प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

मूल्यांकन
 
विविधता भरा व्यंग्य संग्रह  हैश, टैग और मैं
 
 
श्री अरुण अर्णव खरे साहित्य के क्षेत्र में नया नाम नहीं है यद्यपि व्यंग्य के क्षेत्र में उन्होंने पहली बार चहलकदमी की है । इस हिसाब से यह उनका पहला व्यंग्यसंग्रह है । विषय की दृष्टि से देखें तो संग्रह विविधताओं से भरा है । मानवीय जीवन मूल्यों का ऐसा कोई कोना नहीं छोडा जहां पर लगे जाले न निकाल़े हो । राजनीति, समाज, घर-परिवार, अर्थ, धर्म, शिक्षा, मनोरंजन,  विज्ञान, नौकरी, सोशल मीडिया सहित सारे विषयों पर उन्होंने कुशलता से कलम चलाई है और व्यंग्य के तमाम प्रचलित माध्यमों - मसलन निबंध और व्यंग्य-कथाओं सहित फैण्टेसी व पत्र-शैली का भी बखूबी उपयोग किया है |  
 
लेखक ने लिखा भी है कि लेखन समयानुकूल होना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी तक पहुँच सके ।
जाहिर है कि समय की गति तेज होती है । इक्कीसवीं सदी में कुछ ज्यादा ही तेज है । सुबह उठो तो न जाने कितनी नई घोषणाएं हो चुकी होती हैं । हमारी पीढ़ी भले ही इस परिवर्तन के साथ न दौड़ पाये मगर नई पीढ़ी तो समय से भी आगे दौड़ लगा रही है । फेसबुक संचार का ऐसा अंतहीन आंगन है जिससे जुडकर हम नई पीढ़ी की साहित्यिक रुचि से अच्छी तरह परिचित हो रहे हैं । वह भी साहित्यानुरागी है बस माध्यम बदल गया है । ई बुक्स, ईमेल, ब्लॉग, आदि नये माध्यमो से वह साहित्य से जुड रहा है ।
 
व्यंग्यकार अरुण अर्णव खरे जी की दृष्टि एकदम साफ है । वे चाहते है कि उनका लेखन युवाओं तक पहुँचे । "हैश, टैग और मैं" पुस्तक इस बात की गवाह है । इस संग्रह में कोई ऐसा क्षेत्र नहीं छूटा जो संग्रह में शामिल न हो । विषय सूची देखकर ही अनुमान हो जाता है कि संग्रह कितना विविधतापूर्ण और विषयों में नवीनता से युक्त है | उदाहरण स्वरूप - जीरो की ब्राण्ड वेल्यू, चाँद का जेण्डर इशू, हँसी का शोधपत्र, भक्तिकाल रिटर्नस, झूठ का स्टार्ट अप आदि अपने आप में उत्सुकता पैदा करते हैं । बीच बीच में हास्य और मनोरंजन की फुलझडी छोडते हुये खरे साब आराम से ऐसे आगे आगे बढते हैं मानो गुनगुना भी रहे है |
 
पी राधा और मैं, पंडित जी का हिंदी अभियान, लाइक लो लाइक दो, पहली नजर में प्यार आदि पाठक का काफी मनोरंजन करते हैं । इनके अतिरिक्त विषयो की गंभीरता से रूबरू कराते विषय भी पाठको को बौद्धिक ऊँचाई तक पहुँचाते है, जैसे-- आँसू बचाइये साहब, अच्छे दिनो का एहसास, उजले चेहरे की तलाश, बापू हम तुम्हे भूले नहीं, झूठ का स्टार्ट अप, आदि । बापू हम तुम्हे भूले नहीं का उदाहरण देखिये-- ये समय तो है ही बुराई की महिमा मंडन का, देखा नहीं आपने आतंकियों तक के जनाजे में किस तरह लोग उमड़ पड़ते हैं । इन बातों पर आप दुखी मत होना । हम आपको भूले नहीं हैं बापू, आज भी बड़ी बेसब्री से 2 अक्टूबर और 30 जनवरी का इंतजार करते है हम लोग ।
खरे साब ने विट का प्रयोग भी कितनी सहजता और सम्प्रेषणीयता के साथ किया है यह इस उदाहरण से स्पष्ट है - "वर्षों पहले एक नाभि-दर्शना नायिका को पर्दे पर गाते देखा था - 'तेरी दो टकिया की नौकरी मेरा लाखों का सावन जाये' | एक और उदाहरण देखिए - "पहले आप इस मोटी बात को समझिए -- हालांकि आप जैसे दुबले-पतले लिए ये मोटी बात समझना आसान नहीं है"
 
शिल्प की दृष्टि से व्यंग्य संग्रह के सभी लेख प्रभाव पूर्ण है । बीच बीच में बुंदेली भाषा और लहजे की झलक अरुण साब के जमीनी जुडाव के संकेत देती है । अंग्रेजी एवं इलेक्ट्रॉनिक जगत से जुड़े शब्दो के प्रयोग आम पाठक के लिये ज्ञानवर्धक हैं।
 
कुल मिलाकर यह संग्रह इसलिये भी पठनीय एवं संग्रहनीय है क्योंकि लेखक इसमे वर्तमानकाल की रवानगी को साथ लेकर आगे बढ़ते है जो साहित्यिक जगत के लिये शुभ संकेत है । कहा गया है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है । खरे साहब ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है।
आशा है उनका यह व्यंग्य संग्रह युवा पाठकों के बीच लोकप्रियता पायेगा । अंत में आशा करती हूँ कि खरे साहब व्यंग्य साहित्य में और भी आगे बढ़े । इन्हीं शब्दों के साथ शुभकामनाएं देते हुते मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ |
 
समीक्ष्य पुस्तक : हैश, टैग और मैं
लेखक : अरुण अर्णव खरें 
प्रकाशन : बी १७७० जहांगीर पुरी
दिल्ली--११००३३
 
 
 

- डॉ. स्नेहलता पाठक
 
रचनाकार परिचय
डॉ. स्नेहलता पाठक

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