प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल और महिला ग़ज़ल
ग़ज़ल का एक अर्थ 'मेहबूबा से गुफ़्तगू करना' है। किसी प्रिय से गुफ़्तगू करते वक़्त लहजे में ख़ुद-ब-ख़ुद नज़ाकत आ जाती है। यही नज़ाकत ग़ज़ल की जान भी है। जिस नाज़ुकी के साथ ग़ज़ल बड़ी से बड़ी बात बहुत सलीक़े से कह जाती है, वह बात और कहीं नहीं मिलती। कुछ-कुछ यही नज़ाकत एक महिला में भी स्वाभाविक रूप से देखने को मिलती है। सिर्फ नज़ाकत नहीं- तेवर, फ़िक्र, सरोकार, संचेतना; इन सबसे लेस रहती हैं महिलाएं और ग़ज़ल दोनों। समय और समाज का बहुत दिलेरी से सामना करती हैं ये। शायद इसी वज्ह से महिला को भी ग़ज़ल कहा गया हो।
 
अब अगर ग़ज़ल के सन्दर्भ में महिला की बात निकली है तो महिला के सन्दर्भ से ग़ज़ल की बात भी होनी चाहिए। साहित्य और ग़ज़ल दोनों में ही महिलाओं ने आरम्भ से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी थी। लेकिन अपने सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश ने उसे कभी खुलकर अभिव्यक्त होने की छूट नहीं दी। घुट-घुटकर अभिव्यक्ति करता यह स्वर विपरीत परिस्थितियों में भी अपने वजूद को बचाये रहा। कालान्तर में तमाम बेड़ियाँ धीरे-धीरे टूटती गयीं और सभी क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी महिलाओं ने अपना दावा मजबूती से पेश किया। अब हालात बेह्तर हो रहे हैं और बेह्तरी की उम्मीद क़ायम है।
 
ग़ज़ल पढ़ते-खोजते और इस विधा पर काम करने के दौरान यह देखने में आया कि इस क्षेत्र में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। बीसियों पुरुष ग़ज़लकारों को पढ़ने-देखने के बाद कहीं जाकर एकाध महिला ग़ज़लकार सामने आती है। इस बात की दलील वरिष्ठ ग़ज़ल आलोचक हरेराम समीप जी द्वारा 3 खण्डों में सम्पादित 'समकालीन ग़ज़लकार: एक अध्ययन' में देखने को मिलती है, जहाँ कुल 108 ग़ज़लकारों पर हुए आलोचनात्मक काम में मात्र 4-5 महिला ग़ज़लकार बा-मुश्किल नज़र आती हैं। यही हालात हिन्दी के ख्यात साहित्यकार कमलेश्वर द्वारा सम्पादित और राजकमल द्वारा प्रकाशित 'हिन्दुस्तानी ग़ज़लें' में भी हैं और कुछ यही हालात 'समकालीन हिन्दुस्तानी ग़ज़ल' (एंड्राइड एप) में भी दिखते हैं, जो मैंने सम्पादित किया है। इस एप में अब तक कुल 201 ग़ज़लकार शामिल हैं, जिनमें महिला ग़ज़लकारों की संख्या मात्र 31 है। हालाँकि यहाँ प्रतिशत थोड़ा सुधरा हुआ दिख रहा है लेकिन सौ में सिर्फ पन्द्रह, कहीं तक अच्छा नहीं कहा जा सकता।
 
अब इस स्थिति के कारणों पर गौर करें तो कई बातें निकलकर आती हैं। पुराने समय में महिलाओं की कम शिक्षा, तरह तरह की पाबंदियाँ, समुचित प्लेटफॉर्म्स का उपलब्ध न होना, इस दिशा में हुए कम प्रयास जैसी कई वज्हें हैं इस स्थिति के लिए उत्तरदायी हैं। घर-परिवार, बच्चों और काम के बीच एक महिला को अपने शौक़ के लिए समय निकालने में कितनी मुश्किल होती है, यह सिर्फ वही समझ सकती है। एक कारण आपसी ईर्ष्या का भाव भी दिखता है मुझे, जो एक-दूसरे को सहारा दे; आगे बढ़ने की भावना की स्थापना में बाधक रहा। कारण कितने ही गिनाएं जाएँ लेकिन मूल बात यह है कि ग़ज़ल में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षानुरूप नहीं है।
 
