प्रज्ञा प्रकाशन, सांचोर द्वारा प्रकाशित
जून 2018
अंक -42

प्रधान संपादक : के.पी. 'अनमोल'
संस्थापक एवं संपादक: प्रीति 'अज्ञात'
तकनीकी संपादक : मोहम्मद इमरान खान

धारावाहिक
गवाक्ष - 8
 
"नहीं,नहीं --वहाँ नीरव शान्ति में स्वामी  सब लोगों को कार्य पर लगाए  रखते हैं। किसीके पास यह सब  सोचने का  मस्तिष्क नहीं है।"
"छोडो यह  सब ---उस बच्चे की बात बताओ जो तुम्हारा मित्र बन  गया था ।"
" उसके लिए पहले उसके माता-पिता के बारे में भी सुनना पड़ेगा ,आपका समय--।"वह झिझका---
" वो तो तुमने खराब कर ही दिया --अब अपनी बीती सुनाओ " निधि को महसूस हो रहा था कि  कॉस्मॉस के साथ वह एक बंधन में बंधने लगी है ।
कॉस्मॉस ने अपनी पृथ्वी की पिछली  यात्रा के पृष्ठ पलटे ----
"वे धर्म के एक महान  ठेकेदार थे । संभवत: किसी बड़े मंदिर अथवा आध्यात्मिक पीठ के सर्वोच्च पदाधिकारी !
 
नाम था-- सत्यशिरोमणि ! उनके आगे-पीछे लोगों का झुण्ड लगा रहता ,लोग उन्हें 'आचार्य श्री','गुरुदेव', आदि नामों से संबोधित करते।प्रत्येक मंच पर उन्हें  सम्मानित किया जाता ,बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूमते ,रेशमी श्वेत अथवा  पीत वस्त्र धारण करते ,सेवक-सेविकाएं  घेरे रहते,उनका खान-पान ,रहन-सहन देखते  ही बनता।
उन्हें   मैंने एक बड़े से पुष्पों से सुसज्जित मंच पर व्याख्यान देते हुए सुना था । आज की ही भांति मैं तब भी भटक रहा था । पता चला महानुभाव का नाम 'सत्य' है बस मेरी तो बांछें खिल गईं ।  यह सत्य का भी शिरोमणि था ।
'अगर मेरी दाल गल जाती है तब मैं पूरे गवाक्ष पर छा  जाऊंगा ' मैंने सोचा और कई दिन तक निरंतर उनके व्याख्यान सुनने जाता रहा ।वे बहुत  बड़ी-बड़ी बातें करते थे । जो उनको सुनने आते ,उन्हें भक्तगण कहा जाता।पुष्पमालाओं से उनका मंच सुसज्जित होता और उनके आभूषण  इतने चमकदार होते कि उन पर से दृष्टि हटती ही नहीं आपने जो धातु का नाम लिया था न---सोना ,हीरे --उनसे सारी देह जगमगाती रहती।
" आध्यात्मिक संत को इन सबकी कहाँ आवश्यकता होती है?" सत्यनिधि ने टोका ।
" देखा,जैसे मुझे उत्सुकता होती थी और मैं बीच में टपक जाता था ---आप भी "--   उसने बीच में ही स्वयं को  रोक लिया ।
'क्षमा करिए," उसे इस  प्रकार  नहीं टोकना चाहिए था , यह सभ्यता  नहीं है ,उसने सोचा । 
'ऊँहूँ ---आगे बढ़ो भई ,ठीक कह रहे हो तुम ---"
    मैं निरंतर  उनका पीछा करता रहा । अपनी अदृश्य होने की कला से सदैव उनके समीप बना रहा किन्तु जब वे कक्ष के भीतर जाते ,उनके साथ सेवा के लिए कई  स्त्रियाँ  भी जातीं । मैं वहाँ  से लौट आता।  मैं स्त्रियों के समक्ष उनसे वह बात नहीं कह सकता था जिसके लिए उनका पीछा कर रहा था ,फिर अंदर जाकर क्या करता ?
 
