महिला ग़ज़ल अंक
अंक - 40 | कुल अंक - 55
प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

आलेख

महिलाओं की कलम से ग़ज़ल
- आशा शैली



ग़ज़ल की बात करें तो ज़ाहिर है कि नुसवानी 'नारी' कलम ने वास्तव में ग़ज़ल को कई रंग दिए हैं। कोई ज़माना था, जब कोई इक्का-दुक्का महिला ही इस क्षेत्र में पाँव रखती थी। पर अब, जब भारतीय नारी के चरण हर क्षेत्र में पड़ने लगे हैं और लेखन के क्षेत्र में भी महिलाओं ने पूरे दमख़म से अपने जौहर दिखाने शुरू कर दिए हैं तो भला ग़ज़ल उनसे कैसे बचती। पर हाँ, एक बात यह भी है कि इन ग़ज़लकाराओं ने न तो ग़ज़ल की ज़मीन को छोड़ा है और न ही आम मसाइल को नज़रअंदाज़ किया है। यानी कि परम्परागत ग़ज़ल के कहन के साथ ही आज की ज़िन्दगी में आने वाले हर मसले पर इनकी न सिर्फ नज़र है बल्कि मज़बूत पकड़ भी है।

वर्तमान समय में ग़ज़ल की दुनिया में भी महिलाओं की भागीदारी पूरी शिद्दत से महसूस की जा रही है। यहाँ हर तीसरी कलमकार ग़ज़ल के मैदान में तबअ आज़माई कर रही है और फ़न की पूरी जाानकारी के साथ कर रही है। इतना ही नहीं उस्तादी भी दिखा रही हैं ये ग़ज़लकाराएँ। ज़रूरी यह नहीं कि हम ज़बान कौनसी साथ लेकर चल रहे हैं। वैसे इन सारी ग़ज़लकाराओं की ज़बान एक नहीं है। कोई हिन्दी में लिख रही है तो कोई उर्दू में और ज़्यादातर तो हिन्दुस्तानी
ज़बान में ही लिख रही हैं। मेरे ख़याल में तो हिन्दुस्तानी ज़बान आज ज़्यादा पसन्द की जा रही है और इसी ज़बान में बड़ा काम भी हो रहा है। वैसे पुख़्ता
उर्दू में लिखने वाली ख़वातीन की भी कमी नहीं है और न ही हिन्दी में लिखने वाली शायरात की। मैं दूसरी ज़बानों की बात ज़्यादा नहीं जानती पर मेरा
ख़याल है कि दूसरी ज़बानों में भी ग़ज़ल ज़रूर कही जा रही होगी।


मैंने अक्सर ही अपने सहयोगियों का रुझान हिन्दुस्तानी ज़बान की तरफ़ देखा है। वैसे अगर देखा जाए तो यह आम आदमी की भाषा है और मैं समझती हूँ कि ग़ज़ल की उम्रदराज़ी के लिए एक शुभ लक्षण है कि ग़ज़लकार आम ज़बान में ग़ज़ल कह रहे हैं। सहज, सरल ग़ज़ल आम आदमी के मुँह चढ़कर बोलती है। इस नब्ज़ को हमारी शायरात ने भी पकड़ा है।

भारत के हर कोने में ऐसी ग़ज़लकाराओं के ऐसे ढेरों नाम हैं, जो न सिर्फ मंचों पर हैं बल्कि जिनके कई-कई दीवान भी आ चुके हैं। इनके नाम निहायत
अदब और एहतराम के साथ लिए जाते हैं, जिनमें एक नाम इस ख़ाकसार का भी है। कुछ ही समय हुआ चण्डीगढ़ से बी.डी. कालिया हमदम ने उर्दू में एक किताब निकाली है ‘बड़ी तहज़ीब है उर्दू ज़ुबां में’। इस किताब में भारत की आठ शायरात को शामिल किया गया है। सभी शायरात के लिए दो-दो पेज महफूज़ हैं, जिसमें उनके तअर्रुफ (परिचय) के साथ उनके कलाम भी हैं, हमदम साहब ने यह अपने आप में एक बड़ा काम किया है। अभी किताब मेरे पास नहीं आई पर इतना पता चला है कि इस किताब के मज़मून में महाराष्ट्र की मरियम ग़ज़ाला, फ़रीदाबाद की नमिता राकेश, ग़ाज़ियाबाद की डाॅ. रमा सिंह के साथ आशा शैली का नाम भी है।


