महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 53
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल-गाँव

ग़ज़ल-

बहुत ही नफ़रतें मैं पा रही हूँ
कहाँ इस बात से घबरा रही हूँ

तुम्हें जल्दी भला किस बात की है
ज़रा ठहरों मैं ख़ुद ही आ रहा हूँ

ख़ता मुझसे हुई थी बाँकपन में
जिसे मैं याद कर पछता रही हूँ

ज़रा समझा करो जज्ब़ात मेरे
इशारों में तुम्हें समझा रही हूँ

मुझे भी दर्द देती है मुहब्बत
जिन्हें हँसकर मैं सहते जा रही हूँ


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ग़ज़ल-

ज़िन्दगी को जिया ज़िन्दगी की तरह
तीरगी को लिया रोशनी की तरह

कैसे इंसानियत को हो उम्मीद अब
आदमी अब कहाँ आदमी की तरह

दर्द भोगा मगर सब निभाती रही
सब उसूलों को मैं बन्दगी की तरह

आलमे-इश्क़ में ये हुआ उम्र भर
मेरी चाहत रही तिश्नगी की तरह

'अर्चना' ये तमन्ना है बजती रहूँ
तेरे अधरों पे मैं बासूँरी की तरह


- कुमारी अर्चना

रचनाकार परिचय
कुमारी अर्चना

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ग़ज़ल-गाँव (1)