           इसी प्रकार कई दिन व्यतीत हो गए।मैं थकने लगा ,मैंने सोचा  अब यहाँ काम नहीं बनेगा,किसी दूसरी खोज में निकलना होगा । उसी दिन मैंने देखा उनके शयन कक्ष से स्त्रियाँ बात करती हुई बाहर निकल रही थीं । 
"   महाराज आज हमसे रुष्ट हो गए हैं क्या ? सेवा का अवसर नहीं दे रहे ।"
         महानुभाव के कक्ष में प्रतिदिन भिन्न -भिन्न स्त्रियाँ जाती थीं।केवल एक स्त्री सदा उनके साथ  रहती थी जो स्त्रियों के भीतर जाने की तथा उन महानुभाव के अन्य कार्यों की व्यवस्था करती थी।उस दिन वह स्त्री भी नहीं दिखाई दे रही थी,यहाँ तक कि सबको यह आज्ञा दी गई थी कि उस दिन  महाराज जी चार घंटे तक बिलकुल एकांत चाहते हैं,यदि उन्हें कोई आवश्यकता होगी तब दूरभाष -यंत्र का प्रयोग करके आदेश दे दिया जाएगा । मैं सोच में पड़ गया,न जाने क्या बात है  तभी मुझे कक्ष से बोलने की आवाज़ सुनाई दी। मैं उन्हें अपने साथ ले जाने के लोभ  में उनके आगे-पीछे ही घूम रहा था,मुझे उनकी धीमी आवाज़ सुनाई दे रही थी ।उनके आदेशानुसार उस समय उनके पास कोई नहीं होना चाहिए था फिर ये  संवाद किसके साथ और  कैसे?"
" अरे !-फिर --?" निधि दो शब्द बोलकर चुप हो गई। 
       कॉस्मॉस मुस्कुराया ,वह समझ गया था कि  अन्य इन्द्रियों की भांति उत्सुकता भी मन में उठने वाला एक नैसर्गिक भाव है । 
"  मैं अपने अदृश्य रूप में तो घूम ही रहा था ,बिना देरी किए मैंने  उनके कक्ष में प्रवेश कर लिया।वे उस समय अकेले ही थे और किसी से अपने उसी दूरभाष -यंत्र पर बात कर  रहे थे । "
" छोटा सा यंत्र था?---उसे मोबाइल  कहते हैं ?" निधी फिर कह बैठी।
" हाँ ,वही ! धन्यवाद " उसे नया शब्द मिला था । 
"हाँ,तो मैं उन महानुभाव के कक्ष में प्रवेश करके उनके संवादों को कान  लगाकर सुनने लगा था,वे किसी से बहुत क्रोधित थे।दूसरी ओर के संवाद मैं सुन नहीं सकता था किन्तु वे जो बोल रहे थे उसका सीधा सा आशय था कि वे जिससे भी वार्तालाप कर  रहे थे,  उसे अपने पास नहीं आने देना चाहते थे । "
 