इस वक्त सबसे ज़्यादा ग़ज़ल और ग़ज़लकाराओं को मंज़रे-आम पर लाने का शर्फ फेसबुक को जाता है। फेसबुक से जो नाम सामने आए हैं, उनमें बरेली की सिया सचदेव-

अलग मुझसे नई दुनिया बसाकर
तो क्या तुम ख़ुश हो मुझसे दूर जाकर


उसकी यादें भी ख़ूब यादें हैं
रोज़ पहना वही उतारा हुआ

जो थे बेहिस वो हो गए पत्थर
जिनमें एहसास था वो टूट गए


और हैदराबाद से हैं कविता सिंह का नाम बहुत पुख़्ता ग़ज़लकारों में लिया जा
सकता है-

अभी ज़िन्दगी से मैं हारी नहीं हूँ
कसम से अभी मैं बेचारी नहीं हूँ।


इसी तरह पिछली कुछ दहाइयों में हिमाचल से नलिनी विभा ‘नाज़ली’ का नाम बड़ी तेज़ी से उभरा है। बदकिस्मती से मेरे पास इन तीनों के दीवान नहीं
हैं। इस समय हम महिला ग़ज़लकारों की बात कर रहे हैं। मेरे सामने इस वक्त कुछ महिला ग़ज़लकारों के मजमुए हैं, जिनकी बुनियाद पर मैं बात को आगे बढ़ाना चाहूँगी। जिनकी किताबें इस वक्त मेरे सामने हैं, उनमें से कुछ ग़ज़लकारा अपनी ख़ानदानी विरासत के साथ आगे बढ़ रही हैं और कुछ अपने ज़ौके-जुनूं के सहारे। जहाँ विरासत में ही हुनर दस्तयाब हो, वहाँ उसे सम्भालने वाले हाथ भी होने चाहिए पर जहाँ कोई बिना किसी विरासत के आगे बढ़ता है। उस हुनर को मरहबा कहना तो फर्ज़ बनता है फिर भी निरी विरासत कुछ काम नहीं कर सकती। वहाँ भी हुनर और लगन बहुत ज़रूरी हो जाते हैं, उस पर भी एक कामल उस्ताद के बिना शायरी में जान कहाँ से आएगी?


ग़ाज़ियाबाद तो अपने आप में अदब का गढ़ है, जहाँ हर दिन कहीं न कहीं बैठक, नश्स्ति होती रहती है। इन बैठकों में हमें हिन्दी गीतों और ग़ज़लों का
मिला-जुला आनन्द अक्सर ही मिलता रहता है। अब जहाँ ग़ाज़ियाबाद का नाम आए तो डाॅ. कुंवर बेचैन का नाम न आए यह कैसे हो सकता है। बेशक यहाँ बात महिला ग़ज़लकारों की है लेकिन डाॅ. कुंवर बेचैन ने ग़जल में हमें बेशुमार कीमती हीरे दिए हैं। इन में डाॅ. रमा सिंह, डाॅ. तारा गुप्ता और तूलिका सेठ
जैसे न जाने कितने ही नाम आते है, पर जहाँ डाॅ. रमा सिंह का नाम आता है, वहीं ग़ज़ल साकार हो जाती है। डाॅ. रमा सिंह, जहाँ हिन्दी गीतों के लिए एक
जाना पहचाना नाम है, वहीं ग़ज़ल की दुनिया में भी वे उस्ताद ग़ज़लकारा की हैसियत रखती हैं। डाॅ. रमा सिंह के पास कोई अदबी विरासत नहीं है। इनका
सरमाया इनका अपना हुनर और अपनी मेहनत है। डाॅ. रमा सिंह का फ़लक बहुत विशाल है। वे काव्य मंचों और प्रिंट मीडिया में एक साथ सूरज की तरह
चमकदार छवि की मालिक हैं। इनका अंदाज़े-बयां सामयीन को बाँधे रखता है तो इनके दीवान पढ़ने वालों के हाथ से नहीं छूटते। इनकी ग़ज़लों में आम ज़िन्दगी
के मसाइल पूरी शिद्दत से उभर कर सामने आते हैं। ढेरों ग़ज़लें सामयीन को देने वाली ग़ज़लकारा डाॅ. रमा सिंह के 'सीपियाँ एहसास की', 'फाइलों में बंद
मौसम' और 'पलकों के साए में' तीन दीवान मंज़रे-आम पर आ चुके हैं। अब ज़रा एक नज़र डाॅ. रमा सिंह के अश्आर पर भी डाल ली जाए-


