सितम्बर 2015
अंक - 7 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

गीत

गीत

इस पुराने आइने को तोड़ डालो

अब नहीं बारीकियाँ इसमें बची हैं
वक़्त की पिछली लकीरें ही खिची हैं
खो चुका है अर्थ कमरे से हटा लो
इस पुराने आइने को तोड़ डालो

एक चेहरे से कई चेहरे मिले हैं
होंठ इसके सच बताने से सिले हैं
हाथ इसके हाथ से अपना छुड़ा लो
इस पुराने आइने को तोड़ डालो

कह रहा है कौन यह चटखा नहीं है
सिर्फ चेहरों के लिए अच्छा नहीं है
सख़्त है सच की तरह इसको बचा लो
इस पुराने आइने को तोड़ डालो

मान लो तुमने इसे देखा नहीं है
धर्म आँखों का कभी समझा नहीं है
बोझ पलकों पर न कोई और डालो
इस पुराने आइने को तोड़ डालो


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गीत

जितने साथ गए थे लेकर उतने लेकर आए
बोलो अपनी लाचारी के दिन कैसे अब जाए
तुम तो शहर गए थे कहकर
माँ चिंता मत करना
खीझ भरे सारे तानों को
चुपके चुपके सहना
लेकिन तुम आए तो केवल कुछ यादें ही लाए

बनिए ने जो कर्ज़ दिया था
कैसे उसे चुकाऊँ
अपना चाहे मुनिया का मैं
शीलहरण करवाऊँ
पिछले सारे कर्ज़ों को अब आखिर कौन चुकाए

तुम अपने घर में रहते तो
कुछ ना कुछ तो होता
मेरे संग-संग कुत्ता अपना
भूखा यूं ना सोता
भूखे रहकर हम दोनों ने कितने समय बिताए


- अनिरुद्ध सिन्हा

रचनाकार परिचय
अनिरुद्ध सिन्हा

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