है तो सामने लगे बोर्ड पर 2017 दिखाया गया है जबकि फिल्म 2018 में बन रही है। इसके अलावा भी कुछ छोटी छोटी गलतियाँ हैं जो फिल्म को ध्यान से देखने पर ही पता चल पाएंगीं।  फिल्म के किरदारों की बात करें तो उनको फिल्म में बनाए रखने के लिए फिल्म पर किया गया खर्च पहले हिस्से तक तो कुछ ठीक बन पड़ता है पर उसके बाद फिल्म के दूसरे भाग में फिल्म कमजोर पड़ती है। 
 
वैसे इस फिल्म को देखकर यह भी लगता है कि हाल फिलहाल में जो फ़िल्में आई हैं और उनमें जिस तरह माँ-बाप अपने सपनों को बच्चों पर थोपने की बेवजह कोशिश करते हैं उसी का दूसरा चेहरा यह फिल्म है।  दंगल जैसी फ़िल्में अपने सपनों को थोपने की एक सशक्त उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। फन्ने खां सपनों के अलावा शारीरिक रूप से समाज के लिए बेढब लोगों पर तंज कसने की कहानी भी है।  फिल्म में कुछ जगह बेवजह के ट्विस्ट समय पर समझ नहीं आते और कुछ बाद में जाकर दर्शक के समझ में आता है अच्छा... ऐसा इस वजह से हुआ था। अनिल कपूर की यह फिल्म ‘रेस-3’ जैसी कई और बेमतलब फिल्मों की बानगी भी है । लेकिन इस बार का किरदार उन पर दाग लगाने से कितना बचाता है यह तो भविष्य ही तय करेगा। बाकी जिस फिल्‍म में अनिल कपूर, ऐश्वर्या राय और राजकुमार राव जैसे नामचीन अदाकार हों, उस  फिल्म को दर्शक और पैसा बटोरने में ज्यादा जद्दोजहद नहीं करनी होती।
 
'मैं मोहम्मद रफी नहीं बन सका, लेकिन तेरे को लता मंगेशकर जरूर बनाऊंगा'... फिल्म की शुरूआत में प्रशांत शर्मा (अनिल कपूर) उर्फ फन्ने खान ये लाइन अपनी बच्ची को पैदा होते ही बोलते हैं तो उनकी आंखों में वो सपनों की चमक साफ देखी जा सकती है जो एक माँ-बाप में होनी चाहिए। इससे पहले फिल्म में मोहल्ले में प्रशांत यानी फन्ने खान को 'शम्मी कपूर' के गाने 'बदन पे सितारे' पर जमकर झूमते हुए दिखाया जाता है। फिल्म अच्छे संदेश तो देती है परन्तु अच्छी अदायगी और संवादों के साथ नहीं। फिल्म में हल्का फुल्का रोमांस है, मजाक है, भावुकता है एक आध जगह एक्शन भी कह सकते हैं। फन्ने खां संगीत की दुनिया से जुडी हुई कहानी है परन्तु फिल्म के गाने बेहद औसत हैं और उनमें से भी एक पुराने गाने का रीमेक। अमित त्रिवेदी गीतों की दुनिया के बादशाह कहे जा सकते हैं भविष्य में लेकिन यहाँ वे गाने हिट नहीं करवा पाए हैं।
 
अदाकारी के मामले में अनिल कपूर एक आध जगह छोड़कर प्रभाव नहीं डाल पाते और ऐश्वर्या राय बच्चन खूबसूरती के साथ साथ आँख सेंकने का भी मौका देती है। इसके अलावा राजकुमार राव जैसे कलाकार के रोल में भी गहराई नदारद है। नई अदाकारा के रूप में पीहू संड का अभिनय उम्दा है और वे अपने रोल में बिलकुल फिट नजर आईं। दिव्या दत्ता का रोल हालांकि लंबा नहीं होते हुए भी प्रभावशाली है। बेबी के मैनेजर के रूप में गिरीश कुलकर्णी ओवर एक्टिंग के शिकार दिखाई देते हैं। बॉक्स ऑफिस की बात करें तो फिल्म का बजट लगभग 40 करोड़ है और इसे लगभग 1200 स्क्रीन्स में रिलीज किया गया है। इस फिल्म ने पहले दो दिनों में तकरीबन 2.5 करोड़ की कमाई की है। सिनेमा विशेषज्ञों और ट्रेड एनालिस्टों के मुताबिक़ यह फिल्म लाइफ टाइम 50 करोड़ से अधिक का कारोबार कर सकती है।
 
