प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
महिला ग़ज़ल अंक
अंक -44

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

ग़ज़ल पर बात

पाठक को अपने सम्मोहन में बाँधती ग़ज़ल
- के. पी. अनमोल



कभी-कभी ऐसी ग़ज़लें पढने में आती हैं कि बस जी ख़ुश हो जाता है। मेरे साथ तो ये अक्सर होता है कि कोई ग़ज़ल पढ़ लूँ तो उसका ख़ुमार कई दिन तक न उतरे। अब ख़ुदा जाने इनके शब्दों में कोई जादू होता है या रवानी में कोई नशा! लेकिन ये ग़ज़लें अक्सर सिर पर चढ़ी रहती हैं।
ऐसी ही एक ग़ज़ल कुछ समय पहले एक प्यारी-सी बच्ची सरगम अग्रवाल की पढ़ी थी। पढ़ी क्या थी, घोंटकर पी ली थी कि अब भी एक-एक शे'र याद है और जब-तब कोई शे'र ज़ेह्न में कूदने लगता है। यह ग़ज़ल कुछ ऐसी है कि एक-एक शेर बोलता हुआ है। इतनी छोटी उम्र में ऐसे सलीक़े से शेर कहना और वो भी जुदा अंदाज़ में! वाकई कमाल है।

ग़ज़ल का जादू मत्ले के साथ ही सिर चढ़ना शुरू हो जाता है, जहाँ ग़ज़लकार कहती हैं कि-


बरसों ख़ुद को चुप ही रक्खा, बोल पड़ा
महशर की शब आयी, गूँगा बोल पड़ा


'गूंगा बोल पड़ा' ज़ब्त ही इन्तिहा कहिए। एक अरसे तक ख़ुद को समेटे, थामे हम भी जब कभी पानी सर से ऊपर चढ़ने लगता है तो अचानक 'बोल पड़ते हैं' और फिर ऐसे बोलते हैं कि जैसे सदियों से गूंगे थे और अब तक का जो जमा हुआ लावा है, आज ही बह के मानेगा। ग़ज़ल का मत्ला एक कसक लिए हुए है, जिसमें रचनाकार ने शब्दों को या बह्र को नहीं बाँधा, पाठक को बाँध दिया है जो पूरी ग़ज़ल पढ़े बिना नहीं छूट सकता। हद ये है कि पूरी ग़ज़ल पढ़ लेने के बाद पाठक ख़ुद इसके सम्मोहन से नहीं छूटना चाहता, तब वो चाहता है कि अब इस ग़ज़ल के साथ ही रहे।

लड़की, रस्सी, यादें, कमरा, बेचैनी
इश्क़ बड़ा भारी था, पंखा बोल पड़ा


यहाँ तो मंज़रकशी है। कुछ ही शब्दों में कमरे के भीतर का एक दृश्य खिंच जाता है और फिर अंजाम!
यही तो होता है अक्सर आसपास। घर की इज़्ज़त, परिवार की इज़्ज़त, ख़ानदान की इज़्ज़त, हज़ार बंदिशें और फिर पल भर में सबकुछ ख़त्म। इश्क़ बहुत भारी होता है, काश हम यह समझ पाते और अपने बच्चों को सही समझ, सही परिवेश और ख़ास, सही परवरिश दे पाते कि पंखे से दुःख बाँटने की बजाय, बच्चा अपनी माँ की गोद या बाप के कन्धे पर ख़ुद को हल्का कर रहा होता।


कम से कम सामान तो बिखरा रहने दो
तन्हाई से डरकर, कमरा बोल पड़ा


एक बार फिर कमरा, लेकिन अबकी तनहाई का मारा, डरा-सहमा। ऐसे समय में जब हर कोई अपने आप में व्यस्त है, ऐसे में घर के हर कोने की हालत यही है कि वो अपने ग़म किससे बाँटे! तब यह गुज़ारिश कि कम से कम सामान तो बिखरा रहने दो!
हमारे समय में तो बच्चे और उनकी धमाचौकड़ी घर या कमरे को इतनी मोहलत भी न देती थी कि वह साँस भी ले सके। यहाँ कमरे को आप घर का बुज़ुर्ग भी मान सकते हैं।


लौट रहा था वापस कल सैय्याद मगर
इक चिड़िया ज़िन्दा है, पिंजरा बोल पड़ा


'पिंजरा बोल पड़ा' मिस्रे का यह हिस्सा शेर की जान है। पिंजरे का मानवीकरण करके यह दर्शाना कि ज़ालिम से ज़्यादा ख़तरनाक उसके साथी होते हैं, एक फ़लसफ़ा बयान करता है। सय्याद और चिड़िया पर अब तक ख़ूब कहा जा चुका है लेकिन यह शेर अपनी कहन और ज़ाविये की वज्ह से कुछ अलग है।

