हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ज़रा सोचिये
क्यों हो अंकों के लिए दौड़
 
एकटक गुमसुम दीवार की घड़ी को लगातार ताकते हुए  मैं उसको पिछले पच्चीस-तीस मिनट से देख रही थी। करीब-करीब सत्रह-अठारह की उम्र होगी उसकी। उसकी आँखों में मुझे बहुत बेचैनी नज़र आ रही थी। बीच में उसके हाव-भाव देखकर मुझे महसूस हुआ कि शायद उसने अपनी माँ को चलने के लिए बोला क्योंकि उसका उठकर वापस बैठना, इस बात की सूचना दे रहा था। माँ के कहने से वो बैठ तो गया पर उसकी मनःस्थिति ने मुझे उस किशोर को पहले अंदर बुलाने पर मजबूर कर दिया।
 
माँ-बेटे चेम्बर में साथ-साथ अंदर प्रविष्ठ हुए। मैंने दोनों को ही बैठेने को कहा और बच्चे की तरफ घूमकर पूछा, "क्या नाम है बेटा तुम्हारा? किस क्लास में पढ़ते हो?"
"गौरव हूँ मैं। ग्यारहवीं स्टैण्डर्ड में पढ़ता हूँ।"
अगला प्रश्न या कोई बात मैं बच्चे से पूछती, उससे पहले ही गौरव की माँ ने बोलना शुरू कर दिया-
"एक ही बेटा है हमारा मैम। बहुत मुश्किलों से काफी समय बाद, काफी पूजा पाठ के बाद इसका जन्म हुआ। बचपन से लेकर अब तक इसकी परवरिश का पूरा-पूरा ध्यान मैंने और इसके पापा ने रखा। गौरव के पापा सरकारी दफ़्तर में काम करते हैं। सवेरे नौ से छह बजे तक काम करते हैं, फिर घर लौटकर गौरव की पढ़ाई को भी हमेशा देखते हैं। हमें अपने बेटे से कभी भी कोई शिकायत नहीं रही क्योंकि पहली क्लास से ही हमेशा पहले पाँच बच्चों में इसका नंबर आता रहा है पर अब कुछ दिनों से जाने क्यों गुमसुम रहता है। पढ़ने की टेबल पर बैठकर घण्टों शून्य में ताकता रहता है। जाने किस सोच में डूबा रहता है। हम इससे बार-बार पूछते हैं, क्या हुआ है तुमको? किसी ने कुछ कहा क्या? किसी टीचर या बाहर किसी ने भी पर कुछ बताता ही नहीं। बोलता है- कुछ नही हुआ है, बस आजकल कुछ भी पढ़ता हूँ तो लगता है याद ही नही है। बार-बार दोहराता हूँ, बार-बार लगता है भूल रहा हूँ सब। कभी-कभी हम इसके माथे को छूकर देखते है तो ठण्डा पड़ा होता है तो कभी पसीने से तर। हमको तो पहले लगा किसी ने हमारे बेटे पर जादू-टोटका कर दिया है तो बहुत से लोगों के कहने से नज़र भी उतरवाई पर स्थिति जस की तस है। बड़ी क्लास है मैम, बहुत कुछ करना है अभी तो गौरव को, अब आप ही बताइए क्या करें हम?
 
माँ तो माँ थी, उसकी चिंताएं भी बहुत स्वाभाविक थीं। खैर लगातार गौरव की माँ को सुनने के बाद मैंने उनको सब ठीक हो जाने का आश्वासन देकर बाहर इंतज़ार करने को कहा और गौरव को अपने ही पास ठहरने को बोल, मैं गौरव की माँ के बाहर जाने तक चुप रही।
गौरव क्या-क्या होबिज़ है बेटा तुम्हारी? अब तक स्कूल की किन-किन एक्टिविटीज़ में तुमने भाग लिया है? खाने में क्या-क्या पसंद है आपको? किचन में माँ की कोई हेल्प करते हो या नहीं? पापा के साथ पढ़ाई के अलावा किन-किन विषयों पर तुम्हारी बातें होती हैं? सब विस्तृत रूप में बताओगे तो मुझे तुम्हारा शेयर करना बहुत अच्छा लगेगा।
 