" यह क्या इसी शहर की बात है?" निधी की उत्सुकता में उबाल आ रहा था । 
" आप बीच में टोकती बहुत हैं ।" उसने कुछ उसी अंदाज़ में कहा जिसमें वह कॉस्मॉस को टोकती आई थी । 
" नहीं , अभी मैं भारत में हूँ ,यह विदेश की बात है  जब पिछली बार मैं उधर की यात्रा पर निकला था ।"
"जो बात समझ में न आए ,वह पूछनी तो  चाहिए न ?"  निधी ने मुस्कुराकर उसकी ही ज़बान   में प्रश्न परोसकर   उत्तर दिया । 
" क्या तुम्हारा कार्य विदेश में भी होता है?" निधी को महसूस हुआ मानो उसके समक्ष किसी विदेशी कंपनी का प्रतिनिधि अपने उत्पादन की प्रशंसा कर रहा हो। 
"ओह !मृत्यु किसी एक स्थान पर ही आती है क्या ? विदेश में प्राणियों का जन्म नहीं होता ?"
           निधी को शर्मिंदगी हुई ,कैसी बचकानी बातें कर रही है! उसके साथ बैठा हुआ मृत्यु-दूत है,कॉस्मॉस! उसका कार्य-क्षेत्र किसी एक स्थान पर  कैसे हो सकता है? उसने अपने दोनों कान पकड़ लिए।   
        दोनों पुराने मित्रों की भाँति  खिलखिलाकर हँस पड़े । निधी ने उसे हाथ के इशारे से आगे बढ़ने को  कहा, कॉस्मॉस को उसका इशारा  समझने में एक पल लगा । 
 
"अरे भई ! आगे बढ़ो न ---मेरा मतलब है आगे सुनाओ न फिर क्या हुआ ?"
"  इस भाषा में बोलो न ---"कॉस्मॉस ने बच्चे की भाँति ठुनककर  कहा । 
“पहले बताओ तुम इतनी अच्छी भाषा कैसे बोल  लेते हो?"
" बहुत आसान है ,जहाँ जाता हूँ ,वहाँ की भाषा जल्दी ही समझ में आने लगती है , हाँ,हमें इसकी आज्ञा नहीं होती  किन्तु---"
"क्यों?"
"क्योंकि हम धरती  के वासी नहीं हैं ,यदि धरती पर हमारा दिल लग जाएगा तब स्वामी केवल  हमारा उत्पादन ही करते रहेंगे । हमारे न होने से वे शक्तिहीन हो  जाएंगे न ?" 
" ओहो! इसीलिए वे तुम लोगों को भयभीत रखते हैं?" यह चतुराई गवाक्ष में भी है। उसने व्यंग्य किया फिर बोली ;
"चलो ,अब आगे बढ़ो ---"
"कहाँ ?"
" अपनी कथा पूरी तो करो,फिर क्या हुआ हुआ?"
" हाँ,तो वो महानुभाव --क्या  ---हाँ,मोबाईल ,पर वार्तालाप  कर रहे थे , वास्तव में डांट रहे थे किसीको कि वे उनको इतना धन भेजते हैं आखिर  वे करती क्या हैं ?"
" कुछ समझ में आया किससे वार्तालाप कर रहे थे ?"
" हाँ,स्पष्ट था ,वे अपनी पत्नी से ही वार्तालाप कर रहे थे ।  "
" कैसे स्पष्ट हुआ ?"
' मैं छोटा सा मच्छर बनकर उनके मोबाईल के ऊपर  पर जा बैठा था जहां से ध्वनि आ रही थी ।"
" वाह ---वाह ---आनंद आ गया । फिर ?"
" ऐसे बीच में टोकेंगी तो- ?।" 
" नहीं ,अब नहीं -- क्या कह रही थीं वो ---"
 