जिधर भी देखिए जंगल ही जंगल हैं बबूलों के
किसी को क्या यहाँ कचनार का बोना नहीं आता।

जिस्म से जो प्यार करते हैं भला समझेंगे क्या
इश्क ऐसा नूर है जिसको इबादत चाहिए

प्यार की ये आँच भी क्या आँच है
अच्छे अच्छों को पसीना आ गया

वो है पत्थर मगर उसमें छुपी है एक मूरत भी
चलूँगी साथ मैं तेरे उसे आज़ाद तो कर लूँ


तो चलिए अब आगे बढ़ा जाए। मेरे सामने इस वक़्त डाॅ. तारा गुप्ता का दीवान 'मौन की बाँसुरी' मौजूद है। ज़ाहिर है कि यह दीवान हिन्दी जु़बान की ग़ज़लों
को लेकर मंजर-ए-आम पर आया है। डाॅ. तारा गुप्ता भी ग़ाज़ियाबाद से हैं। इनके साथ भी कोई अदबी विरासत नहीं चलती, बस अपना हुनर और जुनून दोनों
मौजूद हैं और है इनकी ग़ज़ल।


ग़ज़ल के सुदृढ़ स्तम्भ और उस्ताद शायर जनाब कुँवर बेचैन की रहनुमाई में कही गई ग़ज़लों का ये तारा गुप्ता का पहला दीवान है। इससे पहले इनका गीत संग्रह मंज़र-ए-आम पर आ चुका है। पर हमारा मक़सद तो ग़ज़ल की पड़ताल से तअल्लुक रखता है, सो हम तारा जी की ग़ज़लों की तरफ चलते हैं।
इस मजमुआ-ए-कलाम में छोटी-बड़ी बहर की कुल मिलाकर अस्सी ग़ज़लें हैं। कहना न होगा कि जनाब कुँवर बेचैन की रहनुमाई में हर ग़ज़ल नोक-पलक से दुरुस्त और कसी, मंजी और हालात-ए-हाज़रा पर पैनी नज़र रखे है। एक छोटी बहर का शे'र देखिए-

जब तराशा गया बुत फरिश्ता हुआ
संकटों में इसे आज़माने लगे

हद से बाहर पाँव न रखना
तू अपनी चादर में रहना


इसी तरह एक और शेर देखते हैं-

बनाई कोठियाँ ये सोचकर बच्चे रहेंगे कल
मगर चिड़ियों की घर में बोलती आवाज़ से खुश हूँ

मिले कुछ आदमी हमको बड़ी इंसानियत लेकर
मगर देखा कि हम बगुलों के दल में आ फँसे आख़िर


ये और इसी तरह के अशआर डाॅ. तारा गुप्ता की शायरी का हिस्सा हैं। भीलवाड़ा की रेखा लोढ़ा ‘स्मित’ के परिवार में भी दूर-दूर तक कोई कलम पकड़ने
वाला यानी अदबी हैसियत वाला शख़्स नहीं हुआ। फिर भी इन्होंने अदब के मरहले पार किए हैं। शायरी में इनकी ज़बान हिन्दुस्तानी है। इनका दीवान ‘मुखर
होता मौन’ है।

