प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -49

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

महिला ग़ज़लकार
- शकीला बानो



पुराने ज़माने से ही महिलाएँ शायरी कर रही हैं। उन्होंने उर्दू में ग़ज़ल कही हैं तो फ़ारसी में भी हाथ आज़माया है। जयपुर की मशहूर शायरात में मोहतरमा मलका नसीम, डॉ. ज़ीनत कैफ़ी, डॉ. ज़ेबा ज़ीनत के नाम मंज़रे-आम पर आते हैं। मोहतरमा ज़ेबा ज़ीनत की किताब 'परवाज़-ए-क़लम' की इशाअत 2011 में हुई, जिसमें मौसूफ़ा ने मुख़्तलिफ़ मज़ामीन, मक़लात, अफ़साने वग़ैरह लिखे हैं। शायरों के हवाले से कुछ शायरों के शायरी के तज़करे भी किये हैं। हर दिल अज़ीज़ शायरा मोहतरमा परवीन शाकिर के कलाम का तज़किरा बड़े तफ़सील (व्याख्या) से किया है। पाकिस्तान की मशहूर शायरा किसी तार्रुफ़ की मोहताज नहीं। 'ख़ुशबू' उनकी पहली किताब शाये (प्रकाशित) होकर मंज़रे-आम पर आई। इसमें ग़ज़लें, नज़्में, क़ताआत वग़ैरह सब कुछ हैं। ज़बान सादा और दिलकश है। मुलाहज़ा फरमाएँ-

ज़बाने-ग़ैर में लिखा है तूने ख़त मुझको
बहुत अजीब इबारत बहुत औके तहरीर
ये सारे हर्फ़ मेरी हदे-फ़हम से बाहर हैं
मैं एक लफ़्ज़ भी महसूस कर नहीं सकती


और उनका ये शेर भी कि-

तू बदलता है तो बेसाख़्ता मेरी आँखें
अपने हाथों की लकीरों से उलझ जाती हैं


अफ़सोस, सद अफ़सोस कि ये मशहूर शायरा एक एक्सीडेंट में जां बहक हो गई, वर्ना हमें उनसे उर्दू की ख़िदमत के लिए बड़ी उम्मीदें थीं। कम उम्र में ही उर्दू अदब में उन्होंने ख़ास मुक़ाम बना लिया था।

मोहतरमा ज़ेबा ज़ीनत की ग़ज़लें अलीगढ़ से शाया होने वाली 'जरीदा' में शाया हुई हैं। एक मशहूर ग़ज़ल पेशे ख़िदमत है-


ऐ हमनशीनों तर्ज़े मुलाक़ात क्या कहें
कैसे कटे हैं शौक़ के लम्हात क्या कहें
वो चार दिन कैफ़ जा जज़्बात क्या कहें
गोया किसी से ख़्वाब के हालात क्या कहें
हाँ भूलने की कोशिश पैहम के बावजूद
घेरे हुए हैं कितने ख़यालात क्या करें
बूँदों के साथ रोए, तड़पे घटा के साथ
काटी है किस तरह शबे-बरसात क्या करें
'ज़ेबा' न छेड़िये ग़मे-माज़ी की दास्तान
यानी गुज़ार आये वो हालात क्या करें


इन शायरात के अलावा उर्दू शायरी की पाँच तारीख़साज़ सगी बहनें बनाम शमीम ज़ोहरा, डॉ मीना नक़वी, नुज़हत अब्बास, डॉ नुसरत मेहदी और अलीना इतरत को टी वी पर मुशायरों में देखा जा सकता है। यही नहीं ग़ैर मुस्लिम ग़ज़लकार भी अपना कमाल दिखाने में पीछे नहीं हैं। उनमें लता हया और दीप्ति मिश्रा की शायरी तो बेमिसाल है। ख़ुदा उन्हें शोहरत और मक़बूलियत से नवाज़े।

अलीगढ़ की मोहतरमा सबीहा सुम्बुल नए एहद की एक बाशऊर और साहिबे-इदराक शायरा हैं। उनका मख़सूस लहजा अपने हमअसर (साथी) शायरों में मुमताज़ करते हुए यह कहने पे मजबूर करता है-


