हस्ताक्षर रचना
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -41

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
बूँद में कैसे छिपा रहता है सागर देखो
अपने एहसास के दरिया में उतरकर देखो
 
रोती फिरती है वफ़ा इश्क़ में दर-दर देखो
कितने ज़्यादा है ज़माने में सितमगर देखो
 
सर पे मालिक के नए कपड़े की चादर देखो
सारी दुनिया को बनाकर उसे बेघर देखो
 
मैं तेरे इश्क में बेबात फ़ना हो बैठा
काम आया न तेरे दर के मेरा सर देखो
 
देखकर मेरी निगाहों की तलब को यारो!
पानी पानी हुआ जाता है समंदर देखो
 
मुझसे होता तो नहीं तेरा बयां इश्क़ कभी
लोग कहने न लगे मुझको सुख़नवर देखो
 
सारी दुनिया से, फ़रेबों से, अदाकारी से
जल न जाये कहीं 'एहसास' का मंज़र देखो
 
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ग़ज़ल-
 
कल्पना का पथ टटोलें कुछ समय की आह सुन
इस तरह निभ जाये शायद अपनी चाहत अपनी धुन
 
उनकी यादों की कोई सीमा, कोई मंज़िल भी है
मुड़ हकीकी से मजाज़ी या जगत की पीर बुन
 
बेगुनाही का मज़ा इस बात से दुगना हुआ
मेरे क़ातिल ने कहा है ख़ुद सजा की राह चुन
 
एक मिसरा उनपे भी हो जिनसे होती है ग़ज़ल
फाइलातुन, फाइलातुन, फाइलातुन, फाइलुन
 
प्रेम की इस व्यंजना में इक अमिट अनुराग है
वो न मेरा नाम लेती, कहती है बस मेरे उन
 
फैसले सारे फिर उसके बाद ही लिक्खे गये
ज़िन्दगी में वेदना का इश्क़ था पहला शगुन
 
जाने कैसे सामना हो तेरा और 'एहसास' का
तू नियंता मैं अधीना अवगुणी मैं तू अगुन
 
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ग़ज़ल-
 
ख़ुशी में तू है, है ग़म में तू ही, नज़र में तू, धड़कनों में तू है
मैं तेरे दामन का फूल हूँ, माँ मेरी रगों में तेरी ही बू है
 
हर एक लम्हा सफ़र का मेरे, भरा हुआ है उदासियों से
ये तेरी आँखों की रौशनी है, जो मुझमें चलने की आरज़ू है
 
है तेरे क़दमों के नीचे जन्नत, ज़माना करता तेरी इबादत
तेरे ही रुतबे का देख चर्चा, माँ सारे आलम में चार सू है
 
तमाम हैं रौनकें जहां में, जो बेकरारी नज़र में भर दें
मगर जो खाता है चोट इन्सां, लबों पे आती माँ सिर्फ तू है
 
मेरे गुनाहों की आँधियों में, ये सारा गुलशन बिखर गया था
खिला है हाथों मेरे चमन फिर, रगों में क्योंकि तेरा लहू है
 
कहीं कहा मादरे-वतन और, कहीं कहा है भवानी दुर्गा
है ज़र्रे-ज़र्रे में तेरा जलवा, ज़माने में तेरी ज़ुस्तज़ू है
 
बलि चढ़े हैं पहन तिरंगा, तुम्हारे बेटे ओ भारती माँ
बंधा है माथे पे भी कफ़न ये, हमारी धड़कन भी सुर्ख रू है
 
तमाम दुनिया तमाम मज़हब, कोई भी युग हो मगर मुसलसल
ज़माने भर की कहानियों का, तू ही है हासिल तू ही शुरू है
 
तू पन्ना माँ है तू रानी झाँसी, है जीजाबाई लगन शिवा की
सदा से अपने लहू की खातिर, तू ख़ुद बलि है तू जंगजू है
 
बसर ने अपनी हवस की खातिर, बना दिया है जहां जहन्नुम
शिकस्त हो या फ़तेह कहीं हो, ज़मी पे बहता तेरा लहू है
 
छलक उठी है मेरी निगाहें माँ, तेरी बातों का ज़िक्र करके
ये अदला-बदली की सारी दुनिया, वफ़ा की सूरत तू हू-ब-हू है
 
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ग़ज़ल-
 
बेचैनियों के रंग सवालो में भर गये
मंज़िल से पूछता हूँ कि रस्ते किधर गये
 
दिल को निचोड़ा इतना कि एहसास मर गये
ख़ुद को बिगाड़ कर तुझे हम पार कर गये
 
मुझको उदास देखा जो मिलने के बाद भी
वो अपने दिल का दर्द बताने से डर गये
 
पूनम की शब का चाँद जो खिड़की पे आ गया
कमरे में मेरे यादों के गेसू बिखर गये
 
साहिल की कैद में कहीं जलती है इक नदी
मेरे ख़याल रेत के दरिया में मर गये
 
वीरानियों को अपना मुकद्दर समझ लिया
सारे फ़रेब सहके वो चुप में उतर गये
 
महताब पर नहीं है हवा भी सकून भी
सन्नाटा दिल में भरने को हम क्यों उधर गये

- मनोज एहसास
 
रचनाकार परिचय
मनोज एहसास

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