प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -45

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
एक छोटी-सी कोशिश
 
माना कि आसान नहीं होता है
अपनी सोच को बदलना
पर एक छोटी-सी कोशिश
दिशा बदल सकती है, परिवर्तन ला सकती है
 
करें एक छोटी-सी कोशिश
अपनी तनी गर्दन को थोड़ा सीधे कर
अपने अहंकार को परे सरका
चेहरे पर मुस्कान ला
देखें आस-पास कोई ज़रूरतमंद तो नहीं है
तमाम मुसीबतजदा महिलाएँ होती हैं
बहुत-से लोग भूखे ही सो जाते हैं
हो सके तो हाथ बढ़ाएँ, सहायता दें
किसी शव यात्रा में कांधा दें
किसी ग़रीब कन्या के विवाह में मददगार बनें
कभी-कभी अनाथालयों का भी रुख करें
वृद्धाश्रमों में भी देखें
हम ख़ुद में कितना सिमट गये हैं
अपने खोल से बाहर निकलें
मंदिर में दिया जलाने से पहले
ख़ुद के दिल को नेक ख़यालों से रोशन करें
 
हमारी एक छोटी-सी कोशिश
कुछ चेहरों पर मुस्कान ला सकती है
बदले में मिलने वाले आत्मिक सुख की कोई सीमा नहीं है
 
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सभ्यता
 
चाहें दर्द कितना ही क्यों न बढ़ जाये
तुम्हें हर हाल में मुस्कराना है
तुम्हारे माथे पर शिकन नहीं दिखनी चाहिए
तुम्हारे लफ्ज़ शिकायती नहीं होने चाहिए
 
तुम्हें उचित शब्दों का प्रयोग कर
अपने दर्द को परिभाषित करना है
तुम्हारे आँसू...तुम्हारी प्रतिक्रिया का
दूसरा ही मतलब निकाला जायेगा
 
मी लॉर्ड! आप भाग्य विधाता हैं
चाँद-तारे आपकी मुट्ठी में हैं
आपकी आँखें खुलते ही रोशनी होती है
आपके उदास  होते ही शाम हो जाती है
 
अब अंधेरे उजाले एक जैसे लगते हैं
कुछ दूर तक उड़ने के बाद वापस लौटने पर
कुछ चेहरे गर्व की मुद्रा में तने हुए दिखते हैं
कीचड सने पैरों के साथ
तुम्हारे चमकदार कालीन में पैर रखने से घबराता हूँ
दरअस्ल हैसियत ही सामाजिक प्रतिष्ठा का मापदंड हुआ करती है
 
तुम नित नवीन आसमान नापने वाले सूरमाओं
मैं अकिंचन, अपनी ही दुनिया में सिमटा एक कीट
 
मैं सभ्यता का लिबास पहन
दो घड़ी तुमसे बात करना चाहता हूँ
गर तुम्हारी इज़ाजत हो तो

- अनुपम सक्सेना
 
रचनाकार परिचय
अनुपम सक्सेना

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कविता-कानन (2)