 
 
अगस्त महीने के पहले ही शुक्रवार को रिलीज हुई तीसरी फिल्म है मुल्क, जिसके निर्माता-निर्देशक हैं अनुभव सिन्हा और इस फिल्म में अभिनय करने वाले कलाकार हैं - ऋषि कपूर, तापसी पन्नू, आशुतोष राणा, रजत कपूर, नीना गुप्ता, मनोज पाहवा, प्राची शाह और प्रतीक बब्बर । फिल्म में संगीत दिया है प्रसाद शास्ते और अनुराग सैकिया ने। इस फिल्म में गीत देने वाले गीतकार हैं  शकील आजमी।
 
मुल्क भी कारवाँ की तरह उर्दू का ही शब्द है जिसका अर्थ होता है देश या राष्ट्र। एक देश बनता है वहाँ के रहने वाले लोगों से, नागरिकों से जिसमें सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं। बात हिन्दुस्तान की हो तब कहा जाता है कि यह धर्म निरपेक्ष देश है, यहाँ सभी धर्मों के लोग निवास करते हैं। बात भी सही और जायज है परन्तु आजादी के समय से ही हमारे देश में दो जाति और धर्म विशेष में आपस में टकराव था।  यह टकराव था हम और वो का। जिसमें हम मतलब हिन्दु और वो मतलब मुस्लिम। वैसे राजस्थान में एक पुरानी कहावत है- जिसका सार यूँ है कि अगर कोई मुसलमान तेल से भरे टैंक में हाथ डाले उसके बाद तिलों के बोरे में हाथ डाले फिर उसके हाथ पर जितने तिल चिपक जाएं उतनी बार भी वह अपनी माँ की सौगंध खाकर कहे कि फलां बात वह सच बोल रहा है तब भी उसका भरोसा मत करना। खैर ये एक कहावत मात्र है जिसका वर्तमान समय से लेना देना हो भी सकता है और नहीं भी और यह कहावत एक धर्म या जाति विशेष के लिए बनाई गई हो तब इसमें कुछ न कुछ बात अवश्य होती है। वैसे कहावतें तो बहुत है जिनमें से एक यह भी प्रसिद्ध है कि – नया मुल्ला ज्यादा प्याज क्यों खाता है? 
 
खैर, मुद्दे की बात करें तो अगर इस फिल्म को हिंदूवादी नजरिए से देखा जाए तो जैसा कि फिल्म रिलीज होने से पहले लोगों ने आरोप लगाए थे कि एक हिन्दू इस तरह की फिल्म नहीं बना सकता।  फिल्म का निर्देशक हिन्दू नहीं मुसलमान है, मुल्ला है और इसके अलावा कई आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी निर्देशक पर कसी गई थीं। फिल्म की थोड़ी बहुत समझ और सिनेमा प्रेमी होने के नाते मैं इस पूर्वाग्रह से युक्त होकर किसी फिल्म को नहीं देखता और न ही देखना पसंद करूँगा। दरअसल यह फिल्म बात करती है हिन्दु-मुसलमान के संबंधों की। हिन्दु-मुस्लिम संबंधों पर कई फिल्में बॉलीवुड बना चुका है।  इस फिल्म को देखते हुए ‘भीष्म साहनी’ के ‘तमस’ और ‘बलराज साहनी’ की ‘गर्म हवा’ की भी याद आने लगती है। फिल्म गर्म हवा की शुरुआत में एक शेर कहा गया है –
 
वफाओं के बदले जफ़ा कर रिया है । 
मैं क्या कर रिया हूँ, तू क्या कर रिया है ।। 
 
बस यही है मुल्क के साथ भी।  यह शेर वर्तमान में मुल्क देखने वाले कट्टरपंथी लोगों के लिए सटीक बैठता है। अगर यही मुल्क फिल्म हिंदूवादी मानसिकता से होती तब भी गर्म हवा का यह शेर उनके लिए भी लागू किया जाता। 
 