बाल दिला दो गुड़िया के और झूला भी
मेरे अंदर से इक बच्चा बोल पड़ा


'गुडिया के बाल' यह शब्द तो कान में पड़ते ही एक युग पीछे ले जाकर छोड़ देता है, जहाँ सिर्फ बहुत बड़ी दुनिया और छोटा-सा बचपन होता है, उमंगें होती हैं, ज़िद होती है, सपने होते हैं। दुनिया भर की समझदारी आ जाने के बाद भीतर से छोटे बच्चे की आवाज़ें आनी धीरे-धीरे बन्द हो जाती हैं लेकिन यकीन मानिए वो बच्चा कभी मरता नहीं है। ज़रा-सा दुलारने, समय देने से वो फिर मचलना शुरू कर देता है और दुनिया फिर बचपन के दिनों जैसी ख़ुशनुमा हो उठती है लेकिन इतना सोचने भर की फ़ुरसत किसे है!

फूलों ने ख़ुद ख़ुुशबू सौंपी, उकसाया
माली ने पूछा तो भँवरा बोल पड़ा


आह्ह! यही तो होता है कि अक्सर भँवरे रूपी मनचले द्वारा दोषारोपण उस मासूम के कपड़ों या बातों पर किया जाता है, जिसने ज़िन्दगी भर यातना सहनी है। यही सब तो देखने को मिल रहा है आज समाज में कि मर्द (?) की नज़र या हरकत चाहे कितनी ही गन्दी क्यों न हो, उसका सारा दोष लड़की के ही सिर मढा जाता है।

दुनिया के लोगों से मुझको नफ़रत है
"तुम भी तो दुनिया हो" लड़का बोल पड़ा


'तुम भी दुनिया हो' यह एक हिस्सा, शेर को कहाँ से कहाँ ले गया। यह हुनर एक उम्दा रचनाकार को सामान्य रचनाकारों से अलग करता है। एक फ़लसफ़ा है इस शेर में लेकिन कितनी सहजता से आपसी संवाद के रूप में शेर अपनी बात रखता है, भई वाह्ह्ह!

किसकी सूरत ले आए हो! कौन है ये!
जब भी मैंने देखा, शीशा बोल पड़ा


एक बहुत आम-सी बात है, आम-सा ख़याल है। जुदा कहन की वज्ह से थोड़ा अलग लगता है लेकिन वही कशिश बरकरार है जो तमाम अशआर में है।

सरगम अग्रवाल की इस प्यारी-सी, पुर-कशिश ग़ज़ल को पढ़ते ही दिल बाग़-बाग़ हो उठता है। ग़ज़ल की अलहदा कहन, ख़यालों की कसक, रदीफ़ का निर्वाह सब सराहनीय है। 'बोल पड़ा' जैसी मुश्किल रदीफ़ को इतनी ख़ूबसूरती के साथ निभा जाना भी इस युवा ग़ज़लकार का सामर्थ्य दर्शाता है। ग़ज़लकार को इस उल्लेखनीय ग़ज़ल के लिए मुबारकबाद के साथ ढेर सारी दुआएँ।

 

 

समीक्ष्य ग़ज़ल-

 
बरसों ख़ुद को चुप ही रक्खा, बोल पड़ा
महशर की शब आयी, गूँगा बोल पड़ा
 
लड़की, रस्सी, यादें, कमरा, बेचैनी
इश्क़ बड़ा भारी था, पंखा बोल पड़ा
 
कम से कम सामान तो बिखरा रहने दो
तन्हाई से डरकर, कमरा बोल पड़ा
 
लौट रहा था वापस कल सैय्याद मगर
इक चिड़िया ज़िन्दा है, पिंजरा बोल पड़ा
 
बाल दिला दो गुड़िया के और झूला भी
मेरे अंदर से इक बच्चा बोल पड़ा
 
फूलों ने ख़ुद ख़ुुशबू सौंपी, उकसाया
माली ने पूछा तो भँवरा बोल पड़ा
 
दुनिया के लोगों से मुझको नफ़रत है
"तुम भी तो दुनिया हो" लड़का बोल पड़ा
 
किसकी सूरत ले आए हो! कौन है ये!
जब भी मैंने देखा, शीशा बोल पड़ा
 
- सरगम अग्रवाल

- के. पी. अनमोल
 
रचनाकार परिचय
के. पी. अनमोल

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