प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ख़ास मुलाक़ात
मुझमें बस थोड़ी-सी मैं हूँ मुझमें बाक़ी सारी माँ: सोनरूपा विशाल
 
 
हिन्दी काव्य-मंचों की एक अत्यन्त शालीन और मृदु स्वर की कवयित्री  हैं डॉ. सोनरूपा विशाल । पत्र-पत्रिकाओं में भी उसी अनुपात में समादृत हैं। 2014 में उनका  'लिखना ज़रूरी है' नाम से वैयक्तिक ग़ज़ल संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। इस बार (2016 में ) फ़र्रुख़ाबाद में 'भारत विकास परिषद' संस्था के अन्तर्गत हुए एक कवि सम्मेलन उनका आना हुआ, जिसमें कार्यक्रम से पूर्व होटल में हुई अनौपचारिक वार्ता को साक्षात्कार का रूप दे रहा हूँ।- उत्कर्ष अग्निहोत्री
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- आपने कविता कब और कैसे लिखना शुरू किया?
डॉ. सोनरूपा- जब (सन् 2005) मैंने अपने पिता को खोया तो उनको पाने का एक तरीका उनकी कविताओं को पढ़ना था। जब मैं उनके संग्रहों को पढ़ा करती थी तो लगता था कि जैसे वो मेरे पास बैठे हैं। धीरे-धीरे उनकी कविता का बीज तत्व मेरे भीतर अंकुरित होता गया और मैं अनायास ही कविता की ओर प्रवृत्त होती चली गयी। इधर तीन-चार वर्षों से ही मैंने कविता लिखना शुरू किया है वरना इससे पूर्व तो छुटपुट तुकबन्दियाँ हुआ करती थीं।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री-. एक स्त्री के लिए कविता करना कितना कठिन होता है? विशेष रूप से मंच पर क्यूँकि आप मंचों पर सक्रिय हैं?
डॉ. सोनरूपा- ये दोनों अलग-अलग प्रश्न हैं, जिनका उत्तर भी मैं अलग-अलग दूँगी। एक- स्त्री के लिए कविता करना विचारों की, उर्वरता, अनुभवों, भावों के प्रकटीकरण के तौर पर कहीं से भी पुरुषों से कठिन नहीं है यानी स्त्री रचनाकार के पास कविता का निरन्तर एवं तरल स्रोत है। बात कविता लिखने की अनुकूल परिस्थितियों की हो तो हाँ, एक स्त्री के लिए कविता लिखना आसान नहीं क्यूंकि हम स्त्रियाँ अपने समांतर बहुत-सी ज़िम्मेदारियाँ लेकर चलती हैं और उन्हें हमेशा प्राथमिकता देने की कोशिश करती हैं। रहा सहा वक़्त अपने को देती हैं, स्त्री मनोविज्ञान ही कुछ ऐसा है। कई बार वे स्वयं को पूरी तरह व्यक्त करने पर भी एक अनजानी-सी बंदिश महसूस करती हैं। लेकिन क्यूँकि कविता एक अजन्मे बच्चे की तरह होती है, जिसे एक न एक दिन धरती पर आना ही होता है इसीलिए चाहे कितनी व्यस्तता, कठिनाई हो, मन का उद्देश्य रचना के रूप में काग़ज़ पर साकार हो ही जाता है। दूसरा- जहाँ तक मैं अपनी बात करूँ तो यक़ीनन शुरुआत में मुझे थोड़ी-सी असहजता महसूस हुई और आज भी होती है। मंच से कविता पढ़ना और कविता को जीकर लिखना दोनों अलग-अलग बातें हैं। मंच पर हमें रचना का श्रोताओं तक सम्प्रेषण का भी ख़्याल रखना होता है। मेरी स्वयं से प्रतिबद्धता है कि मंच पर जो एक कवयित्री की छवि होनी चाहिए, उसी के अनुरूप रहकर मैं मंच का हिस्सा बनूँगी अन्यथा नहीं। लेकिन मंच पर भी एक तरह से पुरुषवाद का