प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

जो दिल कहे!

भारत बनाम इंडिया विकास-गाथा!

 

नए भारत की उम्र 71 वर्ष की हो गयी। जश्न-ए-आजादी धूमधाम से तैयारी की जा रही है। मीडिया 15 अगस्त 1947 से 15 अगस्त 2018 के बीच के प्रमुख घटनाक्रम और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करेगी, दूसरी ओर देश के प्रबुद्ध बुद्धिजीवी वर्ग विशेषकर अर्थशास्त्री-समाजशास्त्री आजादी की प्रगतिगाथा के समाजार्थिक गौरव से अवगत करायेंगें। बावजूद इसके कि देश के अनेक प्रान्त आज भयानक बाढ़ और सूखे के चपेट में हैं, सम्पूर्ण महाराष्ट्र जातिवादी आरक्षण के आग में पुनः झुलस रहा है, पूर्वोत्तर भारत खासकर आसाम अवैध बांगलादेशी शरणार्थियों की पहचान जैसी गंभीर समस्या से जूझ रहा है, उत्तर भारत के कई राज्य एक बिलकुल ही अनियंत्रित उन्मादी भीड्तंत्र का शिकार( मोब लिंचिंग) बन रहा है, लोकतंत्र के मंदिर के ठीक नीचे भूख से बेहाल मासूम बच्चे तड़प-तड़प कर अपनी जान गँवा रहे हैं..... बावजूद इसके देश में जश्न-ए-आजादी की तैयारी का माहौल भी उफान पर है, जो बताता है कि सुख-दुख को सामान भाव से जीने वाला यह महान भारतवर्ष अपनी गौरवमयी परंपराओं में भी जीते हुए, उससे ऊर्जा ग्रहण करता रहा है।

 

अनेक नामों में इस देश का एक नाम है भारतवर्ष। इस नाम में इसका प्राचीन गौरव समाहित है। 'अमरकोश' में वाचस्पति का एक श्लोक आता है-

'स्यात भारतं किंपुरुष च दक्षिणां: रम्यं हिरण्यमयकर, हिमाद्रेरुत्तरास्त्राय:

भद्रश्वकेतुमालो तू द्वहो वर्षो पूर्वपश्चिमो इलाव्रित्त तू मध्यस्थ सुमेरुयर्ष तिष्ठति।।"

इस श्लोक के अनुसार प्राचीनकाल में पूरी पृथ्वी पर केवल नौ वर्ष (देश) ही थे। हिमालय से उत्तर में तीन, दक्षिण में तीन, पूरब और पश्चिम में एक-एक तथा उसके मध्य में एक। यह मध्य स्थित देश ही भारतवर्ष है। अन्य वर्षो(देश) के नाम हैं- किम्पुरुष वर्ष, हरि वर्ष, रम्यं वर्ष, हिरण्मय वर्ष, कुरु वर्ष, भद्राश्व वर्ष, केतुमाल वर्ष और इलव्रित वर्ष। इन वर्षों का आधुनिक नाम क्या है, कोई नहीं जानता, किन्तु भारतवर्ष आज भी विद्यमान है।  जो अपने आरंभिक दिनों में हिमालय से समुद्र तक (उत्तर-दक्षिण) तथा बांग्लादेश से काबुल (पूरब-पश्चिम) तक फैला था। तब यह देश 'सोने की चिड़िया' कहलाता था। संसार में भारत की समृद्धि की कथाएँ फैली हुई थी, जिससे आकर्षित होकर अनेक विदेशी आक्रांताओं के कदम इस देश पर पड़े। यूनानी आये, लूट-खसोट कर चले गए।  मुग़ल आए, अपनी बुद्धिमत्ता से यहीं रह गए। फिर डच, पोर्तगीज आदि आये और लूटकर चले गए।

 

मुगलों के इस देश में रहने तक भी यहाँ की समृद्धि बनी हुई थी। 1600 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना इस देश में हुई। भारत की समृद्धि से आकर्षित होकर ही कंपनी व्यापार करने यहाँ आयी थी।