इतने सारे प्रश्नों को सुनकर गौरव के चेहरे पर अनायास ही फैली मुस्कुराहट को देख मुझे उसकी मासूमियत बहुत अच्छी लगी।
"टी.टी.राज्य स्तर पर खेल चुका हूँ मैं। बाकी स्कूल में डिबेट और कल्चरल एक्टिविटीज़ में भी भाग लेता रहा हूँ। माँ के हाथ का बनाया सब खाना पसंद करता हूँ पर माँ की कोई मदद रसोई में नहीं करवा पाता हूँ क्योंकि माँ कभी नहीं चाहती कि मैं अपना समय बर्बाद करूँ। पापा के साथ पढ़ाई के अलावा कोई बात नहीं होती। माँ और पापा कहते तो कभी भी कुछ नहीं पर मैं उनके उठने-बैठने के क्रिया-कलापों को सोचूँ तो मुझे बहुत अच्छे से समझ आता है कि वे दोनों बग़ैर बताये और जताए वही करते हैं, जो मेरी पढ़ाई में सहायक हो। उनका मेरे साथ-साथ देर रातों को जागना, कहीं भी आने-जाने को टालना, मेरे ऊपर एक अनजाने से दबाव को आरोपित करता है कि समय बहुत कम है ख़ुद को साबित करने का। आजकल मेरी थोड़ी-सी भी की हुई मस्ती, मुझे दोनों की आँखों में समय के बर्बाद करने को जताती है। पढ़ने बैठता हूँ तो किसी न किसी बहाने से दोनों का कमरे में आकर मुझे देखना मुझे भयभीत करता है कि कहीं मुझे इन दोनों के हिसाब से अपेक्षित सफलता नहीं मिली तो दोनों को बुरा लगेगा। कुछ ऐसे ही ख़याल बार-बार मुझे रिक्तता देते हैं और पढ़ना मुश्किल होने लगता है। दोनों की अच्छाइयाँ मुझे उनसे कुछ बोलने नहीं देतीं, सोचता हूँ कहीं आहत न हो जाएँ।"
 
इतना सब कुछ बोलकर गौरव ने चुप होकर कुछ देर मेरी तरफ देखा फिर घड़ी को देखकर अनायास ही बोला- "आज तो काफी समय चला गया मैम, अब हमें चलना चाहिए। उसको उठता हुआ देख मैंने कहा, "दस मिनट और बैठो फिर जाना। कल से तुमको पंद्रह मिनट के लिए ही कुछ दिन आना है। मैं तुमको सबसे पहले अपने पास बुलाऊंगी फिर तुमको आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। बस अपनी पढ़ाई में जुटना। तुम जैसे समझदार बच्चे को बहुत अच्छे से समझ चुकी हूँ, तुम इम्तिहान में अच्छा ही करोगे और हमेशा ध्यान रखना बेटा, जो बच्चा इतना संस्कारित और सब समझने वाला हो वो ज़रूर बड़ा आदमी तो बनेगा ही क्योंकि बड़ा आदमी बनने के लिए नम्बरों की ज़रूरत नहीं होती।"
 
मेरी बातें सुनकर गौरव को एक आत्मविश्वास का अनुभव हुआ, जिसे मैं उसकी आँखों में साक्षात देख पा रही थी और मैं यही आत्मविश्वास उसमें जगाना चाहती भी थी। उसके सर पर अपना हाथ रखकर मैंने उसे हमेशा खुश रहने का आशीर्वाद दिया और उसको बाहर जाने का बोल माँ को अंदर भेजने को कहा। साथ ही गौरव से उसकी माँ का नाम पूछ लिया जो कि गौरव ने केतकी बताया।
केतकी जी ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया मैंने उनको बैठने के लिए कहा और बोला-
"आज मैं आपको रुकने को नहीं कहूँगी क्योंकि गौरव को पढ़ना भी होगा पर कल से सिर्फ दो या तीन दिन गौरव के आने की ज़रूरत है। आपका बेटा बिल्कुल स्वस्थ्य है। उसकी थोड़ा-सी दिनचर्या नियमित करने से सब ठीक होने की उम्मीद है। बहुत अच्छा करेगा इम्तिहान में वह, आप निश्चिंत रहे पर दो तीन दिन के बाद आपको तो आना ही है और हो सके तो आपके पति भी आये तो अच्छा रहेगा।
 