मैं एक हक़ीर परिंदा सही मगर 'सुम्बुल'
बहुत बुलंद हूँ ऊँची उड़ान वालों से


कमउम्री में ही वाल्देन (माता-पिता) का साया सर से उठ गया। परवरिश बड़ी बहन और बहनोई ने की, जिन्होंने माँ-बाप की कमी का एहसास नहीं होने दिया। बहनोई बड़े उस्ताद शायर थे। सबीहा संबुल की इब्तिदाई (आरम्भिक) तालीम कॉन्वेंट में होने के बावजूद अरबी व शे'री माहौल में परवरिश पाने की वज्ह से उर्दू ज़बान से रग़बत खुद-ब-ख़ुद पैदा हो गई। सबीहा संबुल 30 बरस से शेर कह रही हैं। वो जितना अच्छा शेर कहती हैं, उतना अच्छा पढ़ती भी हैं। गुज़िश्ता दौर में वो आल इंडिया मुशायरों की रूहे-रवां रही हैं। वो शायरी के दौर में ख़ुदा से दुआ मांगती हैं-

मेरे क़लम को वो वुसअतें अता कर या रब
कि जिस से तेरी और रसूल की बातें
यूँ ही लिखती रहूँ और होश भी न रहे
कि इस जहां में हूँ या तेरी जन्नतों में हूँ


सबीहा संबुल की ग़ज़लें और नज़्में दोनों हो मशहूर हैं। हिंदुस्तान के मुशायरों में उनकी शिरकत (भागीदारी) लाज़मी समझी जाती थी। दरअस्ल उनके बहनोई एक अच्छे शायर थे और उन्हें मुशायरों से ख़ासी दिलचस्पी थी। उनके साथ सबीहा संबुल को भी बहुत से मुशायरों में शिरकत का मौक़ा मिलता था।

अदबी शे'री माहौल में परवरिश पाने की वज्ह से सबीहा संबुल की सिर्फ़ पंद्रह साल की उम्र से ही बाक़ायदा ग़ज़ल कहने की सलाहियत पैदा हो गई। उर्दू एकेडमी दिल्ली, जश्ने आज़ादी मुशायरा में अपना कलाम पेश किया। इस बाविक़ार शायरा ने फ़ैज़ाबाद, मुज़फ्फर नगर, ख़ुरजा वग़ैरह मुख़्तलिफ़ शहरों में अपनी ग़ज़लियात सुनाकर सामेईन को महज़ूज़ किया। 2016 में उनका पहला शे'री मजमूआ 'हर्फ़ हर्फ़ किरन' शाया हुआ। किताब का पहला शेर-


जिगर के ख़ूं से मज़ामी की फ़स्ल उगती है
शऊरे-फन ही बनाता है हर्फ़ हर्फ़ किरन


सबीहा संबुल का एक और शेर जो उनकी ख़्वाहिश भी है-

ख़्वाहिश है कि गुफ़्तार में तासीर हो पैदा
'संबुल' लबो-लहजे में वो आहंग यो लाओ


सबीहा संबुल की किताब में ग़ज़लें, नज़्में, क़ताआत, नात, मुनक़बत, मुफ़ररिक अशआर सभी कुछ हैं। उनका एक शेर तो बहुत मक़बूल हुआ है-

कह रहा है सदियों से ताज का हसीं चेहरा
फ़न अगर मुकम्मिल हो बोलती हैं तस्वीरें


'हर्फ़ हर्फ़ किरन' से पहले संबुल की नातिया कलाम पर पुरतामिल मिलाद की किताब की शक्ल में 'राहे-निजात' के नाम से शाया हो चुकी है। सबीहा संबुल ने ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से किया। शिखर साहित्य संस्थान अलीगढ़ से श्री शिखर सम्मान भी मिला है।

शादी के बाद शौहर सरकारी नौकरी में इंजीनियर होने की वज्ह से मुशायरों का सिलसिला मुनक़ता हो गया। उनका कलाम रसाइल (पत्रिकाओं) और नाशिस्तों  (गोष्ठियों) तक ही महदूद (सीमित) हो के रह गया। उनकी एक नज़्म 'मैं कौन हूँ' औरत के इस्तेहाल की दास्तान के साथ ख़ुद एतिमादी से लबरेज़ है। इस बाविक़ार व बाएतबार शायरा के लिए दुआगो हैं। ख़ुदा उन्हें मक़बूलियत और शोहरत से नवाज़े।

सबीहा संबुल की एक मशहूर ग़ज़ल पेश है-


दीदावरों में कोई न जलवावरों में है
जो बेहुनर है आज कसे दानिशवरों में है
हर लम्हा आ रहा है नई रुत लिए हुए
गुम आज तक तो गुज़रे हुए मंज़रों में है
चेहरे हैं पुरख़ुलूस दिलों में कुदूरतें
गलियों में रोशनी है अंधेरा घरों में है
सदियों से था जो ख़ुद ही तमाशा बना हुआ
अब उसका नाम भी तो तमाशगारों में है
तय कर रहा था राह जो बैसाखियाँ लिये
'संबुल' शुमार उसका भी अब रहबरों में है


- शकीला बानो
 
रचनाकार परिचय
शकीला बानो

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