प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत-गंगा
महक रहा हो मौसम जैसे
 
प्रीति हृदय पर कुछ यूँ छाई,
महक रहा हो मौसम जैसे।
 
शब्द ठहर जाते अधरों पर,
बैठ हृदय में भाव चहकते।
खुलतीं बंद सहमती पलकें,
देख रहीं बस कदम बहकते।
ठहरी-ठहरी मधुर चाँदनी,
देख मगर कुछ यूँ मुस्काई।
बहक रहा हो मौसम जैसे।।
 
आँख मिचौली सँग तारों के,
खेल रहे हैं जुगनू सारे।
पीकर मदिरा मगन हुए हैं,
जैसे ये मदहोश नजारे।
इधर-उधर कुछ भटके बादल
हँसकर बदन छुए पुरवाई।
चहक रहा हो मौसम जैसे।।
 
खुशियाँ बैठी हैं सिरहाने,
लहराती भावों की सरिता।
छिपकर बैठी बना रही है,
लाज निगोड़ी अनुपम कविता।
करवट-करवट ढीठ कामना,
मचल रही है बस हरजाई।
दहक रहा हो मौसम जैसे।।
 
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मुरझाये सपने
 
जीवन की इस तेज धूप में,
झुलस-झुलस मुरझाये सपने।
 
घर पावन-सा वो मिट्टी का,
नेह मिले जो अपने हिस्से।
छूट गया अम्मा का आँचल,
नहीं रहे नानी के किस्से।
गुड्डे गुड़ियों के सँग कितने,
हमने ख़ूब सजाये सपने।
 
पीहर गयी खुशी ज्यों अपने,
धड़कन-धड़कन भटकें यादें।
अधरों पर है मौन सुशोभित,
अंतस में चिहुँकें फरियादें।
देख-देख ऋतुओं के मन को,
नयनों ने छलकाये सपने।
 
विस्मृत हो जाते दुख सारे,
और न आकर छलतीं रातें।
अपने पाँव धरे फूलों पर,
साथ हमारे चलती रातें।
निष्ठुर जग के ही द्वारे पर,
जा जाकर मुस्काये सपने।
 
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खुली आँख से देखा जिनको
 
खुली आँख से देखा जिनको,
उन सपनों ने ठगा मुझे।
 
पथ पर फूल बिछाने थे कुछ,
तोड़ सितारे लाने थे कुछ।
तुम्हें सोचकर कभी रचे जो,
वो ही गीत सुनाने थे कुछ।
किन्तु बेड़ियाँ हैं पाँवों में,
दिया समय ने दगा मुझे।
 
देख मुझे सब मुँह बिचकाते,
अपने सारे रिश्ते-नाते।
जब-जब दीप जलाती हूँ मैं,
कर्म-भाग्य मिल सभी बुझाते।
सदा उजालों ने भी समझा,
अँधियारों का सगा मुझे।
 
दुख खुशियों के पल हरता है,
समय नयन में जल भरता है।
माँग रही बस उत्तर दुनिया,
प्रश्न कौन-कब हल करता है।
इसी भीड़ में शामिल तुम भी,
अक्सर ऐसा लगा मुझे।
 
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सुख-दुख
 
क्योंकर इनसे है घबराना,
सुख-दुख साथ पला करते हैं।
साथी हैं ये जीवन पथ के,
मिलकर साथ चला करते हैं।।
 
संघर्षों के भय से प्यारे,
यूँ हम भाग नहीं सकते।
और भाग्य से पग-पग पर हम,
खुशियाँ माँग नहीं सकते।
केवल मीठे फल ही सारे,
तरुवर नहीं फला करते हैं।।
 
भले ज़माना हृदय तोड़ दे,
मगर न रखना कुछ मन में।
त्याग अयोध्या सँग सीता के,
फिरे राम भी, वन-वन में।
बन मारीच सदा अपने ही,
अक्सर हमें छला करते हैं।।
 
ओढ़ निराशा मुँह लटकाए,
बैठा करते नहीं कभी।
कष्ट हमारा हमीं हरेंगे,
दूजे हरते नहीं कभी।
आशाओं के दीप नयन में,
बुझते नहीं जला करते हैं।।
 
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तुलसी बन जाओ
 
मन फिर से तुलसी बन जाओ।
 
झूठा जग, झूठी सब बातें,
झूठी हैं ये झिलमिल रातें।
खोज रहे होकर क्यों व्याकुल,
इनमें तुम मीठी सौगातें।
कर्म करो कुछ ऐसा बढ़कर,
जीवन का अनुपम धन पाओ।।
 
झूठा प्रेम है, झूठी माया,
झूठी है ये कंचन काया।
मत भागो तुम इनके पीछे,
ये सब तो हैं दुखती छाया।
नये पाठ की छटा बिखेरो,
एक नया सुर ताल सुनाओ।।
 
बहुत रो चुके दुख का रोना,
अश्रु नहीं अब अपने खोना।
लड़कर नित्य स्वयं से सीखो,
खुशियों के बीजों को बोना।
कुछ अपने कुछ औरों के हित,
एक नया इतिहास बनाओ।।

- छाया त्रिपाठी ओझा
 
रचनाकार परिचय
छाया त्रिपाठी ओझा

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