" उन्हें किसी उत्सव के लिए सोने व हीरे  के आभूषण  बनवाने थे ,वे उसीके लिए उन्हें धन भेजने के लिए बाध्य कर  रही थीं।वे अपने पति के पास विदेश  भ्रमण के लिए भी आना चाहती थीं क्योंकि वे  प्रति  वर्ष छह माह विदेश में रहते थे और छह माह देश में! कितने ही वर्षों से इनका कार्यक्रम यही चल रहा था किन्तु वे देश में  पड़ी रहती थीं।जब कई वर्ष तक पति महोदय ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया तब उन्होंने शोर मचाना प्रारंभ कर दिया ।उन्हें ज्ञात था कि इन गुरुदेव कहलाने वाले उनके पति के पास धन व तन की कोई कमी नहीं थी।अब वे देश में अकेली रहकर  ऊबने लगी थीं और उनका आभूषणों  व धन के प्रति अधिक शोर मचाना शुरू हो चुका था । 
" मैं जानती हूँ तुम वहां क्या-क्या करते हो ?इसीलिए हमें नहीं ले जाना चाहते " वे कठोर शब्दों में कह रही थीं । 
        उन्होंने पत्नी  के समक्ष समर्पण कर दिया ,वहाँ पहुंचतीं तो उनकी पोल खुल जाती ।वास्तव में मनुष्य स्वयं से भयभीत रहता है ।अपने कर्मों का लेखा -जोखा उसके भीतर ही कैद रहता है न ! कई बार तो वह स्वयं से भी स्वयं को  छिपाने की चेष्टा करता है --
"हम तुम्हें धन भेज देंगे ,तुम बनवा लेना जो चाहो ,सोने का ध्यान रखना । आजकल बहुत बदमाशी चल रही है।लोग ईमानदार नहीं रह गए हैं । यहां आने की सोचना भी मत वरना ---और सत्यपुत्र  का ध्यान रखना । "
" सत्यपुत्र ---?"
"हाँ,उनका बेटा ! मुझे उनकी ईमानदारी और वहाँ  के  मूर्ख लोगों पर हँसी आ   रही थी मैं हँसता -हँसता कई बार उनके कान पर जा बैठा जिसे वे बार-बार झटकते रहे।जब कई बार उन्होंने मुझे झटके दिए तब मैं बौखला गया । यदि मैं उनके हाथ में  आ गया तो मसला जाऊँगा । मैं बहुत ही नन्हे से रूप में था।
 
     उन्होंने अपनी पत्नी को डांटकर फोन एक ओर  पटक दिया था,मच्छर पकड़ने के लिए इधर-उधर हाथ मारते हुए वे बड़बड़ करते जा रहे थे कि लंदन जैसे देश में भला मच्छर कैसे हो सकता है? यह अवश्य ही उन लोगों की अव्यवस्था है जिनको सफाई का  कार्य सौंपा  गया है । वे क्रोध में किसीको बुलाने के लिए घंटी बजाने  के लिए आगे बढ़े ,मैं छिपकली का रूप लेकर उनके ऊपर टपक पड़ा । 
'राम--राम --यहाँ छिपकली भी --अब नहाना पड़ेगा 'उनके मुखारबिंद  से सुनकर मैं  खिलखिला पड़ा । 
