महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
रहमत उसी की सबके हैं घर बार ज़मीं पर
इससे नहीं बेहतर कोई उपहार ज़मीं पर
 
यूँ लौट के जाने की ज़रूरत ही नहीं है
बाक़ी हैं अभी तेरे तलबगार ज़मीं पर
 
हमको न भरोसा है किसी कल पे ज़रा भी
करना है तो कर ले अभी इक़रार ज़मीं पर
 
आ जाए अगर वक़्त तो वो जान भी दे दें
क़ायम है अभी ऐसे वफ़ादार जमीं पर
 
देखा नहीं उस और अभी हमने तो जा कर
कैसे कहें कि मिलता है बस प्यार ज़मीं पर
 
है मौत तो फ़ानी वो ले जाएगी सभी को
बचता है फ़क़त एक कलमकार ज़मीं पर
 
नज़रों से भला कौन छुपा उसकी यहाँ पर
देता है ख़बर सबकी वो अख़बार ज़मीं पर
 
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ग़ज़ल-
 
रस्ते की धूल आँखों में आती चली गई
और रौशनी तमाम नज़र की चली गई
 
पानी को शौक़ था कि फिसलते हुए चले
तट के इशारे पे नदी बहती चली गई
 
अफ़सोस अब तुम्हारे लिए कुछ नहीं बचा
कुछ देर पहले आके इक आँधी चली गई
 
ऐ दोस्त! चारागर को विदा कर ख़ुशी-ख़ुशी
तू आया और ग़रीब की रोज़ी चली गई
 
उस नूर को सलाम झुका कर नज़र करो
आते ही जिसके रौशनी होती चली गई

- माधुरी स्वर्णकार

रचनाकार परिचय
माधुरी स्वर्णकार

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ग़ज़ल-गाँव (1)