आलम है कुछ को छोड़कर अधिकतर कवयित्रियाँ एक फिलर के तौर पर मंच पर सुशोभित होती हैं, संख्या में भी एक या दो। प्रस्तुति भी ज़्यादातर श्रंगार रस से लबरेज़ लेकिन क्यूंकि बिन श्रंगार रस प्रेम के कवि सम्मेलनीय पत्रिका का अंक अधूरा रह जाता है तो ये भी बहुत आवश्यक अंग है। लेकिन आज के युग में समसामयिक मुद्दों पर भी अपनी स्वस्थ विचारधारा, श्रंगार रस का सलीका, रिश्तों के सौंदर्य, प्रेम की सर्वोच्चता को मैं अपनी कविताओं में पिरोकर मंच से पढ़ना चाहती हूँ और पढ़ती भी हूँ। आज कवि सम्मेलनीय मंच व्यावसायिक और हल्के होते जाने के बावजूद ऐसे बहुत सारे मंच हैं, जहाँ स्तरीय कविता पाठ ख़ूब मन से सुना जाता है। वहाँ कविता के लिए रास्ता दुर्गम नहीं।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- डॉ. उर्मिलेश जी ने मंच पर एक श्रेष्ठ कवि और सफल संचालक की भूमिका निभाई। लेकिन घर में वे किस रूप में सामने आते थे? क्यूँकि उन्होंने एक अध्यापकीय जीवन भी जिया है?
डॉ. सोनरूपा- अध्यापकीय नज़र से उच्चारण के साथ-साथ हमारे सुन्दर लेख, वर्तनी पर बहुत ध्यान देते थे।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- पिता जी (डॉ. उर्मिलेश) के कारण आपने जिस मंच की परिकल्पना कर रक्खी थी, क्या यहाँ (काव्य मंच) आने पर वैसा ही आपको मिला?
डॉ. सोनरूपा- जिस वक़्त पिता जी कवि सम्मेलनों में सक्रिय थे, वह वक़्त कवि सम्मेलन के स्वर्णिम काल के बाद का समय था। जिसकी आभा वे और उनके समकालीन कवि अपनी रचनाधर्मिता से बचाए हुए थे। जैसा कि कवि सम्मेलनों का उद्देश्य होता है। जनजागरण और जनता का स्वस्थ मनोरंजन वो उस समय की रचनाओं में ये उद्देश्य बख़ूबी निबद्ध होता था। उसके बाद मंच का स्तर धीरे-धीरे एक-एक पायदान फिसलता चला गया। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं मंचों पर आऊँगी। 2012 में सब टी.वी. पर 'वाह वाह क्या बात है' पर मेरी प्रस्तुति के बाद कवि सम्मेलनों के कई आमंत्रण आये लेकिन कभी इस ओर ध्यान गया ही नहीं तो स्वीकृति नहीं दे पाई और कुछ मन में पूर्वाग्रह भी थे मंच के प्रति इसलिए। 2014 में मेरा पहला ग़ज़ल संग्रह आया। फेसबुक के माध्यम से लोग मेरी थोड़ी बहुत रचनाधर्मिता से परिचित हुए। धीरे-धीरे चुनिंदा कवि सम्मेलनों में शिरकत प्रारंभ हुई लेकिन अभी भी मैं मंचों पर बहुत सक्रिय नहीं हूँ। कारण ये कि मैं मंचों की संख्या से ज़्यादा मंच की स्तरीयता को प्राथमिकता देती हूँ।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- तो आपको ये कविता कहने का संस्कार कहाँ से मिला आपके काव्य-गुरु कौन रहे?
डॉ. सोनरूपा- स्पष्ट है पिता जी (डॉ. उर्मिलेश शंखधार)।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- आपने साहित्य की किन-किन विधाओं में क़लम चलायी है?
डॉ. सोनरूपा- समीक्षाएँ और आलेख भी और कुछेक छंद मुक्त कविताएँ भी गीत-ग़ज़ल के अलावा।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्रीइनमें से किसमें ख़ुद को सहज पाती हैं और क्यूँ?