" कौन है --मेरे कक्ष में आने का साहस कौन कर सकता है?"वे दहाड़े, कमरा बंद था।   
 " केवल मैं ही यह साहस  कर सकता हूँ ,मान्यवर !” उनके प्रति मेरे मन में कोई मान अथवा श्रद्धा का भाव नहीं था ।  
" कौन हो तुम ? कहाँ हो? मेरे समक्ष क्यों नहीं आते । आओ ज़रा ,मैं तुम्हें कैसा मज़ा चखाता हूँ।" 
" बस तैयार हो जाइए , मैं आ ही रहा हूँ ---" और  मैं यमदूत के भयभीत करने वाले रूप में प्रगट हो गया।
 मुझे देखकर वे चौंक गए ,उनकी घिग्घी बंध गई। 
" तैयार हो जाइए ,मैं आपको ले जाने आया हूँ ,इस पृथ्वी पर आपका समय समाप्त हो चुका है। मैं समय-यंत्र को स्थापित करता हूँ, जब तक इसकी रेती ऊपर है आपके पास केवल उतना ही समय है।जब पूरी रेती इस यंत्र के नीचे के भाग में पहुँच जाएगी,आपका समय समाप्त !” 
" कैसी बात करते हो प्रियवर ! मैं अभी कैसे चल  सकता हूँ ?। अभी तो मेरे कितने कार्य अधूरे हैं ,देश में बेटे को बड़ा  करना है --"कितना निरीह लग रहा था वह !!
" मृत्यु अधूरे कार्य नहीं देखती, उसका समय सुनिश्चित होता है । हमें स्वामी का आदेश है 'सत्य'नामक किसी भी प्राणी को ले जाना है । 
"कोई भी उम्र क्यों न  हो ---?"
"हाँ,इस बार केवल 'सत्य' की योजना है ।"
" तो एक काम करो, मेरे देश में जा सकते हो ?"
" मैं कहीं भी जा सकता हूँ ---"
" मेरी पत्नी को ले जाओ न ,उसका नाम भी सत्या है ।इस जीवन में उसकी  कोई इतनी अधिक आवश्यकता भी नहीं है। यदि मुझे कुछ हो गया तो तुम देखना,लोग बवंडर मचा देंगे।"उन्होंने मुझे भयभीत करना चाहा । 
"हमें इससे कोई अंतर नहीं पड़ता "  
" मेरी मृत्यु के पश्चात  कितने निरीह प्राणी मर जाएंगे ।"
" उसकी आप चिंता न करें ,जब तक हम किसीको नहीं ले जाएंगे  ,किसी   की मृत्यु नहीं हो सकती।"मैं उनके लिए बहुत कठोर था ।
 "आप वास्तव में बड़े बैरागी और संत महामानव हैं जो पूरी दुनिया की चिंता करते  हैं,     उसके लिए परिवार की बलि आपको स्वीकार्य है---कमाल हैं आप !" मैंने व्यंग्य  से कहा।   " आपको यदि अपने भक्तों की इतनी ही  चिंता है तो उन्हें समझाइए और स्वयं की आहुति दीजिए।स्वैच्छिक मृत्यु के आलिंगन से आपका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाएगा ।"उन्हें उकसाने में क्या खराबी थी ?समय -यंत्र की रेती कब से नीचे आ चुकी थी,मैं केवल उन्हें तोलने का प्रयास कर रहा था ।     
  