लगभग 1000 वर्ष की गुलामी और शोषण झेलने के बाद 15 अगस्त,1947 को जब एक नए भारत का उदय हुआ, तब आर्थिक दृष्टि से यह देश चाहे जितना क्षत-विक्षत हो चुका हो, किन्तु ब्रिटिश शासन से इसे विकास की आधुनिक अवधारणा के अनेक उपहार भी मिले; मसलन लोकतंत्र की अवधारणा, कानून का राज, मशीन, रेलवे आदि। नए भारत के रहनुमाओं ने इन्ही चोजों के आधार पर नए सिरे से देश को सँवारने और समृद्ध करने के सपने को स्वरुप देना आरम्भ किया। तब राष्ट्रिय नेताओं का एक वर्ग था जो पश्चिमी देशों के औद्योगिक विकाश के ढांचे को इस देश की प्रगतिक लिए आधार बनाना चाहते थे, जबकि दूसरे वर्ग के राष्ट्रीय नेता चाहते थे कि इस देश की कृषि-संस्कृति की व्यवस्था पर ही यहाँ का विकास आधारित हो दूसरे वर्ग के नेताओं की नहीं चली, परिणामस्वरूप कुटीर उद्द्योग ख़त्म होते चले गए।सारे कारीगर श्रमिक बन शहरों में विस्थापित हो गए। गांव उजड़ते गए। शहर बसते गए। गावों से उजड़े कारीगर शहरों में पूंजी घरानों में श्रमिक हो गए, जहाँ उनके हुनर का फायदा पूंजीपतियों को मिलने लगा। राजीनीतिक भाषा में कहें तो देश के योजनाकारों ने विकास की जो नीतियां अपनायी, उनसे यहाँ के लगभग सारे सामंत पूंजीपति हो गए और देश की आम जनता का शोषण पूर्ववत जारी रहा। आजादी मिलने के 15 - 20 वर्षों में ही उससे मोहभंग होने लगा। लोग महसूस करने लगे कि भारत में एक नयी इंडिया का जन्म हो रहा है, जिसके निवासी कॉर्पोर्टेड चमक से लकदक हैं।

 

गाँवों-कस्बों में 'भारत' मजबूत होता गया तो बड़े शहरों में 'इंडिया' रेशमी धूप में नहाती रही। 1992 में विश्व की नयी आर्थिक व्यवस्था के तहत नरसिम्हा राव के नेतृत्व में देश की आर्थिक व्यवस्था में भी आमूल परिवर्तन लाया गया। ये सब आम आदमी के विकास के नाम पर हुआ। वास्तव में यह पूंजीवादी साम्राज्यशाही शक्ति का नव विस्तारीकरण है, जो अब हथियारों से नहीं, अर्थव्यवस्था के जरिये युद्ध लड़ते हुए पूरे विश्वग्राम पर अपनी हुकूमत चलाना चाहता है जिसका प्रतिनिधित्व आज अमीरका कर रहा है। भारत भी अनेक पश्चिमी मुल्कों के लिए आज विराट बाजार ही है, जहाँ उसकी चीजों के उपभोग के लोग आदि होते जा रहे हैं।

 

मूल आधारित भारतीय विरासत का स्वरुप कब का विलुप्त हो चूका है और संवेदनाविहीन विकास के इंद्रधनुषी सपनों के लोग अभ्यस्त हो रहे हैं। भारत का शील, इंडिया के शौर्य में खो-सा गया !

आजादी के 71 वर्षों में विकास की यह गति धीमी नहीं कही जायेगी। अपनी धर्मनिर्पेक्ष एव गुटनिरपेक्ष छवि के कारण भारतीय लोकतंत्र ने दुनिया में बिल्कुल अलग स्थान बनाने में सफलता पायी है, तो इसकी प्रगति-समृद्धि के प्रति भी सभी आश्वस्त हैं। पर सवाल अब भी बना हुआ है कि देश की इस आर्थिक समृद्धि में आम भारतीय का कितना हिस्सा है, बनिस्बत खास इंडियन के।

 

 


- नीरज कृष्ण