प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

व्यंग्य
एक गड्ढे की आत्मकथा और अभरण-अनशन
 
यद्यपि मैं एक गड्ढा ही तो हूँ। ऐसे में क्या मेरी आत्मा और कैसी मेरी कथा? गड्ढा तो गड्ढा होता है और कुछ नहीं। तथापि मैं महत्वपूर्ण, पूज्यनीय एवं सम्मानीय इसलिए हूँ क्योंकि मैं एक असाधारण गड्ढा हूँ। विगत चार वर्षों से मुँह बाए 'अभरण-अनशन' पर शहर की मुख्य सड़क पर अड़ा हूँ। सीवर लाइन को डालने के चक्कर में मुझे तैयार किया गया था। तब से यथावत डटा हूँ। मौसम के परिवर्तन के साथ मेरा आकार विकराल होता जा रहा है। अनशन की इस लम्बी अवधि में शहर के आवारा कुत्तों को आश्रय प्रदान करता आ रहा हूँ। ठण्ड के मौसम में कुत्तों के पारिवारिक विकास और उनके पिल्लों के लालन-पालन के दायित्व का निर्वाहन भी निर्वाध रूप से कर रहा हूँ।
 
हालाँकि मैं अपने बारे में कसीदें नहीं गढ़ना चाहता किन्तु बता देना ज़रूरी समझता हूँ कि एक गड्ढा नेताओं को गौरवान्वित करने में अहम् भूमिका अदा करता है। गड्ढा बड़े से बड़ा मुँह खोलकर जनता का ध्यान आकर्षित करता है। आवागमन में व्यवधान उत्पन्न करता है, जिससे जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम उच्चारती हुई प्रशासन को दुशाशन के नाम का अलंकरण करने लगती है। नेताओं को कोसने लगती है और तब उनकी कुम्भकरणी नींद टूटती है। वे शहर की ओर गमन की योजना बनाते हैं। नेताई आगमन की सूचना मिलते ही सुप्तप्राय स्थानीय प्रशासन सक्रिय हो उठता है। उनका लाव-लश्कर मेरे जैसे अनेक गड्ढों के ‘अभरण-अनशन’ को तोड़ने निकल पड़ता है। रातों-रात गड्ढों में सारी मेहनत उढ़ेल दी जाती है। लीपा-पोती कर दी जाती है। गड्ढे अदृश्य कर दिए जाते हैं और तात्कालिक राहत का असर दिखाई देने लगता है। गड्ढा पीड़ित जनता, नेताजी की जागरूकता से अभिभूत होकर वाह-वाही करने लगती है। समर्थन जुटने लगता है।
 
कुल मिलाकर हमारा योगदान नेताई समृद्धि और प्रसिद्धि की दोहरी भूमिका अदा करता है, जहाँ एक ओर गड्ढों को ज़िन्दा रखने की कवायद और फिर टेम्परेरी पूरने के खर्चे से पार्टी फंडिंग समृद्ध होती है। वहीं दूसरी ओर गड्ढों की भराई की संख्या जितनी ज़्यादा होगी, प्रसिद्धि में उतने चाँद लग जाते हैं। अतः चुनावी-समर में गड्ढों का इस्तेमाल अचूक हथियार साबित होता देखा गया है।
 
कुएं का अस्तित्व अब समाप्ति पर है इसलिए 'नेकी कर कुएं में डाल' की कहावत अब चरितार्थ नहीं होती। गड्ढे बहुतायत में और सुलभता से उपलब्ध होने के कारण 'नेकी कर गड्ढे में डाल' चलन में आ गया है। समय-समय पर मूर्धन्य नेतागण राहत की नेकी गड्ढों में डालकर पुण्य कमाते है एवं 'गड्ढ़म शरणम गच्छामि' उच्चारते हुए आम जनता से विजयी भव का आशीष पाकर कृतार्थ होते हैं।
 
सर्वांत आप सबका प्रिय और श्वानों का हितैषी गड्ढा प्रधान का प्रणाम स्वीकार करें।

- राकेश सोहम्
 
रचनाकार परिचय
राकेश सोहम्

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