 "हमें अपनी भूमि की मिट्टी तो मिलनी  चाहिए,फिरंगी  देश में प्राण त्यागना--- ।"वह संवेदनाओं का असत्य प्रदर्शन करके छलावा करने लगा । 
"क्यों मिलनी चाहिए आपको अपनी मिट्टी!मौज-मस्ती दूसरों के देश में! मृत्यु के  समय यही देश फिरंगी बन गया ?अपनी मृत्यु का समय आज तक किसी को ज्ञात नहीं ,यदि  आपको अपनी भूमि से इतना ही प्रेम है तो  अपनी भूमि पर क्यों नहीं रहते ,यहाँ क्यों भटकते हैं ?"
" क्या करता ,ये इतने भक्तगण---" वे निरीह से बन कातरता से भर  गए।     
मुझे उन पर क्रोध था ,समय-यंत्र की रेती न जाने कबकी समाप्त हो चुकी थी । मैं पुन: हताश था । 
 
      उनका एकांत  का समय पूरा हो चुका था,बाहर दर्शन  की भीड़ जमा हो चुकी थी,द्वार पर धीमे-धीमे खटखटाहट शुरू हो चुकी थी।उन्होंने मेरी ओर  याचना भरी दृष्टि से देखा,मेरी  योजना वहाँ भी असफल हो चुकी थी।मैंने उनके देश  में उनके घर जाने  का निर्णय लिया ।" 
" उनकी पत्नी को  ले जाने का  विचार आया अथवा उनके  पुत्र  को?"निधी की एकाग्रता भंग हुई । 
 " नहीं ,किसीको नहीं ,बस उस व्यक्ति के परिवार  से मिलने का विचार आया जो अपने परिवार के प्रति न तो कृतज्ञ था ,न ही ईमानदार !यहाँ नाटकबाज़ी कर रहा था । बहुत पीड़ा होती है ऐसे लोगों को देखकर जिनकी कथनी कुछ होती  करनी कुछ और --!!" 
" तो क्या गए ?"
" बिलकुल ! मेरे लिए उनके घर पहुँचने  में कोई समस्या कहाँ  थी ?"                                     इस दुनिया ने बहुत कुछ अच्छा सिखाया व दिखाया था।कितने अच्छे लोगों से मिलकर उनके विचार जानने,पृथ्वी  को समझने में कॉस्मॉस ने अपनी दंड की  पीड़ा भुला दी थी। वह सोचता, क्या होगा अधिक से अधिक उसका दंड बढ़ता रहेगा । पृथ्वी के निवासियों  के साथ  निकटता व  अंतरंगता का भाव उसे उद्वेलित करता।संवेदनाएं उभरने लगतीं ,पृथ्वी का जीवन छोटा सा है किन्तु अच्छा है,सुन्दर है,आनंदमय है,  उसे प्रतीत होता।लेकिन उसके समक्ष जो कड़वी सच्चाईयाँ  खुली थीं ,उन्होंने उसे  असहज भी बहुत किया था । 
 
“धर्म के इस ठेकेदार के परिवार का दृश्य तो और भी चौकाने वाला था।संत महाराज  भक्तगणों में लीन!पत्नी सौंदर्य को निखारने और बेहिसाब पैसे उड़ाने में व्यस्त। मासूम,निरीह बच्चा बेचारा नौकरों के ऊपर आधारित ! संत महोदय की पत्नी आभूषणों व सुन्दर वस्त्रों  से सज्जित  हो सुबह -सवेरे न जाने कहाँ निकल जातीं , दोपहर में आतीं । संध्या  के समय ताश खेलने और मित्र-मंडली में  गपशप करने में व्यस्त रहतीं।बच्चा आया के आँचल में पल रहा था। मुझे विश्वास नहीं हुआ था कि कोई माँ अपने बच्चे के प्रति इतनी असंवेदनशील भी हो सकती है?सब अपने स्वार्थ में उलझे हुए ,बच्चा बेचारा एकाकी आया के बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त रहता । प्रश्न यह था कि किसीको भी किसी के प्रति संवेदना क्यों नहीं थी ?इसका उत्तर मुझे तो यही समझ में आया कि दुनिया केवल स्वार्थ से भरी हुई है । संत के  रूप में धोखाधड़ी तथा व्यभिचार एवं पाप-पुण्य के नाम पर  ईश्वर के भय का प्रसार ! जब 'कण -कण में भगवान की बात की जाती है तो ईश्वर दुनिया के समस्त प्राणियों में भी विद्यमान हुआ न ? फिर किससे और कौनसा भय ? यह केवल अपने अंतर  का भय है जिससे मनुष्य भयभीत होता है मनुष्य को मस्तिष्क प्रदान किया गया है , चिंतन करने की शक्ति प्रदान की गई है ,वह उसका  उपयोग क्यों नहीं करता ?”
    