अब प्रश्न ये उठते हैं कि 'ग़ज़ल में महिलाओं की उपस्थिति क्यों ज़रूरी है?'
'महिला ग़ज़ल कहकर ग़ज़ल को हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल की तरह बाँटना कितना समुचित है?
तो उत्तर यह है कि एक पुरुष और एक महिला की सोच, संस्कार, परिवेश, धारणाएँ सर्वथा भिन्न होती हैं। ऐसे में दोनों का दुनिया को देखने का नज़रिया और दोनों के प्रति दुनिया का रवैया अलग-अलग होता है। यानी एक पूरा परिदृश्य अलग है। महिला के दृष्टिकोण से जो ख़याल निकलेंगे, वे एक पुरुष ग़ज़लकार के नज़रिये से बिलकुल अलग और नए होंगे। ग़ज़ल में नई फ़िक्र, नए ख़याल और नई कहन का अपना महत्त्व है। जहाँ तक बात 'महिला ग़ज़ल' की है तो यहाँ मुद्दा महिला ग़ज़ल नहीं, ग़ज़ल में महिला स्वर का है। ग़ज़ल को हम चाहे कितने ही खांचों में बाँट लें, लेकिन ग़ज़ल हमेशा ग़ज़ल ही रहेगी। यहाँ महिला ग़ज़ल को ग़ज़ल से अलग करने जैसा कोई प्रयास नहीं है, बल्कि एक कोशिश है कि इस पहलू पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
 
पिछले कुछ महीनों में 'हस्ताक्षर' के इस महिला ग़ज़ल अंक और किताबगंज प्रकाशन के '101 महिला ग़ज़लकार' संकलन के लिए सैकड़ों महिला ग़ज़लकारों की रचनाएँ पढ़ने के बाद मेरे सामने स्पष्ट है कि इस समय कुछेक ग़ज़लकारों को छोड़कर लगभग सभी वही पुराने घिसे-पिटे ख़यालों और दायरों के आसपास लेखन कर रही हैं। आधे से ज़्यादा ग़ज़लकार तो हुस्न-इश्क़, फूल-पत्तियों से भी बाहर नहीं निकल पायीं हैं। जब तक लेखन में उसका समय नहीं बोलता, तब तक वह लेखन मात्र समय की बर्बादी है। हमारे वर्तमान परिवेश की चुनौतियों, समस्याओं, सरोकारों का लेखन में उकेरा जाना बेहद ज़रूरी है, हमें इस बात को समझना होगा। एक महिला ग़ज़लकार अपने आसपास की बातों को, अपने दुःख-सुख को, अपनी समस्याओं को, अपने और अपने परिवार-समाज से जुड़ी खुशियों को ग़ज़ल के शेर में ढालकर ग़ज़ल के फ़लक को और विस्तार दे सकती है। डॉ. रमा सिंह, ममता किरण, मालिनी गौतम, इंदु श्रीवास्तव और डॉ. भावना जैसी कुछ ग़ज़लकाराएँ अपनी ग़ज़लों में इन्हीं सरोकारों की उपस्थिति के कारण ही आज शीर्ष ग़ज़लकारों की सफ़ में हैं।
 
कुल 60 महिला ग़ज़लकारों की ग़ज़लों, दो महत्वपूर्ण शख्सियतों के साक्षात्कार, कुछ आलेखों सहित महिला ग़ज़ल से जुड़ी विभिन्न सामग्री लिए 'हस्ताक्षर' का यह प्रयास ग़ज़ल में महिला स्वर की स्थिति पर चर्चा करने में सफल होगा, इस उम्मीद के साथ इस अंक के निर्माण में सहभागिता देने वाले समस्त सहयोगियों को धन्यवाद और शामिल समस्त ग़ज़लकारों को शुभकामनाएँ।

- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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