डॉ. सोनरूपा- ग़ज़ल में क्योंकि उसके एक मिसरे में मुकम्मल ख़याल को पिरो लेने की सामर्थ्य होती है।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- रचनाकार का बुनियादी सरोकार क्या है?
डॉ. सोनरूपा- रचनाकार का सरोकार मेरी नज़र में अपनी तर्कसंगत रचनाओं से समाज को स्वस्थ, सार्थक, सुलझी और विकसित सोच देना, जीवन की सार्थकता के लिए मानवीय गुणों का बखान है।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- साहित्य की किन विधाओं को पढ़ना पसंद करती हैं?
डॉ. सोनरूपा- विशेषकर कविताएँ। वैसे जब जो मन चाहे, जो अच्छा लगे। कहानियाँ पढ़ती हूँ। उपन्यास बिल्कुल नहीं, ये धैर्य की माँग करता है।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- डॉ. उर्मिलेश के समय से लेकर अब तक काव्यमंच पर क्या फ़र्क आया है?
डॉ. सोनरूपा- पहले मंच अब के बनिस्बत ज़्यादा अनुशासित होता था। कवि की जनता के प्रति ज़िम्मेदारी उसकी रचनाओं में स्पष्ट नज़र आती थी। जनता कविताओं से कुछ अच्छा ग्रहण कर के घर लौटती थी। अब कविताओं में त्वरित प्रतिक्रिया पाने के लिए धार्मिक उन्माद को बढ़ावा, राजनीति पर हल्की टिप्पणीयाँ, श्रंगार में स्तरहीनता नज़र आने लगी है। 
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- आज के यांत्रिक, तकनीकी और राजनीतिक युग में आप साहित्य का क्या भविष्य देखती हैं?
डॉ. सोनरूपा- नई प्रतिभा को प्लेटफॉर्म मिला है। संपादकों, प्रकाशकों के मुखापेक्षी न होकर रचनाकार आज सोशल मीडिया के ज़रिए अपनी रचनाएँ एक साथ कई लोगों तक पहुँचा पा रहे हैं।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- इस आत्ममुग्धता के दौर में आप किन रचनाकारों को पढ़ना या सुनना पसंद करती हैं। अपने समकालीन और अपने से पूर्व में?
डॉ. सोनरूपा- रहने दें लम्बी फेहरिस्त है।
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री- आपकी कोई प्रसिद्ध पंक्तियाँ, जो आपको बहुत पसंद हों?
डॉ. सोनरूपा- मेरी जिन पंक्तियाँ ने मुझसे पहले सारे देश का सफ़र तय किया है, जो मुझे भी बहुत प्रिय हैं वो हैं-
शाम-सी नम रातों-सी भीनी भोर-सी है उजियारी माँ
मुझमें बस थोड़ी-सी मैं हूँ मुझमें बाक़ी सारी माँ।
 
 
 
 
 
 
साक्षात्कारकर्ता:-
 
 
 
उत्कर्ष अग्निहोत्री
 
जन्मतिथि- 04 अप्रैल 1996
शिक्षा- एम.ए. (हिन्दी) अध्ययनरत
प्रकाशन- डॉ. शिव ओम अम्बर: अर्थात् (संपादन), समवेत (कविता संग्रह)
साहित्य भारती, उत्तर प्रदेश, वीणा, साहित्यगंधा, गीत गागर, अभिनव प्रयास, समकालीन स्पंदन आदि पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित।
संपर्क- 4/15, कटरा नुनहाई, फ़र्रुख़ाबाद (उ.प्र.)- 209625
ई-मेल : [email protected]
संपर्क : 8874663158

 


- सोनरूपा विशाल
 
रचनाकार परिचय
सोनरूपा विशाल

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ग़ज़ल-गाँव (2)ख़ास-मुलाक़ात (1)