" माता-पिता  यदि परिवार को संभालकर नहीं रख सकते तो बच्चे को जन्म  देने की क्या आवश्यकता है ?" निधि ने  सुनकर  एक लंबी श्वांस लेकर अपना मंतव्य उगला।वह एक स्त्री थी ,किसी शिशु को जन्म   नहीं  दे पाई थी किन्तु माँ  की संवेदना को  भली प्रकार समझ सकती थी । 
" मैंने भी यही सोचा था ।"कॉस्मॉस ने  कहा।   
         "इस भौतिक संसार के प्राणी को अपनी मानसिक,शारीरिक सभी प्रकार की आवश्यकताओं का समाधान करना होता  है।सहज जीवन के लिए प्राकृतिक संवेदनाओं से जुड़े रहना आवश्यक  है।समाज व परिवार में हम केवल अपने लिए ही नहीं जीते।  परिवार, समाज,देश के पश्चात विश्व की संवेदना से जुड़ना मानवता  है।ये संवेदनाएं परिवार की इकाई से प्रारंभ होती हैं ।प्रश्न है -- जब हम अपने परिवार को ही अपना स्नेह ,प्रेम नहीं दे पाते,उसके प्रति उत्तरदायित्व नहीं समझ पाते तब विश्व के भक्तों के प्रति हमारा  प्रेम,स्नेह व  आस्था किस प्रकार हो सकती है?  आश्चर्यजनक ! वे संत कहलाने वाले   महानुभाव अपनी आवश्यकताएं मस्ती से पूर्ण करते ,पत्नी अपने मन   मुताबिक अपनी इच्छाएं,आवश्यकताएं पूर्ण करतीं लेकिन जिसे जन्म दिया था , वह बच्चा !? "कॉस्मॉस पीड़ित था । 
           मनुष्य के  मानसिक  विकास के पश्चात  समाज का संगठन हुआ,उसके पश्चात परिवार का अस्तित्व सामने आया ,संयुक्त परिवार बने।परिवार के सदस्य  सम्मान के लिए एक-दूसरों पर जान छिड़कते ।शनैः शनैः परिवारों का विघटन भी हुआ, वृद्धावस्था में माता-पिता बोझ बन गए,संतानों में  उनका बंटवारा होने  लगा। परिवार  केवल  पति-पत्नी,पुत्र-पुत्री तक ही सीमित रह गए।  किन्तु जब संतान व माता-पिता ,पति-पत्नी के संबंध भी  केवल स्वार्थ तक सीमित रह गए तब  परिवार की परिभाषा?? प्रश्न यह भी प्रत्यक्ष हुआ --समाज में परिवार की आवश्यकता क्यों ,क्या दुनिया में सम्मान  प्राप्त करने के लिए ?क्या इसलिए कि पत्नी व बच्चे के साथ किसी भी परिवार में प्रवेश लिया जा सके और किसी के भी साथ कुछ भी  खेल खेला जा सके? इस दुनिया में विवाहित लोगों के वर्ग को अधिक महत्ता प्रदान की जाती है,  वैवाहिक कर्तव्य पूरे करना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि इसमें परिवार के सभी सदस्यों को स्वार्थ  छोड़कर अन्य सदस्यों के लिए त्याग  करना पड़ता है । अविवाहित  परिवार के कर्तव्यों से बेशक बचा रह सकता है  किन्तु  उसको यदा-कदा अनेक कारणों से शर्मिंदा भी होना पड़  सकता है । समाज  विवाह का तमगा लगाना आवश्यक समझता है  ! किन्तु यदि रिश्तों में इस प्रकार का छिपाव व असंयमितता हो तब  पवित्र संस्था  अर्थहीन हुई , इसका कोई महत्व ही नहीं  रहा !    
 
              " मुझे पीड़ा हुई क्या केवल अपने स्वार्थ  के  लिए बच्चे  को जन्म दिया गया था? दुनिया से जाने के पश्चात अपना कोई  वज़ूद बनाए रखने, नाम लेने वाला चाहिए क्या इसलिए?  मैंने उस  परिवार को बहुत निकट से देखा और बहुत कुंठित हुआ । बच्चा बहुत प्यारा व योग्य था केवल उसे मार्ग-निर्देशन की आवश्यकता थी । वह  बात करते  समय बार बार 'बाई गॉड ' कहता और अपनी ग्रीवा के निचले भाग को छूता । मैं उससे पार्क में मिला था, मेरी उससे बहुत अच्छी मित्रता हो गई थी ।उसीसे मैंने 'बाईगॉड ' कहना सीखा , हम खूब देर तक खेलते और बातें करते रहे और बहुत देर तक खिलखिलाकर हँसते रहे थे।मैंने महसूस किया न जाने वह कितने दिनों  पश्चात इतना खुलकर हँसा होगा।" 
           कॉस्मॉस पीड़ा से भर उठा था किन्तु अब उसे अपना सफर आगे बढ़ाना था।सत्यनिधि भीतर से भीग उठी ,उसने आगे बढ़कर कॉस्मॉस को  आलिंगन में ले लिया ,उसके नेत्रों में अश्रुकण टिमटिमा रहे थे। 
 