अगले ही दिन गौरव को अपने सामने पाकर मुझे अत्यंत ही प्रसन्नता हुई। अच्छा संस्कारी बच्चा होने से उसकी अपने माँ-पापा के भयों को लेकर एकाग्रता कम होना स्वाभाविक था। दो-तीन दिन गौरव को हर तरह से मेरा प्रोसाहित करना उसमें असीम आत्मविश्वास जगा गया। जब मैंने उसको यह बोला- "तुम कभी भी विचलन महसूस करो तो बेहिचक कभी भी फ़ोन करना बेटा, हमेशा मुझे अपनी मदद के लिए प्रस्तुत पाओगे।"
मेरे ऐसा कहते ही गौरव को जाने क्या सूझा कि उसने उठकर मेरे पैर छुए और मेरा अभिवादन कर जाने की अनुमति माँगी। मैंने भी सर हिलाकर स्वीकृति दी।
गौरव के दो-तीन दिन आने के बाद ही जब मैंने गौरव की माँ, केतकी को नियत समय पर आते हुए देखा तो उनको चैंबर में आने को कहा।
"आइये केतकी जी अंदर आइये। बैठिए। कैसी है आप? पिछले गुज़रे दो-तीन दिन में आपको गौरव में क्या अंतर नज़र आया? आप से जानना चाहती हूँ।"
"मैं अच्छी हूँ मैम और मेरा बेटा पहले से ज़्यादा पढ़ता हुआ नज़र आता है। कुछ सकारात्मक परिवर्तन मैंने उसमें देखे हैं। आपकी उससे क्या बात हुई नहीं जानती पर मेरे मन का भी कुछ करिये।"
"केतकी जी! आप और आपके पति दोनों के ही दिए हुए संस्कार बहुत अच्छे हैं। नतीजन आपका बेटा एक दिन बहुत अच्छा इंसान ज़रूर बनेगा। पर मैं आपसे कुछ बातें ज़रूर कहना चाहूँगी। पहली बात अपने बेटे में विश्वास रखिये। आपके दिए हुए संस्कार आपकी हर चाहना के रूप में उसके अंदर हैं। उसके ऊपर बार-बार नज़र रखकर या आप दोनों की दिनचर्या उसके हिसाब से मत करिए। आप सामान्यतः जैसा रहते थे वैसे ही उसके साथ बातचीत व मस्ती करिये। थोड़े नंबर कम या ज़्यादा आने से कुछ फर्क नहीं' पड़ेगा पर आप दोनों की अति चिंता उसके तनाव का सबसे बड़ा कारण है। उसको अपने नंबर से ज़्यादा आप दोनों के आहत होने की चिंता है, तभी वो बार-बार समय का आकलन कर न तो आप दोनों के साथ समय निकाल पाता है और न ही इस चिंता से मुक्त हो पाता है।"
 
"दूसरा सत्रह-अठारह साल का बच्चा, जिसकी नींव मजबूत हो बस माँ-बाप की उपस्थिति हौसला बढ़ाने के रूप में चाहता है कि अगर नंबर कम भी आये तो मेरे माँ-पापा हर स्थिति में मेरे साथ होंगे। आप दोनों को बस हर स्थिति में उसके साथ होने का आश्वासन देना हैं न कि उसकी चिंता का कारण बनना है कि उसके माँ-पापा उसकी वजह से आहत नहीं होने चाहिए।
"तीसरा आपका बेटा अब वोटिंग की उम्र में आने वाला है। समझदार है वह, उसको हो सकता है अगले साल कहीं और पढ़ने जाना हो। बस भरपूर प्यार करिये। यही प्यार भविष्य में उसका संबल बनेगा।"
 
मेरी बातें सुनते-सुनते कब केतकी की आँखें नम हो आयीं और उसने बग़ैर कुछ बोले कब मेरे हाथ पर अपना हाथ रखकर ख़ुद को बदलने का मुझे आश्वासन दिया यही मैंने एक माँ की बहुत कुछ बोलती आँखों में पढ़ा।
"केतकी जी! आपसे एक आग्रह करुँगी, आप मेरे और गौरव के बीच सिर्फ एक सेतु का काम करिये। जब कभी भी आपको कुछ ऐसा दिखे जो बहुत अज़ीब हो तो ख़ुद कुछ कहने से पहले मुझे विश्वास में लीजिएगा। नहीं तो बहुत सोचने की आवश्यकता नहीं है। यही मैंने गौरव को भी कहा है। कभी भी मन परेशान हो तो मुझसे बात करें। वैसे किसी को भी ज़रूरत नही पड़ेगी, यह मेरा विश्वास है।"
 
मेरी बातें खत्म होते ही केतकी ने मुझे धन्यवाद कहकर विदा ली और मैं सोचने पर मजबूर हो गई कि परिवार के संस्कार अगर सुदृढ़ हो तो छोटी-मोटी समस्याओं के हल स्वतः ही निकल आते है और माँ-बाप भी कई बार बग़ैर कुछ कहे बच्चों के लिए तनाव का कारण बनते हैं। हमेशा बच्चे ही ग़लत हो, यह ज़रूरी नहीं। माँ-बाप की अतिसुरक्षा या पढ़ाई को लेकर चिंता उनके पढ़ाई-लिखाई पर बुरा असर डाल सकती है। दोनों को ही सोचने की ज़रूरत होती है। जितने संवेदनशील माँ-बाप होते हैं, बच्चों के लिए उतने ही बच्चे भी है जनकों के लिए। इसलिए संस्कारों की बुनाई बहुत क़रीने से होनी चाहिए। संस्कारित इंसान को किसी भी परिस्थिति में हिला पाना आसान नही होता। सोचकर और महसूस करके देखिये जरूर।

- प्रगति गुप्ता
 
रचनाकार परिचय
प्रगति गुप्ता

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