कभी तो हमारे हुनर से परेशां
कभी शख्सियत चैन उनका हरे है


अपने हुनर और शख्सियत को रेखा ने ‘मुखर होता मौन’ के पन्नों पर उतारा है। ज़माने की आपाधापी के बीच भी वे ग़ज़लों के दिए कुछ यूँ जला रही हैं-

हो गई आदत सभी को रोशनी छीने यहाँ
तीरगी में पर हमें दीपक जलाना चाहिए।’


रवायती शायरी को निभाते हुए अपने शेरों में मुहब्बत का रंग भी भरा है ‘स्मित’ ने-

हिचकियाँ रुक नहीं रहीं मेरी
याद उसने कहीं किया होगा


और ये शेर कुछ अलग ही तेवर लिए है-

दर्द को ओढ़े बिछाए
अश्क का मैं हमसफर हूँ


‘दर्द का कारवां’ की ख़ालिक डाॅ. मालिनी गौतम गुजरात से हैं। हाँ, ये ख्यातिलब्ध ग़ज़लकार डाॅ. ब्रह्मजीत गौतम की बेटी हैं और विरासत में इन्हें हुनर अता हुआ है, जिसे इन्होंने न सिर्फ सहेजा है बल्कि निखारा और तराशा भी है। आज कोई भी रिसाला या अख़बार उठाकर देख लीजिए, कहीं न कहीं आपको
मालिनी गौतम नज़र आ ही जाएँगी। ग़ज़ल की ज़रूरत के हिसाब से और हर हस्सास शायर की तरह आपकी शायरी के भी बेशुमार रंग नज़र आते हैं। तभी तो ये कह सकीं-

हर नज़र हर साँस में बस एक तेरी आस है
तू मेरी हालत पे पिघलेगा न आख़िर कब तलक


राजनीति के यास और नाउमीदी के आलम में मालिनी की कलम चीख़ उठती है-

नेता जी फिर दर्शन देंगे पाँच बरस जो बीत गए
वादा करके शीघ्र भुलाना अजब तमाशा जीवन का


मालिनी की ग़ज़लों में और सारे मसलों के साथ-साथ अपनी हिन्दुस्तानी संस्कृति के तार-तार होने का दर्द भी मौजूद है।

पश्चिम का है ज़ोर बढ़ा अब पूरब के आदर्श कहाँ
उलझा सारा ताना-बानाा, अजब तमाशा जीवन का


कुदरत के मनमोहक संगीत को वे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकतीं-

ढोल-नगाड़े लाख बजा लो
भँवरों का संगीत अलग है

धूप सुनहरी सेंध लगाती मन के बंद किवाड़ों में
कैसे खोलूँ द्वार वहाँ यादों का आज बसेरा है


कानपुर की डाॅ. प्रभा दीक्षित, ग़ज़ल की दुनिया में एक और बड़ा नाम है। कमल किशोर 'श्रमिक' ने इन्हें मूडी शाइरा कहा है पर साथ ही यह भी कहा है कि
"किसी विदुषी चेतना को या साध्वी संवेदना को भदेस इबारत में बदल देना इस कवयित्री का स्वभाव भी है और नियति भी। यह शाइरा शेरो-सुख़न के चमन में
गुलाबों के साथ-साथ कैक्टस पर भी दृष्टि रखती है।" आज मैं इनकी किताब ‘रोशनी की इबारत’ के हवाले से कुछ शेर आप के हाज़रे-नज़र कर रही हूँ। कितने सहज अंदाज़ में डाॅ. प्रभा अपनी बात रखती हैं, हर शेर जैसे पानी की तरह बहता हुआ आप तक पहुँच रहा है। आप इसे कहाँ सहेजें ये फैसला आपका है-

