प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -47

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव
ग़ज़ल-
 
फूल ही फूल थे दिल लगाने के बाद
धूल ही धूल थी होश आने के बाद
 
अब भी इक इक सितम है रग़ों में रवां
पर कहें क्या, मिले हो ज़माने के बाद
 
अब नहीं हौसला फिर से कैसे बने
आरज़ू भी जली, आशियाने के बाद
 
दर्दो-राहत में गो फ़ासला कुछ नहीं
आँख भी भर गयी, मुस्कुराने के बाद
 
बेड़ियाँ बन चुकी हैं अब आदत 'सहर'
दौड़ पाये न हम खुल भी जाने के बाद
 
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ग़ज़ल-
 
अब ये जाना कि इक किताब हूँ मैं
हर्फ़ दर हर्फ़ लाजवाब हूँ मैं
 
आपने एतबार ही न किया
मैं तो कहती रही सराब हूँ मैं
 
मुझसे अपनी नमी न सूख सकी
आप कहते हैं आफ़ताब हूँ मैं
 
हो के मौजूद भी नहीं दिखता
वो अमावस का माहताब हूँ मैं
 
उससे मिलते नहीं उसूल 'सहर'
चाहती जिसको बेहिसाब हूँ मैं

- नीना सहर
 
रचनाकार परिचय
नीना सहर

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