खैर, मुल्क फिल्म की कहानी कुछ यूँ शुरू होती है कि - बनारस का एक मुस्लिम परिवार है जिसकी बहु का नाम आरती मोहम्मद है। शुरुआत में फिल्म में सब फैमिली ड्रामा सा लगता है लेकिन कुछ बाद में जाकर फिल्म देश और दुनिया के उन हम और तुम से जुड़कर सोशल होती है। इस भरे-पूरे परिवार का एक लड़का जिहाद का रास्ता अपना लेता है और सारा गुड़-गोबर हो जाता है। अब यहाँ भी आप कह सकते हैं कि सारे मुल्ले जिहादी और आतंकी ही होते हैं। तो जनाब ऐसा नहीं है दरअसल जिहादियों और आतंकियों का कोई भी धर्म इस दुनिया में स्वीकार नहीं किया गया है परन्तु अधिकाँश या यूँ कहें 95 प्रतिशत आतंकी या जिहादी एक धर्म विशेष या मुस्लिम धर्म के होते हैं तो कोई गलत और नई बात नहीं होगी। हालांकि फिल्म मुस्लिम धर्म का पक्ष और उसका बचाव करते हुए चलती है इसीलिए फिल्म के कोर्ट रूम में पहुँचने के बाद एक लड़ाई लंबी चलती है। 
 
फिल्म में अभिनय की बात करें तो मुराद अली मोहम्मद यानी ऋषि कपूर का अभिनय और उनका मेकअप उन्हें फिल्म में सबसे अलग और बेहतरीन बनाता है । वे मुस्लिम आदमी के किरदार को पूरी तरह जीते हैं। फिल्म का पहला भाग दूसरे भाग के मुकाबले सुस्त है। दूसरे भाग में फिल्म तेजी से भागती दौडती है लेकिन उसका इस तरह भागना दौड़ना फिल्म में कम गाने होने के बावजूद भी खलता नहीं। फिल्म के सभी गाने फिल्म की कहानी को आगे बढाते और माहौल के अनुसार ढलते ही नजर आते हैं। फिल्म का लबोलुआब यही है कि यह आज के दौर की जरूरी फिल्म है  जो सोचने-समझने पर जोर तो देती ही है साथ ही  धर्मांधता पर भी रोक लगाने का संदेश देती है।  साथ ही फिल्म में जज का कहना-  जिस दिन संसद में पूजा और मंदिर में भाषण बंद हो जाएंगे, उस दिन सब सही हो जाएगा और जिस दिन कोई तुम्हे घर आकर वो और हम की बात करे तो कलेंडर देख लेना, कहीं चुनाव नजदीक तो नहीं, तर्कशील लगता है। तुम बिन, तुम बिन 2 जैसी लव स्टोरी वाली फिल्में देने वाले निर्देशक अनुभव सिन्हा ने रा-वन, गुलाब गैंग के साथ-साथ मुल्क जैसी फिल्म बनाकर साबित किया है कि वे लीक से हटकर भी फिल्में बना सकते हैं।
 
इस शुक्रवार रिलीज तीनों फ़िल्में कारवाँ, मुल्क और फन्ने खां कुलमिलाकर वन टाइम वाच जरुर है। बॉक्स ऑफिस की बात करें तो फिल्म का बजट लगभग 18 करोड़ है और इसे लगभग 800 स्क्रीन्स में रिलीज किया गया है। इस फिल्म ने पहले दो दिनों में तकरीबन 1.55 करोड़ की कमाई की है। सिनेमा विशेषज्ञों और ट्रेड एनालिस्टों के मुताबिक़ यह फिल्म यदि 20-25 करोड़ रुपए भी कमा लेती है तो इसे हिट फिल्म करार किया जा सकता है और लाइफ टाइम भी यह फिल्म उनके मुताबिक़ इतनी ही कमाई कर पाएगी।
 
 
 

- तेजस पूनिया