             कॉस्मॉस के लिए यह एक और  नवीन ,संवेदनपूर्ण  अनुभव था।   कई पलों तक वह एक कोमल सी संवेदना से ओत -प्रोत  निधि से चिपका रहा । यमराज के मानस-पुत्रों में इस प्रकार  की संवेदना ! कुछ पल पश्चात वह  निधि से अलग हुआ और हाथ हिलाते हुए  पीछे मुड़ -मुड़कर  देखते हुए उसकी दृष्टि से ओझल हो गया ।
कॉस्मॉस के मन में एक अजीब प्रकार का आलोड़न चल  रहा था। मन में कहीं कुछ था जो उसे कोमल पुष्प की भाँति सहला रहा था ,कभी मानो कोई कठोर दंड देकर उसे यंत्रणा देने का प्रयास करता  । संसार के सत्य को समझना उसके लिए बहुत कठिन था । न तो वह पूर्ण रूप से संवेदनाओं को अपने भीतर उतार सका था ,न ही अपने अर्ध-चेतन मन को वश में कर पा रहा था ।
' सच ही कठिन है पृथ्वी का जीवन'  उसने सोचा और एक दिशा-हीन यात्री की भाँति अपने सामने आई राहों पर रुक-रूककर चलता रहा । अपने सामने आए दृश्यों को देखता रहा ,चलता रहा और सोचता रहा 'वास्तव में जीवन  चलने का ही नाम है,ठहरे और जीवन समाप्त !' 
         सब बातें उसके अधकचरे मन में आ-जा रही थीं थी ,कैसी संवेदना है जो त्रिशंकु सी उसके मन में कभी पृथ्वी पर   तो कभी ऊपर आकाश में न जाने कहाँ चहलकदमी कर रही है ,संभवत:यही त्रिशंकु की स्थिति है  ।  ऐसे ही दुनिया का तमाशा देखते हुए वह कभी कोई रूप बनाकर चलता रहता ,जब लगता कि किसी विशेष स्थान पर वह घुसपैठ नहीं कर सकता ,वहाँ अपनी अदृश्य होने वाली शक्ति का लाभ उठाता । 
 अपनी पत्नी स्वाति की स्मृति में डूबकर उन्होंने कहा था ;
" अच्छे विचार ही अच्छा मार्गदर्शन प्रदान कर सकते  हैं। "वे बारंबार अपनी पत्नी के  सुविचारों की स्मृति में खो जाते थे ।
 
            सत्यनिधि की स्मृति भी उसे पीछे खींच ले जाती ।अपने उच्च विचारों व साधना के सहारे उसने अपने जीवन को एक सुन्दर उपहार बना लिया था ।  उसके मन में प्रेम,उत्साह,प्रफुल्लता का ऐसा मिश्रण था जिससे कॉस्मॉस के मन में भी  पृथ्वी पर रहने की लालसा जागृत हो रही थी।
"यदि हम किसी भी कारण  के लिए कुछ करना है  तब हमें एक वृक्ष की भाँति अडिग रहने की आवश्यकता होती है । जिससे यदि पृथ्वी पर बीज बनकर गिरें तब कम से कम पौधे बनकर तो उग सकें ।ये ही   पौधे   अगली  पीढ़ी को वृक्ष बनकर शीतल छाया प्रदान कर सकेंगे । " 
      यह कॉस्मॉस तो इन बातों में इतना खोता जा रहा था कि  भी भुला बैठता था कि  धरती का है ही नहीं ।         
 

 


- डॉ. प्रणव भारती