प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
अगस्त 2018
अंक -43

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

कविता-कानन
प्यार में विवशता
 
मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ वाक़ई
बहुत प्यार है मुझे तुमसे किन्तु
दवाइयाँ बहुत मँहगी आती है तुम्हारी बीमारी की और
आलिंगन करते हुए दम फूलने लगता है मेरा भी
बावजूद इसके मैं तुम्हें प्यार करता हूँ
 
गर्मियाँ इतनी तेज़ हैं कि सिर भन्ना रहा है और
आँधियाँ रेत के बगूले लेकर आ रही हैं छत पर
बिजली ग़ायब है दो-तीन घण्टे से और
पानी कल भी आयेगा या नहीं इसकी चिन्ता में
हम दोनों बहुत परेशान हैं अभी
रात का दूसरा पहर शुरू ही हो रहा है कहीं
बहुत दूर से सुनाई दे रहा है झिंगुरों का समवेत-संगीत
बीच-बीच में गूँज पड़ती है उलूक-ध्वनि
कर्कशता का सीधा रिश्ता जोड़ते हुए अँधकार से
कोई कुत्ता विलाप कर रहा है बाहर सड़क पर
 
शायद कल ही आख़िरी तारीख़ है
बैंक में जीवित प्रमाण-पत्र दाख़िल करने की और
कई बार तुम्हारी शिकायत वाजिब भी लगती है
कि मेरा प्यार कम होता जा रहा है तुम्हारे प्रति
लेकिन मैं सच कहता हूँ अपने हृदय की साक्षी में कि
मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ अभी भी
बस तुम भी तो समझो समय की क्रूरता में लिथड़ी
मेरी विवशताएँ यदि तनिक धैर्य से
 
तुम्हें शायद पता नहीं कि
सिर्फ़ इसीलिये छोड़ दिया मैंने सिगरेट पीना भी
 
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शाश्वत शब्द
 
अभी-अभी भाग गया है
कोई शब्द
और मैं भौंचक्का-सा
देख रहा हूँ शून्य में कि
बहुत मुश्क़िल से
उसे पकड़ कर लाया था
अपने विचारों में जबकि
शब्दों का अकाल पड़ा है
समूची भाव-भूमि पर
 
ओह! अभी-अभी भाग गया
वह जीवित शब्द अकेला-सा
दिमाग़ के घोड़े तो दौड़ा दिये हैं
उसके पीछे मैनें
कल्पना के पंख भी फैला दिये हैं
चारों तरफ़
हवाओं को भी लगा दिया है
उसे पकड़ने और
रोशनी से भी कह दिया
उसे ढूँढ़ने के लिये
कोशिश तो पूरी कर रहा हूँ
कि ले ही आऊँ उसे वापस
 
किन्तु यह जो है
"जले ठूँठ पर बैठी हुई कोकिला"
बाबा ने जिसकी कुहूक सुन ली थी
वर्षों पहले
इसकी अगर मानूँ तो अभी
और झेलनी चाहिये
जेठ की धूप मुझे कुछ दिन
तपानी चाहिये अपनी देह यह
सुविधाजीवी कुछ और
दहकानी चाहिये
सपनों की रक्तिम आग
और फिर पूरी तन्मयता के साथ
बुलाना चाहिये उसे
जो भाग गया
 
भागा हुआ शब्द
जब मान लेगा मुझे अपना
पूर्ण विश्वसनीय
ख़ुद ही चला आयेगा
रोशनी में दमकता
हवाओं में उड़ता हुआ
मेरी कल्पना के पंखों पर
यथार्थ की तरह सवार
घोड़े से भी तीव्र गति वाला शब्द
तब मेरा अपना होगा
और 'शासन की बंदूक'
बाल भी बाँका नहीं कर सकेगी
बुराई के विरुद्ध शस्त्र बने
उस निर्विकार और निश्छल
शाश्वत शब्द का
 
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तुम आना ज़रूर
 
पहुँच रहा हूँ मैं वहीं
नदी किनारे वाले उसी पीपल के पास
जहाँ कुछ दिन पहले मिले थे हम
ज़रूर आना तुम वही
लाल बूटों वाला कुर्ता पहने
पीली सलवार के साथ
हरा दुपट्टा लगाकर
और कुछ ख़ास सिंगार की ज़रूरत नहीं, बस
अपने बाल खुले ही रखना
 
आना तुम ज़रूर कि मुझे
कहनी हैं बहुत-सी बातें जैसे कि
मैं किसी अमानवीय ग़ुनाह में नहीं पकड़ा गया था
और न ही मैंने माफ़ीनामा लिखा अपने
नारे लगाने के बारे में सरकार के खिलाफ़
मैं केवल हरे-भरे गुलमोहर के लाल फूलों और
अमलतास की गोल फलियों के लिये चिन्तित था
जिन्हें काटा जा रहा था
राष्ट्रीय राजमार्ग की चौड़ाई बढ़ाने के लिये
और मुझे आशंका थी कि
नदी पर पुल बनाने के बहाने वे
इस पीपल को भी काट सकते हैं जबकि
उफन कर बहे तो
एक अरसा हो गया इस नदी को
वे हथियाना चाहते हैं हमारी ज़मीन
जैसे पहले हथिया चुके हैं
बाँध बनाने के नाम पर
 
तुम आना ज़रूर
कि मैं पहुँचने ही वाला हूँ बस
पीपल के बगल में उस टीले के पास
मैं तुम्हारे ललाट पर करना चाहता हूँ
एक भरपूर चुम्बन
पता नहीं बच पायेगा कि नहीं यह पीपल-वृक्ष
कुछ ज़रूरी बातें कर लें हम परस्पर कि
यदि पकड़ा भी जाऊँ मैं दुबारा
इसे बचाने की कोशिश में
तुम मुझ पर यक़ीन रखना कि
मैं किसी अमानवीय ग़ुनाह में नहीं पकड़ा गया
बल्कि हमारे प्रेम की स्मृतियों को
जीवित रखने के ग़ुनाह में
उन्होंने मुझे
ज़बर्दस्ती और बेवजह पकड़ा था

- कैलाश मनहर
 
रचनाकार परिचय
कैलाश मनहर

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