आपस की इस हमदर्दी को रिश्तों की दरकार नहीं
अपना साथी अपना ही है चाहे कोई ख़ास न हो

चाँद तुझे कितने लोगों की आँखों ने दुलराया है
पर किसकी बाहों की ख़ातिर तू धरती पर आया है

एक अनगढ़-सी ग़ज़ल है प्यार मेरा
नयन का मोती विमल है प्यार मेरा


एक और शेर देखें-

काँटों के बीच फूल-सी मुस्कान जी रहा
ख़ुशबू बता रही है कि ख़ुद का रक़ीब है

मेरी किस्मत ने मुझको दोस्त पहली बार यूँ देखा
मेरे अंदाज़ से जैसे निगाहे-यार ने देखा


'रतजगों से ख़्वाब तक’ की ख़ालिक़ हैं मुमताज़ ‘नाज़ां’। यह मुमताज़ का पहला शाइरी मजमुआ है। मुमताज़ ने अपनी शाइरी में उर्दू ज़बान को रवां-दवां रखा
है। इन्होंने हिन्दुस्तानी ज़बान का इस्तेमाल नहीं किया। 'रतजगों से ख्वाब तक' अदब बराये अदब की मिसाल पेश करता है। यह किताब माण्डवी प्रकाशन से
आई है। इसकी बड़ी ख़राबी यह है कि किताब में कहीं भी शाइरा का पूरा तअर्रुफ नहीं है न ही उनके कोई फोन नम्बर हैं, जिसकी वजह से अगर कुछ  दरियाफ़्त करना हो तो हम नहीं कर सकते। बस एक जगह मुमताज़ ने ख़ुद कानपुर शहर का ज़िक्र किया है। जितने लोगों ने भी पेशलफ़्ज़ लिखे हैं, किसी का भी फोन नम्बर नहीं है। ऐसे में हम 'नाज़ां' के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं कह सकते, बस उनके अशआर से ही आनन्द ले सकते हैं। तो आइए सफ़र को आगे बढ़ाएँ-

हमको ले आई कहाँ तू ज़िन्दगी, ऐ ज़िन्दगी
है जहाँ कि एक इक शै आारज़ी, ऐ ज़िन्दगी

उम्र भर मैंने पिया है ज़हर जो तूने दिया
फिर भी क्यूँ मिटती नहीं है तिश्नगी, ऐ ज़िन्दगी’


और देखें-

हम थे बरहम ज़रा-ज़रा ख़ुद से
कोई रिश्ता नहीं रखा ख़ुद से

अब कहाँ जाने रुके अल्फाज़ का ये सिलसिला
ये जुनूं की आज़माइश, ये सुख़न की वारदात

ये लय, ये रवानी, ये तजल्ली, ये हरारत
‘मुमताज़’ मेरी ज़ात में शोला-सा जला है


'तितलियों के ख़यालात' सीमा गुप्ता का मजमुआ-ए-कलाम है। सीमा गुप्ता गुड़गाँव से तअल्लुक रखती हैं। इनका मजमुआ-ए-कलाम 'दर्द का दरिया' पहले आ
चुका है। माण्डवी प्रकाशन से होने की वजह से शाइरा का अता-पता इसमें भी नहीं है। बस इतना पता चलता है कि ये प्रबंधन से जुड़ी हैं। तो आइए हम सीधा
शाइरी की तरफ ही चलें-

तेरी दहलीज़ से सूरज को निकलता देखूँ
इक दिया दूर तलक राह में जलता देखूँ

मुसलसल आह भरती जा रही हूँ
मैं तुझको याद करती जा रही हूँ

मोहब्बतों के हसीं पलों को वो ‘तितलियों का ख़याल’ देगा
कि ख़्वाब सारे बस एक शब में वो मेरी आँखों में डाल देगा

सूनी-सूनी सी रात लगती है
फिर भी तनहाई साथ लगती है

 


- आशा शैली

रचनाकार परिचय
आशा शैली

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